शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बेबस मन..........वीना....

आजकल  
भागता है मन 
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में 
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है 
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग 
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

बुधवार, 13 जुलाई 2011

पुस्तकें.............वीना....

ज्ञान का भंडार हैं
ये पुस्तकें
बंद है
हमारा भविष्य इनमें
नन्हें हाथों की शक्ति
आने वाले कल की 
तस्वीर है इनमें
इन्हें खोले और
गहराई में उतरे बिना
हम नहीं कर सकते
अपने कल का निर्माण
कल के
सवालों के उत्तर
मिलेंगे
यहां-वहां बिखरी
सजी किताबों में
लेकिन हमारे पास
समय कहां है
हम तो उलझे हैं
शार्ट कट में
किताबों के  लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में 
अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से

रविवार, 19 जून 2011

तेरी बात.........वीना

घुटन भरी थी वो रात
जिसने छेड़ी तेरी बात


मन की यादों में सिमटे हैं
पल जो साथ बिताए रात


मरते दम तक साथ रहेगी
तेरी चाहत की सौगात


चंदा को भी तरसेगी अब
झिलमिल तारों की बारात


मन की प्यास बढ़ा जाएगी
जब-जब आएगी बरसात

सोमवार, 23 मई 2011

मेरे पापा.....................वीना



  • आज से 11 साल पहले 23 तारीख को ही पापा हम सबको
  •  रोता-बिलखता छोड़कर परमात्मा में लीन हो गए थे...मुझे 
  • हमेशा लगता रहा है वो आज भी मेरे पास हैं और मुझे हर 
  • मुसीबत से उन्होंने बचाया...तभी कहते हैं कि माता-पिता 
  • रहे या न रहें उनकी आत्मा हमेशा बच्चों के पास रहती है...
  • यह रचना पहले भी पोस्ट कर चुकी हूं आज फिर कर रही हूं...
  • काश फिर से मिल जाए...सच में कोई जिद नहीं करूंगी.....

तुम क्यों रूठ गए पापा
मैं निपट अकेली हो बैठी
किसे गुहारूं, किसे पुकारूं
मैं तो तन्हा हो बैठी


जब तुम थे तो बात और थी
एक आंसू न गिरने देते थे
अब रोते-रोते रात कटे
अश्कों का समंदर हो बैठी


पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत है क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी


सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी


बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी


एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी


अपने पास बुला लो मुझे
क्यों छोड़ा इस निर्दय जग में
पापा न कोई बन पाएगा
मैं अपनी किस्मत खो बैठी


हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहें
अब यही दुआ मैं कर बैठी





बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

अज्ञेय मन.........वीना

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन सम्भवत: नहीं जानता
क्योंकि
जो भाता है
समय आने पर
वह नहीं भाता
भाने और न भाने के मध्य हैं
कुछ परिस्थितियां
जो आएंगी अवश्य
जिन्हें आना ही है
देश,काल,वातावरण की
शरीर की, आत्मा की
जिन्हें हमें
सहना ही है
जो देंगी
नई दिशा
हमारे भाने को
यही कारण है
प्रकृति का भी नियम है
'परिवर्तन' का
'परिवर्तन'
हर स्तर पर
आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो
फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में
और प्रतीक्षा करते हैं
अगले परिवर्तन की
जो नहीं भाता
फिर भी उसमें जीते हुए
जो भाता है
उसकी प्रतीक्षा में
गुजारते हैं
बाकी जीवन
ये भी आवश्यक नहीं
प्रत्येक भाने की स्थिति
स्थिर हो
जीवन पर्यन्त हो
न भाने की स्थिति
बन जाती है
भाने की विवशता
कारण...
समय और परिस्थितियां
क्योंकि मानव दास है
स्वामी नहीं
समय का
स्वामी होता
तो...
अपना भाना अवश्य जानता
न भाने को
भाना स्वीकार न करता
क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आस्तीन का सांप.......वीना

इसी घर के 
किसी कोने में
उस मां ने
झेली होगी
प्रसव पीड़ा
नौ महीने 
पेट में रखने के बाद
पाला होगा 
लाड़-प्यार से
आंचल फाड़कर
ढांपा होगा अपने लाल को 
सिमटते हुए
गुजारी होंगी 
रातें उसने
दूध की जगह 
पिलाया होगा
अपना लहू
निचुड़ गईं होंगी 
छातियां उसकी
क्षीण हो गई होगी 
काया उसकी
निवाले निकालकर मुंह से
खिलाए होंगे उसे
जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा

मंगलवार, 1 मार्च 2011

आस........वीना

वो रोज जलाती है 
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी 
मुस्कुराहटों  की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से 
पकाती है दाल
रख देती है 
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
सिल पर घिसकर
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए 
दाल-भात