रविवार, 11 नवम्बर 2007
शनिवार, 10 नवम्बर 2007
व्यक्तित्व बच्चों का
बच्चा भी
नहीं है आजाद
उससे ज्यादा है वजन
उसकी पुस्तकों का
खिलौने सा
हल्का नहीं है उसका जीवन
भार है उसके नन्हें कंधों पर
नपे-तुले टाइम टेबल का
तथाकथित
संपूर्ण शिक्षा का
जिसकी पूर्णता
रिक्त कर देती है
उसके बचपन को
नपे-तुले टाइम टेबल में
90 प्रतिशत नंबर लाने की होड़
खड़ा कर देती है उसे
छोटी सी उम्र में
प्रतियोगिता के क्षेत्र में
खोखला कर देती है
उसका जीवन
स्वाभाविक जीवन जीने से पहले ही
कांट-छांट कर
तराशा जाता है
एक मनचाहा आकार
जिसमें उसे
फिट होना ही है
चाहे फिट होते-होते
वह बिखर ही जाए
उसके नन्हें हाथों में खिलौने की जगह
होते हैं कंप्यूटर
आंखों में चमक की जगह
चढ़ा होता है चश्मा
तितलियां पकड़ने की जगह
वे जाते हैं
थोपी हुई हॊबी क्लासेज में
थ्योरी बनकर रह जाता है
इनका जीवन
नहीं कर पाते हैं प्रैक्टिकल
बालसुलभ क्रियाएं
ढल जाती हैं
सधे जीवन में
उम्र से ज्यादा अवस्था का ज्ञान
खोखला कर देता है
उनका व्यक्तित्व।
नहीं है आजाद
उससे ज्यादा है वजन
उसकी पुस्तकों का
खिलौने सा
हल्का नहीं है उसका जीवन
भार है उसके नन्हें कंधों पर
नपे-तुले टाइम टेबल का
तथाकथित
संपूर्ण शिक्षा का
जिसकी पूर्णता
रिक्त कर देती है
उसके बचपन को
नपे-तुले टाइम टेबल में
90 प्रतिशत नंबर लाने की होड़
खड़ा कर देती है उसे
छोटी सी उम्र में
प्रतियोगिता के क्षेत्र में
खोखला कर देती है
उसका जीवन
स्वाभाविक जीवन जीने से पहले ही
कांट-छांट कर
तराशा जाता है
एक मनचाहा आकार
जिसमें उसे
फिट होना ही है
चाहे फिट होते-होते
वह बिखर ही जाए
उसके नन्हें हाथों में खिलौने की जगह
होते हैं कंप्यूटर
आंखों में चमक की जगह
चढ़ा होता है चश्मा
तितलियां पकड़ने की जगह
वे जाते हैं
थोपी हुई हॊबी क्लासेज में
थ्योरी बनकर रह जाता है
इनका जीवन
नहीं कर पाते हैं प्रैक्टिकल
बालसुलभ क्रियाएं
ढल जाती हैं
सधे जीवन में
उम्र से ज्यादा अवस्था का ज्ञान
खोखला कर देता है
उनका व्यक्तित्व।
बच्चे राष्ट्र की मुस्कान
बच्चे राष्ट्र की मुस्कान
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट, चिथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें...
मुस्काती हैं
पर बिलखते हुए
चलने का आभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों, चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये...मासूम आंखें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
पर...आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके
मुस्कराते चेहरे पर
जो खांईं से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
ओंठ भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती है
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अंत
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान.
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट, चिथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें...
मुस्काती हैं
पर बिलखते हुए
चलने का आभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों, चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये...मासूम आंखें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
पर...आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके
मुस्कराते चेहरे पर
जो खांईं से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
ओंठ भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती है
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अंत
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान.
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