प्रस्तुत है मेरे कविता संग्रह 'तुम और मैं' से एक कविता
एक बार फिर
आहट हुई
तुम्हारे आने की
तुम....
क्यों आ गईं
इस बढ़ती मंहगाई में
कहां से करूं तुम्हारा स्वागत
कुछ भी नहीं है शेष
अब...
लौट जाओ तुम
तुम.....
जब भी आती हो
कुंडली मारकर
बैठ जाती हो
इस
टूटे घंरौदे पर
अभावों में बंधा जीवन
कांप उठता है
तुम्हारे आगमन से
पुन:
किसी पीड़ा में
डूब जाता है मन
तुम...
तुम जाती क्यों नहीं ?
मैं नहीं सह सकता
तुम्हारा
ये विशालकाय बोझ
तुच्छ-सा जीव हूं मैं
तुम्हारी प्रकृति से
परिचित हूं भलीभांति
तुम…
खेलती हो अभावों से
हमारा सुख
हमारी मुस्कुराहटें
तुम्हारा भोजन है
तुम्हारी प्यास
हमारे आंसू हैं
तुम्हारी दक्षिणा
अंत है
हमारे जीवन का
तुम्हारी विदाई के कदम
जाते हैं
श्मशान की ओर
लेकिन क्या करोगी
यहां रहकर
तुम भी तड़प जाओगी
भूख से बिलखोगी
केवल...
आंसू शेष हैं
बुझा सको तो बुझा लो
अपनी प्यास
लेकिन.....
इस सरिता को
मत बनाना मरुस्थल
अगर...
तुम फिर प्यासी हुईं
लौट जाओ
लौट सको तो
चीथड़ों में लिपटी
हमारी भूख बिलखती है
अभावों के खाके
बढ़ते ही जा रहे हैं
शुष्क होठों की
पपड़ियां फाड़कर
अमृत रस देने वाला लहू
अब निचुड़ चुका है
विदाई का
कोई उपहार शेष नहीं
अब...
किसकी भेंट लोगी
हां....हां मैं हूं
मैं हूं शेष
तुम्हारी
विदाई का उपहार
ले चलो अपने साथ
क्योंकि…
तुम बैठी हो कुंडली मारे
अभावों में
मैं और तुम
दोनों बिलखेंगे
अपना बिलखना
देख सकता हूं
ले्किन
नहीं देख सकता
तुम्हारी
बिलखती चीख को
तुम अतिथि हो
मैं
आतिथेय की मर्यादा का
उल्लंघन
नहीं कर सकता
स्वागत करने योग्य तो नहीं
लेकिन..
नहीं सुन सकता
तुम्हारी चीत्कार
इसलिए...
हे: अतिथि
अब
विदा की तैयारी करो
कहीं तुम्हें
अंतिम प्रणाम भी न कर सकूं
तुम
खाली हाथ नही जाओगी
तुम्हारे लिए
अंतिम उपहार
मेरा जीवन
तुम्हें
11 टिप्पणियाँ:
आज की मंहगाई को देखते हुए सार्थक रचना...
महंगाई , अतिथि बन कर ही आओ ....और अब जाओ ...
सुन्दर ...!
्गरीबी का इतना सार्थक चित्रण शायद ही किसी ने किया हो………………आथितेय की मर्यादा…………गज़ब कर दिया………………सोचने को मजबूर करती और दिल को झंझोड जाती है।
बहुत ही शानदार शब्दों का चयन
उतने ही सुंदर भाव भी
आज की हकीकत बयां कर दी आपने
अच्छा लगा.
वीना जी .
आपके ब्लाँग पर आकर ज्वलंत विषय पर कलावंत रचना पढ रहा हूँ ।
मँहगाई ?
घर घर से सगाई
न इस सरकार ने भगाई
न उस सरकार ने भगाई । आपकी रचना वस्तुस्थिति का सजीव चित्रण है ।
प्रशंसनीय ।
वीना जी .
आपके ब्लाँग पर आकर ज्वलंत विषय पर कलावंत रचना पढ रहा हूँ ।
मँहगाई ?
घर घर से सगाई
न इस सरकार ने भगाई
न उस सरकार ने भगाई । आपकी रचना वस्तुस्थिति का सजीव चित्रण है ।
प्रशंसनीय ।
वीना जी .
आपके ब्लाँग पर आकर ज्वलंत विषय पर कलावंत रचना पढ रहा हूँ ।
मँहगाई ?
गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...
वर्तमान व्यवस्था पर इतनी अच्छी रचना वास्तव में अतुलनीय है
संगीताजी,वाणीजी, वंदनाजी, राजकुमारजी, अरुणेशजी, संजयजी और गुंजनजी आप सभी का अभिनंदन और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद
मँहगाई ?
घर घर से सगाई
न इस सरकार ने भगाई
न उस सरकार ने भगाई ।
आपका तो कोई जवाब नहीं सर
वीणा जी,कविता मार्मिक होने के साथ साथ वास्तविकता को भी उजागर करती है.
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