शनिवार, 4 सितम्बर 2010

लूटिया डूबो रहे हैं आज के हिंदी के अध्यापक....

कैसा लगा शीर्षक...? कुछ खटका ...लूटिया डूबोना..? मैं यही चाहती थी कि खटके...पर इसके विरोध में कितने लोग मुझे सुधारते ...शायद कोई नहीं...पहले शिक्षक दिवस का मतलब केवल एक दिन का ही महत्व नहीं बल्कि शिक्षक का सम्मान करना होता था। विद्यार्थी दिल से अपने अध्यापक का सम्मान करते थे। प्राइमरी कक्षा से ही शिक्षक अपनी जिम्मेदारी समझते थे कि अगर कहीं उनकी शिक्षा में कमी रह गई तो उनका नाम डूब जाएगा। विद्यार्थी भी अपने अध्यापकों का दिल से सम्मान करते थे। अब न तो वो शिक्षक ही हैं और न ही वैसे छात्र। शिक्षक कक्षा में पढ़ाते नहीं, ट्य़ूशन का कारोबार चला रहे हैं..छात्र भी स्कूलों में पढ़ना नहीं चाहते और हिंदी के शिक्षक तो लुटिया ही डुबो रहे हैं।
आज एक सौ में से केवल नब्बे बच्चो की ही हिंदी भाषा सही होगी बाकी का हिंदी लेखन क्या कहूं...जहां बड़ा ऊ आएगा वहां छोटा उ और जहां छोटा उ होना होगा वहां ऊ लिखते हैं। इसी तरह छोटी इ-बड़ी ई , छोटा ओ और बड़ा औ का प्रयोग है। एक बार गलत लिखने की आदत हो जाए तो यह कभी नहीं छूटती। यहां तक कि कविता, गजल आदि लेखन के समय भी यही आदत रोड़ा बनती है। मैने अगर बीस लोगों के ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी की है तो यकीन मानिए केवल एक-दो को छोड़कर सभी की वर्तनी में गलती थी।...जहां भावनाएं और प्रस्तुति बहुत अच्छी थी वहां मात्राओं की गलती थी। ये गलती व्यक्ति विशेष की कम और उनके शिक्षकों की ज्यादा है। जिन्होने अपने छात्रों की वर्तनी पर ध्यान नहीं दिया। भाषा कोई भी हो वह सही लिखी जानी चाहिए। हिंदी भाषी प्रदेशों की ये हालत है तो बाकी से कोई उम्मीद रखना बेवकूफी ही है। हमें जो अक्षर और मात्रा ज्ञान कराया गया वो इस तरह से दिमाग में बैठ गया है कि अगर सोते-सोते भी कुछ लिखना हो तो कहीं मात्रा की गलती नहीं होगी। ककहरा बुलवा-बुलवाकर हमारे शिक्षकों ने हमारी हिंदी सुधरवा दी। मैं अपने उन सभी शिक्षकों के प्रति आज दिल से सम्मान प्रकट करती हूं। जिन्होंने मेरी नींव मजबूत करने में अपना योगदान दिया। आज-कल के शिक्षकों को भी इस बात पर ध्यान देना होगा ताकि बच्चों की भाषा सुधर सके।
इसके साथ अपने सभी ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि जिसके भी ब्लॉग पर टिप्पणी करें तो उसे उसकी कमी जरूर बताएं, जो गलती आपको पता है उसे बताना ही चाहिए...ये हम सबका कर्त्तव्य है। तारीफ जरूर करें लेकिन कमियां छुपाकर नहीं...कमियां बताकर। मेरा भी आप सभी से अनुरोध है जहां पर लगता है मैं गलत हूं वहां मुझे जरूर सुधारा जाए...एक सच्चे मित्र की तरह। मित्र होते इसी लिए हैं। गलतियां होना स्वाभाविक है पर उसे समय रहते सुधार लिया जाना चाहिए। सभी को शिक्षक दिवस की बधाई...अपने शिक्षकों का सम्मान करें, उनके प्रति आदर का भाव रखें....



उल्टी दिशा.......

बिना सोचे समझे
चलती रही
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
मैने कहीं सुनी थीं
ये चार पक्तियां
वह पथ क्या-पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
यदि धाराएं प्रतिकूल न हों
मैं लेती रही
पग-पग पर
अपनी धैर्य परीक्षा
खुद ही बिछाती रही
शूल अपनी राहों में
देती रही चुनौती
अपनी कुशलता को
कुशलता और धैर्य के बीच
भूल गई स्वयं को
पिसती रही
दो पाटों के मध्य
नहीं समझ सकी
रोज नहीं होती परीक्षा
स्वयं को
साबित करने के लिए
आवश्यक नहीं
रोज परीक्षा से गुजरना
लेकिन जो जाना
वही है
जीवन का सार
धैर्य के साथ
कुशलतापूर्वक
खराब समय
निकालना ही है
हमारी जीत
हमारा ईनाम
समय है
सबसे बड़ी परीक्षा
जिससे गुजरना है
हम सबको
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए

11 टिप्पणियाँ:

ajay singh ने कहा…

bhavnaon ko samajhiye ab hindi ko sudharne ki jaroorat nahi hai balki prasar ki,prachar ki jaroorat hai

वीना ने कहा…

मुझे हिंदी भाषा से भी उतना ही प्यार है जितना अपने देश से और मैं यह हर्गिज नहीं चाहूंगी कि कोई हिंदी गलत लिखे (कम से कम वर्तनी की गलती) और मुझे पता हो और मैं खामोश रहूं। मैने इसलिए नहीं पढ़ाई की कि गलत होते देखूं। जहां तक भावों कि बात है वह सबके अपने होते हैं और भाव दिल से निकलते हैं तो वह तो अच्छे होंगे ही। भाव भी सुंदर हों और भाषा भी सुंदर हो तो रचना सार्थक हो जाती है। अगर आपको खराब लगा हो तो क्षमा चाहूंगी। हिंदी के प्रचार-प्रसार की जरूरत है मगर सुधरी हुई भाषा के साथ...यहां आप फिर गलत हैं।

Manish Kumar ने कहा…

जी आज हिंदी शिक्षा का स्तर गिर रहा है इसमें कोई दो राय नहीं। पर इसके लिए सिर्फ शिक्षकों को दोषी करारा नहीं जा सकता। हम अभिभावक भी अपनी जिम्मेवारी कहाँ निभा रहे हैं? स्कूल के आलावा भी हमारे माता पिता हमें पढ़ने के लिए अखबार, हिंदी कॉमिक्स और पुस्तकालय से उपन्यास ला कर देते थे। आज के अभिभावक ये सब मुहैया कराते हैं पर अंग्रेजी में। स्कूल की पढ़ाई छोड़ दीजिए तो फिर ज़िंदगी भर हिंदी में लिखने का अभ्यास ही कहाँ रह जाता है?

जहाँ तक वर्तनी की गलतियों का सवाल है तो ये हम सब से होती रहती है। कई बार टंकण में त्रुटियाँ हो जाती हैं, कई बार शब्द विन्यास गलत हो जाता है और कई बार जानकारी का आभाव रहता है कि सही कैसे लिखा जा सकता है। आपके इस मत से पूर्णतः सहमत हूँ कि हममें गलतियों को सुधारने की इच्छा होनी चाहिए।

आज से पाँच साल पूर्व जब मैं ब्लॉग जगत में आया था तो मुझे नुक़्ते का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। पर जब मित्रों ने इस बाबत कुछ पोस्ट्स लिखीं तो बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई। फिर इस पर ध्यान देना शुरु किया और अभी भी सीख ही रहा हूँ। बहरहाल आप भी राँची से हैं जानकर खुशी हुई।

रही किसी कमी को इंगित करने की बात जहाँ तक मुझे दिख रहा है आपने सब सही ही लिखा है सिवाए 'ग़ज़ल' के।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीया वीणा जी
नमस्कार !

बहुत विचारणीय आलेख है , बधाई !
आपकी हर बात अच्छी लगी ।
मुझे बार बार आपके यहां आने की इच्छा रहेगी ।

विदा लेने से पूर्व अपना एक दोहा आपको सादर समर्पित कर रहा हूं …

पहले-से गुरु ना रहे , ना पहले-से शिष्य !
डर लगता है देख कर तेरा रूप भविष्य !!


शुभकामनाओं सहित …

- राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
पंकज शुक्ला ने कहा…

हिन्दी के प्रति आपका आग्रह स्तुत्य है। जब तक हम अपने व्यवहार में हिन्दी के प्रति इतनी आक्रामकता और आग्रह नहीं रखेंगे तब तक अपनी भाषा को हर कोई हिकारत से देखेगा। अंग्रेजी का प्रसार होने के पीछे यह भी एक कारण है।

वीना ने कहा…

मतीष जी,राजेंद्र जी व पंकज जी आप सभी का धन्यवाद...मनीष जी मैं उन गलतियों की बात ही नहीं कर रही जो टाइप करते समय हुई हों...वो गलतियां पता लग जाती हैं अक्सर जो शब्द आना चाहिए वो सही नही होता, लिखने में गलत हो जाता है...और अगर हम समझ रहे हैं कि यहां कोई शख्स गलत हो सकता है तो हमें बेझिझक बताना चाहिए...माता-पिता भी जिम्मेदार हैं पर मेरी समझ से शिक्षक ज्यादा हैं अगर वो ध्यान रखें तो गलती को सुधारा जा सकता है।...
राजेंद्र जी आपके दोहे के तो क्या कहने....धन्यवाद

सन्दीप उपाध्याय ने कहा…

"लूटिया डूबो रहे हैं आज के हिंदी के अध्यापक...."
आपने पूर्णतः सत्य कहा। केवल अध्यापक ही नही कुछ माता-पिता भी यह कार्य कर रहे हैं जो अपने बच्चों को केवल अंग्रेजी सीख्ने पर बल देतें हैं आधुनिकता के नाम पर।

Nilabh Verma ने कहा…

हिंदी भारत से प्रायः लुप्त होती जा रही है लेकिन हम शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में सर गड़े पड़े है. जितनी जल्दी हम इस सच्चाई को मान ले उतनी ही जल्दी हम हिंदी के उत्थान के लिए कुछ कर सकते हैं. लेख के लिए धन्यवाद.

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

वीणा जी ,पहले तो ब्लॅाग पर आने का धन्यवाद । और फिर अच्छी कविता के लिये बधाई । हिन्दी की दशा निस्सन्देह सोचनीय है । सौ में नब्बे तो आपने ज्यादा बता दिये । पर इसके लिये शिक्षकों के साथ- साथ शासन ,परीक्षा प्रणाली और आज की भ्रमित मानसिकता भी बराबर दोषी है ।

Vicky Babu ने कहा…

Main khud ek shikshak hu Veena ji.Magar aapse kahi baat se poorntaya sahmat bhi hu.

Hindi se premi bhi hu.


Chetane ke liye aabhaar.