बुधवार, 13 अप्रैल 2011

आस्तीन का सांप.......वीना

इसी घर के 
किसी कोने में
उस मां ने
झेली होगी
प्रसव पीड़ा
नौ महीने 
पेट में रखने के बाद
पाला होगा 
लाड़-प्यार से
आंचल फाड़कर
ढांपा होगा अपने लाल को 
सिमटते हुए
गुजारी होंगी 
रातें उसने
दूध की जगह 
पिलाया होगा
अपना लहू
निचुड़ गईं होंगी 
छातियां उसकी
क्षीण हो गई होगी 
काया उसकी
निवाले निकालकर मुंह से
खिलाए होंगे उसे
जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा

60 टिप्पणियाँ:

shalusri ने कहा…

हकीकत बयां की है। बहुत अच्छी कविता

vijay ने कहा…

फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा

आज की हकीकत और बच्चों की स्थिति बताती रचना वीना जी

संध्या शर्मा ने कहा…

एक माँ के त्याग और वर्तमान स्थिति में बच्चों में व्याप्त संवेदनहीनता को दर्शाती बहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण रचना..

इमरान अंसारी ने कहा…

वीणा जी,

बहुत दिनों बाद आपकी पोस्ट आई है पर की ज़बरदस्त है ......शानदार .....बहुत मार्मिकता से आपने सत्य को उजागर किया है....प्रशंसनीय |

aastha ने कहा…

आज के हालातों में तो कोई ही खुशकिस्मत होगा जो बच्चों पर नाज करे और बच्चे ताउम्र उनका ख्याल रखें...
बहुत मार्मिक और दिल को छूने वाली रचना...

संजय भास्कर ने कहा…

खिलाए होंगे उसे
जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा
.....सत्य बात कही आप ने, आज की हकीकत, धन्यवाद

radha ने कहा…

बहुत इंतजार के बाद अपकी पोस्ट आई..लगता है मसरूफियत ज्यादा ही बढ़ गई है.खैर देर आए दुरुस्त आए
और बहुत ह्रदयस्पर्शी रचना लेकर आईं...
खुदा करे आपकी कलम में और ताकत आए...

puja ने कहा…

दूध की जगह
पिलाया होगा
अपना लहू
निचुड़ गईं होंगी
छातियां उसकी
क्षीर्ण हो गई होगी
काया उसकी
निवाले निकालकर मुंह से
खिलाए होंगे उसे
जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का

क्या कहूं..सच को उजागर करती कविता...

shaan ने कहा…

आज के बच्चों की मानसिकता और मां के प्रेम की अद्भुद भावाभिव्यक्ति...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बहुत दिनो बाद आपने पोस्ट लगाई मगर बहुत ही मार्मिक पोस्ट लगाई है.

आशुतोष ने कहा…

कविता सुन्दर है ..कथन भी कुछ हद तक सत्य है..
मगर पूर्णरूप से सहमत नहीं हूँ वीना जी..
आप का क्या ख्याल होगा इस प्रश्न पर...
माँ से कुछ सवाल-एक अनाथ के

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समाज का मार्मिक सत्य।

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (14-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

kase kahun?by kavita. ने कहा…

samvedanheen acharan karte hue bachche itana kaha sochate hai...ek kadavi sachchai..sunder shabdon me...

यशवन्त माथुर ने कहा…

बेहतरीन!

सादर

Vijai Mathur ने कहा…

सत्य आधारित काव्याभिव्यक्ति समाज की दिशा और दशा को बदलने की प्रेरणा देती है.अब वक्त आ गया है की सड़ी-गली प्रचलित लीक को त्याग कर अपनी अर्वाचीन पद्धति को पुनः अपनाया जाए.

Dilbag Virk ने कहा…

hkikat byan karti rachna

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जीवन की सच्चाई का रेखांकन ...

वीना ने कहा…

आशुतोष जी आप ब्लॉग पर आए और अपनी बहुमूल्य राय भी दी कुछ हद तक आप सहमत भी नहीं हैं...
आपने जिन भावों में अपनी रचना को ढाला है वो कहीं हद तक मेरे भी भाव हो सकते हैं। आज समाज की जो दशा है वो सभी जानते हैं एक तरफ बच्चे हैं जो मां-पिता का ख्याल नहीं रखते और माता-पिता अपमानित होकर जीते हैं...हर दूसरे-तीसरे परिवार में शायद यह उदाहरण मिल जाए...जबकि हर दूसरे-तीसरे परिवार का बच्चा यह प्रश्न नहीं पूछ सकता...मां तो ममता की मूरत होती है...जिस हाल में रहे बच्चे को पहले खिलाती है। लेकिन यह समाज है यहां वो नारी भी हैं जो नारी कहलाने के लायक ही नहीं हैं जिनके कृत्य पर एक मासूम का जीवन बर्बाद हो जाता है पर उनके इस कृत्य से क्या मां की ममता कम हो जाएगी....नहीं न....हमने भी मां का प्यार देखा है....उसी साए में बड़े हुए हैं....हां, हर उस नारी-पुरुष की मैं विरोधी हूं जिनके कारण बच्चे यतीम हो जाते हैं और जिन बच्चों की जगह मां की गोद होनी चाहिए वो कूड़े के ढेर पर मिलते हैं...
यह तो दर्द भरी दास्तां है..
बहुत मार्मिक...

वीना ने कहा…

शालू जी, विजय जी, संध्या जी, इमरान जी,आस्था जी, संजय जी, राधा जी,पूजा जी, शान जी, कुसुमेश जी,आशुतोश जी, प्रवीण जी, वंदना जी,आप सबका शुक्रिया......

वीना ने कहा…

यशवंज जी, विजय जी, दिलबाग जी, विर्क जी,डा.मोनिका और कविता जी..आपका भी दिल से आभार

वीना ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
ghazalganga ने कहा…

जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा
..............बहुत ही मार्मिक और एकल परिवार प्रणाली का एक कटु सत्य.
------देवेंद्र गौतम

नीरज गोस्वामी ने कहा…

Zindagi ki talkh sachchai ko shabd diye hain aapne...hakiikat bayan kii hai...kis tarah swarth vash hum log apne maa- baap ke prati udasiin ho jaate hain ise bakhoobi bataya hai...is marmik rachna ke liye badhai swiikaren..

neeraj

हेमंत कुमार दुबे (Hemant Kumar Dubey) ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और सामयिक रचना | आज के बच्चे ऐसे ही हो गए हैं | कुछ मीडिया का प्रभाव है और रही सही कसर भाग-दौड़ की जिंदगी पूरी कर रही है जिससे हम बच्चों को वो संस्कार नहीं दे पाते जो उन्हें मानव बना सके |

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

माननीया वीना जी! आपकी रचना में मानवीय़ करूणा का स्वर है। इसे पढ़कर मेरे मन में जो भाव जाग्रत हुए वह मैं आपसे साझा कर रहा हूँ। मूल रूप से आदमी जानवर (Man is anaimal) है। जानवर में शिक्षा के द्वारा संस्कार उत्पन्न किए जाते हैं। उसके बाद वह सामाजिक प्राणी (Man is social anaimal.) कहलाने योग्य बनता है। नगरों में गली-गली में विद्यालय गाँव-गाँव में प्राथमिक पाठशालाएं चल रही हैं। पूजागृह / देवालयों की देश भर में कमी नहीं है। टी०वी० चैनलों पर धार्मिक उपदेश देने वाले लोग आदमी को चरित्रवान बनाने की कवायद चौबीस घंटे व्यस्त रहते है। यह सब कार्य दशकों से हो रहा है। अरबों-खरबों रूपए का बजट सबके चरित्र को सवांरने में व्यय हो रहा है। फिर भी "कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी" वाली कहावत चरितार्थ होती है। वांछित परिणाम हासिल नहीं हो रहे हैं। मज़बूरी में "आस्तीन का साँप" जैसी रचना आपको लिखनी पड़ती है। इस रचना में बूढ़े माता-पिता का दर्द फूटा है। आखिर आदमी को आदमी बनाने वाले हमारे प्रयासों कहाँ कमी है। जिन एजेंसियों के कंधों पर मानवीय चरित्र को सुधारने का दायित्व है वे हाथी के दिखाने वाले दाँत तो नहीं बन गए हैं? इसे तटस्थ भाव से जाँचने-परखने की जरूरत है। अन्यथा दर्द-दर्द चिल्लाते रह जाएंगे दर्द के मूल कारणों तक नहीं।
===========================
मन को झकझोरने वाली रचना के लिए साधुवाद!
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

Sadhana Vaid ने कहा…

समाज के चंद हृदयहीन एवं कृतघ्न लोगों की कड़वी सच्चाई बयान करती दर्दभरी रचना ! बहुत सुन्दर !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

kahne ko koi shabd nahi... bas padh rahi hun

: केवल राम : ने कहा…

आपने वास्तविक सत्यों को बखूबी उकेरा है ...एक माँ की अहमियत को कौन समझ सकता है ... उसे महसूस करना आसान नहीं ....! आपका आभार

रंजना ने कहा…

क्या विडंबना है......

लेकिन यह भूल जाता है आदमी की कल को वह भी तिरस्कार के इसी मोड़ पर खड़ा होगा...

साधुवाद मर्मस्पर्शी इस रचना के लिए...

Rajiv ने कहा…

"जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का"
एक सच जिससे सभी मुंह मोड़ते दिखाई देते हैं यह जानते हुए भी कि इसका सामना एक-न-एक दिन उन्हें भी करना ही होगा.लेकिन जवानी की उस अंधी सोच का क्या करें जिसे वर्तमान के आगे कुछ दिखाई नहीं देता.इसका सामना तो अच्छे संस्कार देकर ही किया जा सकता है.सामयिक सामाजिक समस्या पर एक बेहतरीन रचना.

***Punam*** ने कहा…

आज के परिपेक्ष में कुछ-कुछ सही उतरती है.
कुछ सहमत होंगे तो कुछ असहमत..
हाँ...
आज के पीढ़ी की अब सोच बदल रही है..माँ की ममता,त्याग..ये सब बातें अब कोई मायने नहीं रखतीं हैं..
उन्हें खुद से एहसास हो तो ठीक,वर्ना राम ही राखे...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

bahut sundar kavita Vina ji... aur kitnaa kaduva saty likha Kuputron kaa .. Sadar

सुबीर रावत ने कहा…

वीणा जी आपकी यह कविता आइना दिखाती सी प्रतीत होती है. अपराधबोध सा होता है कि कहीं न कहीं हम भी वह भूल तो नहीं कर रहे हैं जिसकी और आपका इशारा है. .... इस सुन्दर पोस्ट के लिए भी आभार ........शुभकामनायें.

निर्मला कपिला ने कहा…

आजकल की हकीकत। माँ बाप किस कदर लाचार हो जाते हैं बच्चों के आगे।
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा
मार्मिक रचना। आभार।

Sunil Kumar ने कहा…

आज का मार्मिक सत्य, भावपूर्ण रचना.....

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत अच्छी कविता.... सच्चाई को बयान करती हुई .

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

मार्मिक और कटु सत्य वर्तमान परिवेश का ।

Dr Varsha Singh ने कहा…

उस मां ने
झेली होगी
प्रसव पीड़ा
नौ महीने
पेट में रखने के बाद
पाला होगा
लाड़-प्यार से
आंचल फाड़कर
ढांपा होगा अपने लाल को ...

मर्मस्पर्शी एवं भावपूर्ण काव्यपंक्तियों के लिए कोटिश: बधाई !

'साहिल' ने कहा…

एक कटु सत्य को बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी है आपने!

VIJUY RONJAN ने कहा…

रातें उसने
दूध की जगह
पिलाया होगा
अपना लहू
निचुड़ गईं होंगी
छातियां उसकी
क्षीर्ण हो गई होगी
bahut badhiya.

rajendra awasthi ने कहा…

ह्रदयस्पर्शी रचना के लिए धन्यवाद, अधिकांश माँओं की यही स्थिति है, बहुत गहराई के साथ मार्मिक अर्थ लिए हुए शब्दों का प्रयोग किया है आपने....

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

इसी घर के
किसी कोने में
उस मां ने
झेली होगी
प्रसव पीड़ा
नौ महीने
पेट में रखने के बाद
पाला होगा
लाड़-प्यार से
बहुत अच्छी कविता वीना जी बधाई और शुभकामनाएं

JAY SHANKER PANDEY ने कहा…

itani sachchi bayanbaji aur wo bhi itani sunder rachana ke madhyam se. wakai mai hatprabh hun veena ji. bahut khoob.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वीणा जी बहुत ही सार्थक और सशक्त कविता ....
आज की हकीकत है ये ....पर चिंतनीय ....
अब बच्चों से कोई उम्मीद रखनी बेकार है ...
लगता है ऐसे किसी दर्द ने उकसाया है आपको ....

ishwar khandeliya ने कहा…

वीणा जी क्या कहूँ आपकी लेखनी को शत शत नमन आपकी कविता को पढ़कर कुछ लाइने जो बहुत पहले लिखी थी याद हो आयी
आपको सादर समर्पित है
**माँ आज मैंने जाना है कि
मेरे अबोलेपन के बाद भी क्यों समझ
जाती थी तूँ मेरी पीड़ा को
क्योंकि पीड़ा का तो जन्म ही
हुआ है शायद किसी माता की
प्रसव वेदना के साथ **
इतने उम्दा पोस्ट के लिए अभिनन्दन

रचना दीक्षित ने कहा…

खिलाए होंगे उसे
जो बन गया है नाग
अपनी ही आस्तीन का
फन फैलाए बैठा है
डसने को
उसकी आशाएं
सपने
और
उसका बुढ़ापा.

ज़बरदस्त, शानदार और मार्मिक प्रस्तुति. सत्य को उजागर करती प्रशंसनीय कविता. बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत मार्मिक .. आज का सत्य है ये ... कितना कड़ुवा ...

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' ने कहा…

इस कलयुग के ज़माने में
किस पर करूं भरोसा
विष मुझे दिया उसी ने
जिसको था अमृत परोसा
'विद्यार्थी' मेरे वारिस पर
छाया कैसा जुनून
आगे बढ़ गया वो मुझसे
करके मेरे अरमानों का खून
मेरे ही आस्तीन का सांप हो गया
था जिसको मैंने पोसा
किस पर करूं भरोसा.

तारीफ के लिए शब्दहीन हूँ

वीना ने कहा…

ग़ज़लगंगाजी, नीरज जी,हेमंत जी, डा. लखनवी जी, साधना जी,रश्मि जी, केवल राम जी, रंजना जी आप सबका तहे दिल से शुक्रिया...

वीना ने कहा…

राजीव जी, डा. नूतन, निर्मला जी, पूनम जी,सुबीर जी, सुनील जी, डा.मिस सिंह,सुशील जी, डा. वर्षा, साहिल जी आप सभी का दिल से शुक्रिया...

वीना ने कहा…

विजय रंजन जी, राजेंद्र अवस्थी जी,तुषार जी, जय शंकर पांडेय जी,हरकीरत हीर जी, ईश्वर खंडेलिया जी,रचना जी, नासवा जी और विद्यार्थी जी आप सबका यहां आने और अपना बहुमूल्य विचार प्रकट करने के लिए धन्यवाद...इससे हौसलों को उड़ान मिलती है....यहां आने वाले सभी मित्रों का स्वागत है...

वीना ने कहा…

ईश्वर जी इतनी सुंदर टिप्पणी करने और इतनी अच्छी पंक्तियां लिखने के लिए बहुत-बहुत आभार...वैसे किसी की भी रचना को कोई मोल नहीं होता..फिर भी आपको धन्यवाद....

वीना ने कहा…

जितेंद्र देव जी आपने तो दिल की बात कह दी...कितनी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं...
किस पर करूं भरोसा....
सच ही तो है इस दौर में जो नहीं मिलता, वह भरोसा ही तो है...किस पर विश्वास किया जाए यह समझ ही नहीं आता...
समझ नहीं आता या विश्वास करने काबिल कोई नहीं मिलता....
बहुत-बहुत आभार....

ashish ने कहा…

पूत कपूत सुना है पर नहीं सुनी कुमाता .क्षीर्ण को क्षीण कर लीजिये .

वीना ने कहा…

आशीष जी आपने ठीक ही सुना है..पूत ही कपूत होगा तभी मां या पिता को वृद्ध आश्रम जाना पड़ेगा...और इस दिन के लिए मां निवाले निकालकर नहीं खिलाती...महल में नहीं रहना चाहती वृद्ध मां, सुकून से दो वक्त की रोटी ही चाहती है..क्या वह भी बेटा नहीं दे सकता....
बस यही कहा है....और हां अच्छा हुआ आपने देख लिया...छोटी-छोटी कमियों की तरफ खुद ध्यान नहीं जाता...धन्यवाद...

knkayastha ने कहा…

बहुत ही कठोर लेकिन सटीक...

सतीश सक्सेना ने कहा…

मानवता के लिए शर्मनाक हैं यह औलादें !

Ashu ने कहा…

bahut khub likhati hain... kya baat hai
संजय
http://chaupal-ashu.blogspot.com/

RameshGhildiyal"Dhad" ने कहा…

ye dard maa ko jo bachche dete hain
sood sahit unke bachch vapas kar dete hain..
jo mata-pita kathin paristhitiyon me bhi apne bachche par aanch nahi aane dete ..unhe bada hokar vahi bachcha dutkaarega to use sabse bade nark jhelne honge...