बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

अज्ञेय मन.........वीना

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन सम्भवत: नहीं जानता
क्योंकि
जो भाता है
समय आने पर
वह नहीं भाता
भाने और न भाने के मध्य हैं
कुछ परिस्थितियां
जो आएंगी अवश्य
जिन्हें आना ही है
देश,काल,वातावरण की
शरीर की, आत्मा की
जिन्हें हमें
सहना ही है
जो देंगी
नई दिशा
हमारे भाने को
यही कारण है
प्रकृति का भी नियम है
'परिवर्तन' का
'परिवर्तन'
हर स्तर पर
आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो
फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में
और प्रतीक्षा करते हैं
अगले परिवर्तन की
जो नहीं भाता
फिर भी उसमें जीते हुए
जो भाता है
उसकी प्रतीक्षा में
गुजारते हैं
बाकी जीवन
ये भी आवश्यक नहीं
प्रत्येक भाने की स्थिति
स्थिर हो
जीवन पर्यन्त हो
न भाने की स्थिति
बन जाती है
भाने की विवशता
कारण...
समय और परिस्थितियां
क्योंकि मानव दास है
स्वामी नहीं
समय का
स्वामी होता
तो...
अपना भाना अवश्य जानता
न भाने को
भाना स्वीकार न करता
क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता

85 टिप्पणियाँ:

वीना ने कहा…

आज जब डैश बोर्ड खोला तो सारी ब्लॉग लिस्ट नदारद थी और आ रहा था आप किसी ब्लॉग को फॉलो नहीं करते...मुझे अचरज हुआ लेकिन तीन-चार बार खोलने के बाद ही डैशबोर्ड की लिस्ट मिली कोई खास वजह थी या नहीं मुझे नहीं पता चला..क्या ऐसा अक्सर होता है...मेरे साथ बहली बार हुआ। अगर पता हो तो जरूर बताएं क्या ऐसा आपके साथ भी हुआ है....

विशाल ने कहा…

'परिवर्तन'
हर स्तर पर
आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो
फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में

bahut khoob.badhiyaa abhivyakti.

यशवन्त माथुर ने कहा…

"क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"

बहुत सही बात कही आपने.

जैसा कि आपने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि डैशबोर्ड पर आप को ब्लॉग लिस्ट नहीं दिखाई दी और कुछ प्रयास करने के बाद ही आप देख सकीं;मेरे साथ यह कॉमन है और अक्सर दिन में एक बार तो होता ही है.क्यों होता है इसकी खोज में लगा हुआ हूँ.


सादर

Rajiv ने कहा…

"आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो"
सच कहा है आपने.जीवन की सारी परिस्थितियां समय सापेक्ष होती है.जो अभी अच्छा है,कल भी होगा कोई जरूरी नहीं.समझौता,अर्थात माध्यम मार्ग,हमें अनुकूलन का अवसर प्रदान करता है.बहुत ही संवेदनशील एवं हृदयग्राही रचना.

aastha ने कहा…

क्या कहना है क्या सुनना है
न कोई इच्छा न कोई तमन्ना है
अरे ये तो शेर बन गया आपके साथ हम भी लिखने लगे।

Vijai Mathur ने कहा…

आपने बिलकुल सही लिखा -मनुष्य दास है समय का.एक और विद्वान ने बहुत पहले यही कहा था-समय करे,नर क्या करे?समय बड़ा बलवान.समय को जिसने पहचान लिया वही जीत गया और जो समय न पहचान सका वही पिछड़ गया ,यही सनातन सत्य है.

राजेंद्र तिवारी ने कहा…

अच्छी कविता!!!!

Shah Nawaz ने कहा…

इस रचना के माध्यम से आपने बहुत ही बेहतरीन सन्देश दिया है!

vijay ने कहा…

कारण...
समय और परिस्थितियां
क्योंकि मानव दास है
स्वामी नहीं
समय का
स्वामी होता
तो...
अपना भाना अवश्य जानता
न भाने को
भाना स्वीकार न करता

मन कर रहा है पूरी कविता ही कोट कर दूं ....एक-एक शब्द सच और सच कहां से सोच लेती हैं...मुझे भी आजतक मन की चाहत समझ नहीं आती और फिर मन के अनुरूप होने की उत्कठ इच्छा। बस यही इंतजार रहता है
आपको सलाम

shaan ने कहा…

"क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"

शायद ऐसा ही होता होगा
मन तो जानता ही नहीं क्या चाहता है, कहां रमता है चले जा रहे हैं बस भटकते हुए
बहुत ही सुंदर रचना

shaan ने कहा…

अरे मैं बताना ही भूल गया जो आपने पूछा है मेरे साथ भी हुआ है लेकिन दो तीन बार ट्राई करने पर वापस आ जाता है इसलिए परेशान मत होइए...कोई कारण मिला तो जरूर बताऊंगा

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बढ़िया प्रेम कविता. प्रेम में कई बार बहुत सी बातें समझ नहीं आती.. तर्क से परे होता है सब कुछ...

amrendra "amar" ने कहा…

"क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन.
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"

बहुत सही बात कही आपने.

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचना...वाह!!

lokendra singh rajput ने कहा…

भाना और नहीं भाने की जिस स्थति का वर्णन अपने कविता के माध्यम से किया है वह काबिले तारीफ है...

Mansoor Ali ने कहा…

सुंदर रचना वीना जी , बड़ी गूढ़ पहेली को आपने विषय बनाया है. अनेको परिप्रेक्ष्य में टटोला है अझेय मन को ......मगर लाहासील ! इसे कब क्या 'भा' जाये पता नही.
अपने मन से मैं भी कभी इस तरह उलझ चुका हूँ .
[http://mansooralihashmi.blogspot.com/search/label/self%20searching]
स्वयं

नियति कि उत्पत्ती ?
दो विपरीत तत्वो का सम्मिश्रन!
वासना की उपज ??
प्रेम का प्रतिफ़ल!!
या
आल्हाद का जमा हुआ क्षण!!!
…हाँ, शायद्…
कोई ऐसा जमा हुआ क्षण् ही हूँ मै,
जो भौतिक रूप मेँ अभिव्यक्त हो गया हूँ ।
मगर मैरी भौतिकता कि इस अभिव्यक्ति को…'व्यक्त' ये कौन कर रहा है?
मन…!, अद्र्श्य मन !!, अभूज मन !!!
बारहा, इस मन को समझाने कि प्रक्रिया से गुज़र कर भी,
ख़ुद इसी को नही समझ पाया हूँ।
यह मन… जल पर मौज, थल पर तितली और आकाश मेँ…
इन्द्र-धनुष सा लगा…
पर मैरे हाथ ! कभी न लगा!!
इन्द्र-धनुष के रंगो की विभिन्नता से इसकी प्रकर्ति समझ में आ रही थी…
…कि यकायक वह भी ग़ायब हो गया।
रंगो का यह प्रतिबिम्ब बहुत समय तक आँखो में समाया रहा,
नैत्रो को बन्द कर उसे सहेजने का प्रयास किया,
मन के 'सतरंगी' होने का आभास तो था ही,
किंतु, वह प्रतिबिम्ब भी धुंधलाते हुए बेरंग हो गया।
रंगीन मन का बेरंग होना, विचित्र स्थिति, विचित्र अनुभूति !
वैराग्य भाव सी!!
सरल हो रहा लगता यह मन और जटिल हो गया।
आज, अचानक, बैठे-बैठे पारे समान चंचल मन को पकड़ लिया है,
आंगूठे और तर्जनी मधय, मैने मन को, जकड़ लिया है।
व्यस्त अब तर्जनी है मैरी, यह मैरी जानिब ही उठ रही है
(किसी पे अब कैसे उठ सकेगी?)
मै अपने भीतर ही जा रहा हूँ, धयानावस्था में आ गया हूँ।
थमी है चंचलता मन की कुछ-कुछ,
नये रहस्यो को पा रहा हूँ।
था दूर मन… तो पहाड़ जैसा! , मगर अब चुटकी में आ गया है,
मैरा ही मन मुझको भा गया है।
मै दंग हूँ,देख रंग इसके!
हवस,तमस और पशुत्व इसमें,
सरल,उज्जवल मनुष्य्ता भी,
दया भी है,क्रूड़ता भी इसमें,
मनस भी है,देवता भी इसमें,
है सदगुणी तो कुकर्मी भी ये,
गौ नेक फ़ितरत अधर्मी भी है,
बुज़ुर्ग़ भी, बचपना भी इसमें,
है धीर-गम्भीर नटखटी भी।
जवाँ बहुत हौसला है इसका,
अटल मगर फ़ैसला नही है,
मचल रहा उंगलियो में मैरी…उड़ान भरना ये चाह्ता है,
समझ रहा हूँ इसे जो कुछ-कुछ,अजीब करतब दिखा रहा है।
है मन के अन्दर भी एक उंग्ली, हरएक जानिब जो उठ रही है,
सभी को ये दोष दे रही है, सभी पे आक्षेप कर रही है,
दबा रहा हूँ मै अपने मन को,
अरे! कहाँ है, कहाँ मेरा मन…
न जाने कब का फ़िसल गया वह,
ये मैरी उंगली है और मैरा तन,
स्वयं को पा और खो रहा हूँ!
न पा रहा हूँ न खो रहा हूँ!!
मन्सूर अली हाशमी

http://aatm-manthan.com

वीना ने कहा…

विशाल जी,यशवंत जी,राजीव जी, अस्था जी, विजय माथुर जी,राजेंद्र जी, शाहनवाज जी,विजय जी, शान जी आप सबका धन्यवाद...

वीना ने कहा…

अरुण चंद जी, अमरेंद्र जी,समीर जी,लोकेंद्र जी और मंसूर अली जी...आप कभी का आभार

वीना ने कहा…

मंसूर जी..मुझे आज अपनी रचना इसलिए भी अच्छी लग रही है कि आपकी बेहतरीन रचना पढ़ने को मिली...

यह मन… जल पर मौज, थल पर तितली और आकाश मेँ…
इन्द्र-धनुष सा लगा…
पर मैरे हाथ ! कभी न लगा!!

आज, अचानक, बैठे-बैठे पारे समान चंचल मन को पकड़ लिया है,
आंगूठे और तर्जनी मधय, मैने मन को, जकड़ लिया है।
व्यस्त अब तर्जनी है मैरी, यह मैरी जानिब ही उठ रही है
(किसी पे अब कैसे उठ सकेगी?)
मै अपने भीतर ही जा रहा हूँ, धयानावस्था में आ गया हूँ।
थमी है चंचलता मन की कुछ-कुछ,
नये रहस्यो को पा रहा हूँ।
था दूर मन… तो पहाड़ जैसा! , मगर अब चुटकी में आ गया है,
मैरा ही मन मुझको भा गया है।
मै दंग हूँ,देख रंग इसके!

इतनी प्यारी और मन को भाने वाली हैं जो किसी गहन चिंतन के बाद ही सम्भव हो सकती हैं...

स्वयं को पा और खो रहा हूँ!
न पा रहा हूँ न खो रहा हूँ!!

यही हकीकत है जो कहना चाह रही थी....
बहुत सुंदर पंक्तियां....
आपको दिल से सलाम...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर विश्लेषणात्मक अभिव्यकित!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

kaafi achhi rachna

सुबीर रावत ने कहा…

मन की उलझी गुत्थ्हीयों को समझने का एक भावप्रद प्रयास...... आप तो शब्दों की जादूगर निकली वीना जी, .... नए विषय के साथ सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार ..... अनेकानेक शुभकामनायें.
बारामासा पर आपसे कमेंट्स की अपेक्षा है. ....... शेष फिर.

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत की संवेदनशील ओर सुंदर अभिव्यक्ति. सच ही कहा है कि समय ओर परिस्थितियों पर मानव का वश कहाँ चलता है. बढ़िया रचना, बधाई.

डैशबोर्ड से फोलोवर्स लिस्ट गायब होने का अनुभव मुझे भी करीब १५ दिन पहले हो चूका है. हालांकि वह कुछ समय पश्चात खुद ही ठीक हो गया. ऐसा लगता है कि गूगल प्रोग्राम में कुछ चेंज करते होंगे जिसके वजह से ऐसा हो सकता है अन्य कोई कारन मुझे नहीं लगता. वर्ना ये अपने आप रेस्टोर नहीं होगा.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता

गहन अभिव्यक्ति...... अच्छे और अच्छे भाव.... सच में मन नहीं जानता..कई बार तो परिस्थितियाँ तय करती हैं.... क्या अच्छा लगे और क्या नहीं...... बेहतरीन रचना .. बधाई

जाट देवता ने कहा…

जाट देवता की राम-राम,
वीना जी परिवर्तन हर जगह होना चाहिए,
फ़ोलोवर लिस्ट में भी हो गया?
ये परेशानी नेट की स्पीड के कारण हो जाती है।

chirag ने कहा…

nice one...

chirag ने कहा…

dashboard par list isiliye nahi dikhayi di ke
kabhi server se record aane main time lagta hain so
kabhi pura dashboard load nahi ho pata
ye ek bug hain blogspot main

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता

यही कश्मकश चलती रहती है ...गहन अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन तो मन है, जीवन कम है।

minoo bhagia ने कहा…

bhage re man kahin aage re man , chala jane kidhar jaanu na ,
bahut achhi rachna

संजय भास्कर ने कहा…

फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में
और प्रतीक्षा करते हैं
अगले परिवर्तन की
जो नहीं भाता
बहुत ही संवेदनशील रचना...

Vaanbhatt ने कहा…

bhaa gayi, aapki kavita...

Coral ने कहा…

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता

बहुत अच्छी रचना !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

भाने और न भाने के मध्य हैं
कुछ परिस्थितियां
जो आएंगी अवश्य
जिन्हें आना ही है
देश,काल,वातावरण की
शरीर की, आत्मा की
जिन्हें हमें
सहना ही है

sach me aisee kuchh parishtitiyan utpann jarur hoti hai..:)

अभिषेक मिश्र ने कहा…

Man ki seemarekha anbujhi hi rah jati hai.

ZEAL ने कहा…

.

At times we do not know what heart is wishing for. Sometimes it becomes too sad and at times we feel a void inside .

.

वन्दना ने कहा…

्सबकी मन:स्थिति का चित्रण कर दिया सभी के साथ ऐसा ही होता है…………बहुत सुन्दर्।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (23.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

सतीश सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब !...शुभकामनायें !!

Kunwar Kusumesh ने कहा…

"क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"

सुन्दर कविता.सब की मनः स्थिति लगभग यही है , वीणा जी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सटीक और उम्दा रचना!

निर्मला कपिला ने कहा…

मेरे साथ भी कई बार ऐसा हो चुका है मैं अक्सर डैश बोर्द से ही कमेन्ट करती हूँ। लेकिन इसकी वजह तो मुझे भी नही मालूम।
भाने और न भाने के मध्य हैं
कुछ परिस्थितियां
जो आएंगी अवश्य
जिन्हें आना ही है
देश,काल,वातावरण की
शरीर की, आत्मा की
जिन्हें हमें
सहना ही है
और ये सहना ही तो जीवन मे हमे दुनिया से अलग करता है हंस कर सहने मे ही जावन की सुन्दरता छिपी है। बहुत अच्छी रचना। बधाई।

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

गहन जीवन दर्शन है आपकी इस रचना में....

nivedita ने कहा…

प्रभावी अभिव्यक्ति.....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sach hai ... man is ohopah mein hi rahta hai ... kya chaahta hai kya nahi ... samajh mnahi paata ...

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

वीणा जी, बहुत ही अच्छी कविता........... मन के भावों का आपने काफी अच्छे तरीके से मनो वैज्ञानिक विश्लेषण किया है .......... सुंदर प्रस्तुति.

इमरान अंसारी ने कहा…

वीणा जी,

बहुत गहरी बात कह गईं हैं आप इस पोस्ट क्ले माध्यम से.......इस सबमे जो बात उभर कर आती है....वो ये है की ' इस संसार में कोई भी चीज़ स्थिर नहीं है'

बहुत शानदार,.......प्रशंसनीय...........हाँ ऐसा अक्सर हो जाता है पर लोग आउट करने पर दुबारा लोग इन करने पर ठीक हो जाता है |

MANOJ KUMAR ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति !

धन्यवाद सहित-

girish pankaj ने कहा…

hamesha ki tarah sundar kavita..dil se badhai .isi tarah likhati rahanaa....

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bhane aur na bhane ke beech acchha sameekaran banaya hai. kashmokash se bahar nikalti rachna. badhayi.

Sunil Kumar ने कहा…

'परिवर्तन'हर स्तर पर आवश्यक नहीं बहुत सही बात कही आपने, संवेदनशील ओर सुंदर अभिव्यक्ति.........

आशुतोष ने कहा…

विलम्ब हो गया कृति तक आने में..बहुत सुन्दर कविता मिली पढने के लिए..आभार

K K Mishra ने कहा…

really Great poetry

आचार्य परशुराम राय ने कहा…

आपकी कविता अच्छी और भावपूर्ण है। आभार।

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

अज्ञेय मन, अजेय मन। गुलाम से मालिक बन जाता है और भटकाता है।
बहुत अच्छी कविता लगी आपकी।
आपका आभार, वीनाजी।

मेरे भाव ने कहा…

मानव मन के द्वन्द को बखूबी उकेरा है.

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

जिंदगी का पूरा फलसफा ही बयाँ कर रही है आपकी रचना......

जिंदगी की कशमकश .....गहन अनुभूतियों का सूक्ष्म विश्लेषण के साथ प्रस्तुतीकरण सराहनीय

प्रेम सरोवर ने कहा…

वीणा जी,
परिवर्तन की आंधी जब चलती है तो उसे रोकने की हिम्मत किसी में भी नही होती। हम नजबूर हो जाते हैं तब बिना किसी के परामर्श के ही स्वयं परिवर्तन को स्वीकार कर लेते है। परिवर्तन में विश्वास रखिए एवं इसे जब और जहां मिले तहे दिल से मन मे बसा लीजिए।बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।धन्यवाद।

वैज्ञानिक प्रार्थना ने कहा…

"हम में अधिकतर लोग तब प्रार्थना करते हैं, जबकि हम किसी भयानक मुसीबत या समस्या में फंस जाते हैं| या जब हम या हमारा कोई किसी भयंकर बीमारी या मुसीबत या दुर्घटना से जूझ रहा होता है तो हमारे अन्तर्मन से स्वत: ही प्रार्थना निकलती हैं| क्या इसका मतलब यह है कि हमें प्रार्थना करने के लिये किसी मुसीबत या अनहोनी के घटित होने का इन्तजार करना चाहिए!"

"स्वस्थ, समृद्ध, सफल, शान्त और आनन्दमय जीवन हर किसी का नैसर्गिक (प्राकृतिक) एवं जन्मजात अधिकार है| आप इससे क्यों वंचित हैं?"

एक सही ‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ का चयन और उसका अनुसरण आपके सम्पूर्ण जीवन को बदलने में सक्षम है| जरूरत है तो बस इतनी सी कि आप एक सही और पहला कदम, सही दिशा में बढाने का साहस करें|

"सफल और परिणाम दायी अर्थात ‘‘वैज्ञानिक प्रार्थना’’ का नाम ही- "कारगर प्रार्थना" है! जिसका किसी धर्म या सम्प्रदाय से कोई सम्बन्ध नहीं है| यह प्रार्थना तो जीवन की भलाई और जीवन के उत्थान के लिये है| किसी भी धर्म में इसकी मनाही नहीं है|"

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत ही सुंदर कविता बधाई वीना जी

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

वीनाजी ,

बहुत गंभीर रचना है ।

मन में कई प्रश्न जगाने वाली

साधुवाद !

रंजना ने कहा…

मनोदशा का बहुत सही निरूपण किया है आपने...

सचमुच प्रेम घृणा कुछ भी स्थायी नहीं होता..सब समय और परिस्थिति पर निर्भर हुआ करता है...

Kailash C Sharma ने कहा…

आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो
फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में....

गहन चिंतन और जीवन के यथार्थ का बहुत सुन्दर चित्रण..एक सार्थक सन्देश देती बहुत सुन्दर रचना..आभार

Pradeep ने कहा…

वीणा जी प्रणाम !
परिवर्तन पर ये दार्शनिक रचना बहुत अर्थपूर्ण थी....
वास्तव में परिवर्तन प्रकृति का नियम है.....और हम प्रकृति से अलग थोड़े ही है...
जीवन है तो परिवर्तन है....एकरसता है तो जीवन नहीं है.....

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

दोस्तों, क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से (http://sach-ka-saamana.blogspot.com/2011/04/blog-post_29.html )

JHAROKHA ने कहा…

veena ji
bahut hi gahrai se aapne man ke samandar me gote lagaye hain tabhi man ke anubhavo ko itna vistaar roop diya ki uske aage kuchh likhna hi bekar sa lagta hai .man me har waqt chlne wale v uthte sawalo ko -ki ye hona chiye ya nahi ya ye hona hi chaiye badi hi gahn abhivykti ke saath prastut kiya hai waqai yah sthiti bahut hi vikat hoti hai jab us par apna vash nahi chalta.
जीवन पर्यन्त हो
न भाने की स्थिति
बन जाती है
भाने की विवशता
कारण...
समय और परिस्थितियां
क्योंकि मानव दास है
स्वामी नहीं
समय का
स्वामी होता
तो...
अपना भाना अवश्य जानता
bahut hi uttambhao ko samete sarhaniy prastuti
bahut bahut badhai
poonam

Sanjay Swaroop Srivastava ने कहा…

"क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"

मन की उलझन को अति सुन्दर ढ़ंग से उकेरा है आपने ..... एक सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें ...

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

श्रीमान जी, मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी कल ही लगाये है. इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

phli bar aapki rchnaaye pdhi.....gajab ...maine abhi tak aap ko kyoo nahi pdha...ab mai regular .blog pdhoongee

Deepak Saini ने कहा…

'परिवर्तन'
हर स्तर पर
आवश्यक नहीं

बहुत सही बात कही आपने.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

प्रिय दोस्तों! क्षमा करें.कुछ निजी कारणों से आपकी पोस्ट/सारी पोस्टों का पढने का फ़िलहाल समय नहीं हैं,क्योंकि 20 मई से मेरी तपस्या शुरू हो रही है.तब कुछ समय मिला तो आपकी पोस्ट जरुर पढूंगा.फ़िलहाल आपके पास समय हो तो नीचे भेजे लिंकों को पढ़कर मेरी विचारधारा समझने की कोशिश करें.
दोस्तों,क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से
श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी लगाये है.इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है.मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ.
अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?
यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

Apanatva ने कहा…

Nirantar chal rahee kashmkash ka gahan anubhuti ka behatreen chitran hai aapkee ye rachana......
Aabhar

Khare A ने कहा…

bahut hi sarthak rachna, nice message!

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

बढ़िया कवित ...

सुन्दर तथा गहरे भाव !

Babli ने कहा…

आपकी उत्साह भरी टिपण्णी और हौसला अफजाही के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत सुन्दर और शानदार रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!

SAJAN.AAWARA ने कहा…

MAN BHI AJEEB CHIJ HAI. . . JO MAN KO BHA JATA HAI USSE DIL LAGA LETE HAIN, OR JO MAN KO NAI BHATA USSE KINARA KAR LETE HAIN. . . . . . BAHUT HI GAHRA LEKH LIKHYA HAI APNE. . . . .0. , .
JAI HIND JAI BHARAT

मदन शर्मा ने कहा…

पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ |
बहुत ही सार्थक लेखन है आपका ! आपको मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं !
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है http://madanaryancom.blogspot.com/

मदन शर्मा ने कहा…

पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ |
बहुत ही सार्थक लेखन है आपका ! आपको मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं !
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है http://madanaryancom.blogspot.com/

मदन शर्मा ने कहा…

पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ |
बहुत ही सार्थक लेखन है आपका ! आपको मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं !
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है http://madanaryancom.blogspot.com/

कुमार राधारमण ने कहा…

मन के परे जाना तो संभव है,मगर उसे पकड़ पाना संभव नहीं।

Hamarivani ने कहा…

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Maheshwari kaneri ने कहा…

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता"
सुन्दर अभिव्यक्ति

Dr Varsha Singh ने कहा…

सुन्दर प्रतीक ... संवेदनशील रचना ...
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

अनुपमा पाठक ने कहा…

सार्थक रचना!