शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बेबस मन..........वीना....

आजकल  
भागता है मन 
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में 
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है 
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग 
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ