सोमवार, 17 सितंबर 2007

पड़ाव

पड़ाव
जीवन की दौड़
न जाने
कब, कैसे, कहां खत्म हो
किसी को नहीं पता
हम...भागीदार बन गए हैं
इस...दौड़ के
जबसे चले हैं
बस चलते ही जा रहे हैं
पड़ाव की
आकांक्षा में
कठिनाइयों से जूझते
तूफानी राहों में भी
मन की ज्योति
प्रज्वलित किए
निरंतर...चल रहे हैं
न जाने कब तक
चलते रहेंगे...यूं ही
संभवतया
कभी पड़ाव मिल जाए
पर क्या...
वो दौड़ खत्म हो जाएगी
नहीं...
दौड़ गतिमय रहेगी
भागीदार बदल जाएंगे
क्योंकि
चलना ही है
जीवन का दूसरा नाम
ठहरना...अर्थ
दौड़ का अंत
अर्थ...
जीवन का अंत

3 टिप्‍पणियां:

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

चलना ही है
जीवन का दूसरा नाम
ठहरना...अर्थ
दौड़ का अंत
अर्थ...
जीवन का अंत

सही बात को कहती हुई कविता।

सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यथार्थ को कहती अच्छी प्रस्तुति

Dorothy ने कहा…

चलना ही है
जीवन का दूसरा नाम
ठहरना...अर्थ
दौड़ का अंत
अर्थ...
जीवन का अंत

बेहद यथार्थपरक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.