शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
यादें...एक बेटी की श्रद्धांजलि
रविवार, 18 जुलाई 2010
एक खत... प्यार के नाम
रोज लिखती हूं खत
भेजती हूं तुम्हें
जब-तब ही
कितना याद आता है
तुम्हारा सताना
आंखों के वो इशारे
दोस्तों के बीच
हवा में तैरते
चुंबनों का स्पर्श
अभी भी
भर देता है रोमांच
जिस्म में
वो टकटकी लगाकर देखना
मानो दिल में उतरकर
घुल गये हो
तन-मन में
तन्हाई में
तुम्हारे हाथों की गर्माहट
सांसों की गर्मी से
पिघलते
बर्फ के शोले
सुबह की धूप-सी
खिली मुस्कान
तारों की छांव में
रात के साये तले
चलते-फिरते ख्वाब
जिन्हें हकीकत में ढालने
गये थे तुम
दूसरे शहर
अब प्रतीक्षा है
तुम्हारे लौटने की
प्रतीक्षा में
भरते जा रहे हैं पन्ने
कोरी डायरी पर
लिखा जा चुका है
तुम्हारा नाम
तुम्हारे बनाये पोस्टर से
मिलती है प्रेरणा
जीने की उमंग
खिलते रहते हैं कमल
अश्कों की झील में
ताकि करती रहूं पूजा
प्यार की
लौटना बनके
माटी की सुगंध
जुड़े रहना धरती से
खड़े रहना धरती पर
ऊंचाईयों की
उड़ान के बाद
लौटना होगा
धरती पर
सोना होगा
धरती पर
मिलना होगा
धरती पर
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
संवादहीनता.... पीढ़ियों के बीच
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
नदी के किनारे
कभी नहीं सोते
नदी के किनारे
कभी रोते हैं
कभी मुस्कराते हैं
अट्ठहास करते हैं
कभी सब कुछ
लील जाते हैं
कभी शांत रहकर
आसपास बिखरे
सौंदर्य को निहारते हैं
जीवन देने वाला नीर
चट्टानों से टकराकर
गिरते-पड़ते
चोट खाकर भी
नहीं होता लहू-लुहान
ताकि हमें दे सके
जीवन
और हम
अपने जीवन का मैल
बेशर्मी से
मिला रहें हैं
उसी सरिता में
जिससे पलता है
हमारा जीवन
नदियों का फैला
वक्ष स्थल
चाहे उसमें
दूध हो या न हो
उसके स्तन
चाहे सूख गये हों
हमें विश्वास है
दूध का
एक कतरा भी
हमें पवित्र कर देगा
हमारे पाप धो देगा
बहते जल में
सब कुछ
हो जाता है पवित्र
पापों को धोना है
उसके जीवन का उद्देश्य
पाप करना
हमारा
जन्म सिद्ध अधिकार
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
जीवन के चार आधार स्तम्भ
काम, क्रोध,लोभ, मोह
जीवन के चार
आधार स्तम्भ
सभी का जीवन
चलता है
इन्हीं के सहारे
जीवन की प्रत्येक
गति, नियति
होती है नियंत्रित
इसी से
पाप-पुण्य के कारण हैं
यही विकार
कर्मों की सजा और फल
मिलते हैं
इन्ही चार में से
किसी एक के कारण
कितने ही युद्ध हुए
निर्दोषों का खून बहा
अस्मत खिलौना
बन गयी
जीवन भर
इन्ही चार के हाथों
खेलते रहे हम
ये नचाती रहीं हमें
कठपुतली बनाकर
आंखों पर
चढ़ी रही पट्टी
कभी काम- क्रोध की
कभी लोभ-मोह की
कभी नहीं
निकल सके बाहर
इनके चंगुल से
इसीलिए
अंतिम यात्रा में भी
मिलता है
इन्हीं चार का सहारा
औरों को सम्भवत:
अपने सशक्त होने का
कराती है आभास
जीवन के प्रारम्भ से
अंत तक
जूझता है व्यक्ति
इन्हीं चार से
नहीं उबर पाता
शायद......
मैं भी न उबर पाऊं
तीन पर तो
विजय पाना है आसान
कैसे त्याग सकूंगी
तुम्हारा मोह
जिसके साथ
जीवन गुजारा
प्यार के चमन में
कभी चहके
पंछी बनकर
कभी खिले
फूल बनकर
पुनर्जन्म हो .. ..
तो यही प्रार्थना है
कोई भी योनि मिले
साथ और प्यार
तुम्हारा मिले
इसलिए नहीं चाहती
मेरी अंतिम यात्रा को मिले
चार कंधों का सहारा
मेरे लिए काफी है
तुम्हारी
बाहों का सहारा
सोमवार, 12 जुलाई 2010
सोने का पंख
रविवार, 11 जुलाई 2010
तुम नहीं तो.....
तुम नहीं
तो ये
बहार, पानी
झरनें, पेड़-पौधे
बेमानी हैं
ये उड़ती तितलियां, घटाएं
चली जाती हैं
मन को
चंचल किये बिना
ये फूल, ये खुशबू
नहीं महकाती जीवन
इंद्रधनुष भी
नहीं भरता रंग
जीवन में
तुम नहीं
तो बेकार है जीवन
तुम्हारे सुरों के बिना
हर गीत है अधूरा
अधूरी सरगम
नहीं करती
कोई गीत पूरा
मेरे लिए
जीवन, गीत
रचना का पर्याय
तुम
मेरा दूसरा ब्लॉग शिकजी को भी अवश्य देखें और उत्साह बढ़ाए
आस का पंछी.....
आस का पंछी
अभी उड़ा नहीं है
छत की मुंडेर पर है
मैं कितनी निराश थी
जब वो
उड़ गया था
छत से
लौटा नहीं था रात भर
उलझनें उलझ रही थीं
मकड़ जाल में
आस को
डस लिया था
अंधकार ने
रात भर झेलती रही
प्रसव पीड़ा
विश्वास का
हो गया था गर्भपात
न बीत रही थी
निशा
न लौट रही थी
आस
भोर की प्रतीक्षा में
बहता रहा रक्त
लेकिन...
प्रभात बेला
ले आई थी
प्रकाश की किरणें
आस के पंछी को
वापस
मेरी छत पर
मैने उसे
बंदी बना लिया
मन में
समा गया वो
विश्वास बनकर
जो अब नहीं डूबता
सूरज के साथ
नहीं बदलता
मौसम की तरह
मैंने भी अब
आजाद कर दिया
आस के पंछी को
स्वच्छंद उड़ान के लिए
विश्वास है
कहीं भी
कितना भी उड़े
वापस आएगा
कभी नहीं जाएगा
मुंड़ेर छोड़कर