शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

यादें...एक बेटी की श्रद्धांजलि

परसों यानि 28 जून को मेरे पापा का जन्मदिन था। मन हमेशा विचलित रहता है....कई बरस बीत गए उन्हें शांत हुए लेकिन उनकी उपस्थिति का आभास आज भी होता है...

उनकी याद में कुछ पंक्तियां........................

तुम क्यों रूठ गए पापा
मैं निपट अकेली हो बैठी
किसे गुहारूं, किसे पुकारूं
मैं तो तन्हा हो बैठी

जब तुम थे तो बात और थी
एक आंसू न गिरने देते थे
अब रोते-रोते रात कटे
अश्कों का समंदर हो बैठी

पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी

सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं

पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी

एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी

अपने पास बुला लो मुझे
क्यों छोड़ा इस निर्दय जग में
पापा न कोई बन पाएगा
मैं अपनी किस्मत खो बैठी

हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहे
अब यही दुआ मैं कर बैठी

रविवार, 18 जुलाई 2010

एक खत... प्यार के नाम

रोज लिखती हूं खत
भेजती हूं तुम्हें

जब-तब ही
कितना याद आता है
तुम्हारा सताना
आंखों के वो इशारे
दोस्तों के बीच
हवा में तैरते
चुंबनों का स्पर्श
अभी भी

भर देता है रोमांच
जिस्म में
वो टकटकी लगाकर देखना
मानो दिल में उतरकर
घुल गये हो
तन-मन में
तन्हाई में
तुम्हारे हाथों की गर्माहट
सांसों की गर्मी से

पिघलते
बर्फ के शोले
सुबह की धूप-सी
खिली मुस्कान
तारों की छांव में
रात के साये तले
चलते-फिरते ख्वाब
जिन्हें हकीकत में ढालने
गये थे तुम
दूसरे शहर
अब प्रतीक्षा है

तुम्हारे लौटने की
प्रतीक्षा में
भरते जा रहे हैं पन्ने
कोरी डायरी पर
लिखा जा चुका है

तुम्हारा नाम
तुम्हारे बनाये पोस्टर से
मिलती है प्रेरणा
जीने की उमंग

खिलते रहते हैं कमल
अश्कों की झील में
ताकि करती रहूं पूजा
प्यार की
लौटना बनके
माटी की सुगंध
जुड़े रहना धरती से
खड़े रहना धरती पर
ऊंचाईयों की

उड़ान के बाद
लौटना होगा

धरती पर
सोना होगा

धरती पर
मिलना होगा
धरती पर

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

संवादहीनता.... पीढ़ियों के बीच

संवादहीनता
आज बच्चों को
कर रही है दूर
अपनी मिट्टी
अपने लहू से
संवाद
तय कर रहे हैं पथ
सुनसान गलियों में
चक्कर लगा रहे हैं
बीहड़ों-जंगलों में
भटककर

हो रहे हैं दूर हमसे
अन्वेषी मन
जानना चाहता है
ये संसार
अपनी तरह से
उन्हे अधिकार है
जानने का
हमारा कर्तव्य है
सही दिशा बताने का
आवश्कता है
संवादों को पालने की
दोस्ती और प्यार से
जेनेरेशन गैप को

मिटाने की
अपनेपन की
ढाल के साथ
संवादों को
हथियार बनाने की
तभी इस युद्ध में
विजयी होंगी
दोनों पीढ़ी
पट सकेगी खाई
बीच की
उन्हे मिलेगा
उज्जवल भविष्य
सही दिशा
और हमें
संतुष्टि

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

नदी के किनारे

कभी नहीं सोते
नदी के किनारे
कभी रोते हैं
कभी मुस्कराते हैं
अट्ठहास करते हैं
कभी सब कुछ
लील जाते हैं
कभी शांत रहकर
आसपास बिखरे
सौंदर्य को निहारते हैं
जीवन देने वाला नीर
चट्टानों से टकराकर
गिरते-पड़ते
चोट खाकर भी
नहीं होता लहू-लुहान
ताकि हमें दे सके
जीवन
और हम
अपने जीवन का मैल
बेशर्मी से
मिला रहें हैं
उसी सरिता में
जिससे पलता है
हमारा जीवन
नदियों का फैला
वक्ष स्थल
चाहे उसमें
दूध हो या न हो
उसके स्तन
चाहे सूख गये हों
हमें विश्वास है
दूध का
एक कतरा भी
हमें पवित्र कर देगा
हमारे पाप धो देगा
बहते जल में
सब कुछ
हो जाता है पवित्र
पापों को धोना है
उसके जीवन का उद्देश्य
पाप करना
हमारा
जन्म सिद्ध अधिकार

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

जीवन के चार आधार स्तम्भ

काम, क्रोध,लोभ, मोह
जीवन के चार
आधार स्तम्भ
सभी का जीवन

चलता है
इन्हीं के सहारे
जीवन की प्रत्येक

गति, नियति
होती है नियंत्रित
इसी से
पाप-पुण्य के कारण हैं
यही विकार
कर्मों की सजा और फल
मिलते हैं
इन्ही चार में से
किसी एक के कारण
कितने ही युद्ध हुए
निर्दोषों का खून बहा
अस्मत खिलौना

बन गयी
जीवन भर
इन्ही चार के हाथों
खेलते रहे हम
ये नचाती रहीं हमें
कठपुतली बनाकर
आंखों पर

चढ़ी रही पट्टी
कभी काम- क्रोध की
कभी लोभ-मोह की
कभी नहीं

निकल सके बाहर
इनके चंगुल से
इसीलिए

अंतिम यात्रा में भी
मिलता है
इन्हीं चार का सहारा
औरों को सम्भवत:
अपने सशक्त होने का
कराती है आभास
जीवन के प्रारम्भ से

अंत तक
जूझता है व्यक्ति
इन्हीं चार से
नहीं उबर पाता
शायद......

मैं भी न उबर पाऊं
तीन पर तो

विजय पाना है आसान
कैसे त्याग सकूंगी
तुम्हारा मोह
जिसके साथ

जीवन गुजारा
प्यार के चमन में
कभी चहके

पंछी बनकर
कभी खिले

फूल बनकर
पुनर्जन्म हो .. ..
तो यही प्रार्थना है
कोई भी योनि मिले
साथ और प्यार
तुम्हारा मिले
इसलिए नहीं चाहती
मेरी अंतिम यात्रा को मिले
चार कंधों का सहारा
मेरे लिए काफी है
तुम्हारी

बाहों का सहारा

सोमवार, 12 जुलाई 2010

सोने का पंख

कौन पक्ष है
कौन विपक्ष
चट्टे-बट्टे हैं
एक ही थैली के
सबको चाटना है
आज
हमारी बारी है
कल तुम्हारी बारी
आएगी अवश्य
सब्र से काम लो
देश को चटना है
हमारे ही हाथों
चिंता क्यों करते हो ?
आज नहीं तो कल
इस सोने की चिड़िया का
एक पंख
तुम्हें भी मिलेगा
सब्र का फल
मीठा होता है
हो सकता है
तुम्हें सारे पंख ही मिल जाएं
तुम पूरा 'पर' ही नोच लो
दर्द, टीस कहां है
इस 'सोने की चिड़िया' में
'जान' होती
तो क्या
'पर' नुचवाती
बेजान हो गई है
ये 'सोने की चिड़िया'
कायर हो गए हैं
इसके रखवाले
अब तो
हमारा ही राज है
हम चाहे पक्ष के हों
या विपक्षी
हैं तो नेता
पंख तो हमें ही मिलना है
तब क्यों
परेशान हो तुम ?
क्या रखा है
जन समस्याओॆ में ?
हमारी भी अपनी समस्या है
कैसे मिले सोने का पंख
कौन सुलझाएगा
आखिर
हमें ही तो निपटना है इससे
ये जंग हमारी है
हमें खुद ही लड़ना है
हम लड़ेंगे
अपनी
अंतिम सांस तक
जान दे देंगे
सब कुछ
दांव पर लगा देंगे
एक
बस एक
'सोने के पंख' के लिए

रविवार, 11 जुलाई 2010

तुम नहीं तो.....

तुम नहीं
तो ये

बहार, पानी
झरनें, पेड़-पौधे
बेमानी हैं
ये उड़ती तितलियां, घटाएं

चली जाती हैं
मन को

चंचल किये बिना
ये फूल, ये खुशबू
नहीं महकाती जीवन
इंद्रधनुष भी
नहीं भरता रंग
जीवन में
तुम नहीं

तो बेकार है जीवन
तुम्हारे सुरों के बिना
हर गीत है अधूरा
अधूरी सरगम
नहीं करती

कोई गीत पूरा
मेरे लिए
जीवन, गीत

रचना का पर्याय
तुम

मेरा दूसरा ब्लॉग शिकजी को भी अवश्य देखें और उत्साह बढ़ाए

आस का पंछी.....

आस का पंछी
अभी उड़ा नहीं है
छत की मुंडेर पर है
मैं कितनी निराश थी
जब वो

उड़ गया था
छत से
लौटा नहीं था रात भर
उलझनें उलझ रही थीं
मकड़ जाल में
आस को

डस लिया था
अंधकार ने
रात भर झेलती रही
प्रसव पीड़ा
विश्वास का

हो गया था गर्भपात
न बीत रही थी

निशा
न लौट रही थी

आस
भोर की प्रतीक्षा में
बहता रहा रक्त
लेकिन...

प्रभात बेला

ले आई थी
प्रकाश की किरणें
आस के पंछी को
वापस

मेरी छत पर
मैने उसे
बंदी बना लिया
मन में

समा गया वो
विश्वास बनकर
जो अब नहीं डूबता
सूरज के साथ
नहीं बदलता
मौसम की तरह
मैंने भी अब
आजाद कर दिया
आस के पंछी को
स्वच्छंद उड़ान के लिए
विश्वास है
कहीं भी

कितना भी उड़े
वापस आएगा
कभी नहीं जाएगा
मुंड़ेर छोड़कर