सोमवार, 23 मई 2011

मेरे पापा.....................वीना



  • आज से 11 साल पहले 23 तारीख को ही पापा हम सबको
  •  रोता-बिलखता छोड़कर परमात्मा में लीन हो गए थे...मुझे 
  • हमेशा लगता रहा है वो आज भी मेरे पास हैं और मुझे हर 
  • मुसीबत से उन्होंने बचाया...तभी कहते हैं कि माता-पिता 
  • रहे या न रहें उनकी आत्मा हमेशा बच्चों के पास रहती है...
  • यह रचना पहले भी पोस्ट कर चुकी हूं आज फिर कर रही हूं...
  • काश फिर से मिल जाए...सच में कोई जिद नहीं करूंगी.....

तुम क्यों रूठ गए पापा
मैं निपट अकेली हो बैठी
किसे गुहारूं, किसे पुकारूं
मैं तो तन्हा हो बैठी


जब तुम थे तो बात और थी
एक आंसू न गिरने देते थे
अब रोते-रोते रात कटे
अश्कों का समंदर हो बैठी


पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत है क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी


सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी


बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी


एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी


अपने पास बुला लो मुझे
क्यों छोड़ा इस निर्दय जग में
पापा न कोई बन पाएगा
मैं अपनी किस्मत खो बैठी


हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहें
अब यही दुआ मैं कर बैठी