रविवार, 11 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


नीचे वाला फोटो मैने लिया है। स्थान-आंकारेश्वर (इंदौर से 80 किमी खंडवा रोड पर), संगम घाट, 14 अक्टूबर 07


शनिवार, 10 नवंबर 2007

फूल


व्यक्तित्व बच्चों का

बच्चा भी
नहीं है आजाद
उससे ज्यादा है वजन
उसकी पुस्तकों का
खिलौने सा
हल्का नहीं है उसका जीवन
भार है उसके नन्हें कंधों पर
नपे-तुले टाइम टेबल का
तथाकथित
संपूर्ण शिक्षा का
जिसकी पूर्णता
रिक्त कर देती है
उसके बचपन को
नपे-तुले टाइम टेबल में
90 प्रतिशत नंबर लाने की होड़
खड़ा कर देती है उसे
छोटी सी उम्र में
प्रतियोगिता के क्षेत्र में
खोखला कर देती है
उसका जीवन
स्वाभाविक जीवन जीने से पहले ही
कांट-छांट कर
तराशा जाता है
एक मनचाहा आकार
जिसमें उसे
फिट होना ही है
चाहे फिट होते-होते
वह बिखर ही जाए
उसके नन्हें हाथों में खिलौने की जगह
होते हैं कंप्यूटर
आंखों में चमक की जगह
चढ़ा होता है चश्मा
तितलियां पकड़ने की जगह
वे जाते हैं
थोपी हुई हॊबी क्लासेज में
थ्योरी बनकर रह जाता है
इनका जीवन
नहीं कर पाते हैं प्रैक्टिकल
बालसुलभ क्रियाएं
ढल जाती हैं
सधे जीवन में
उम्र से ज्यादा अवस्था का ज्ञान
खोखला कर देता है
उनका व्यक्तित्व।

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट, चिथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें...
मुस्काती हैं
पर बिलखते हुए
चलने का आभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों, चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये...मासूम आंखें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
पर...आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके
मुस्कराते चेहरे पर
जो खांईं से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
ओंठ भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती है
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अंत
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान.

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2007

चंदा-चांदनी

निकले चंदा रात मुस्कराए
झूम-झूम इठलाती है
तारों से आंचल भरकर
फिर दुल्हन सी शरमाती है

दूध सी उजली, निर्मल, कोमल
चांदनी रात मन भाती है
चम-चम करते रेत के हीरे
किरणों के हार पहनाती है

झिलमिल चांदनी चमके इत-उत
मन में उल्लास जगाए है
चांद की शीतलता भी अब
मन में आग लगाए है

बचपन की वो चंचलता
जा पहुंची अल्हड़ यौवन में
चंदा-चांदनी लुक-छुप खेलें
हर घर के कोने-आंगन में

रेगिस्तान की तपती भूमि
शीतलता पाती है अब
रेत का आभास जिसे था
चमक-चमक जाती है अब

तपते रेगिस्तान को रात ने
फिर से शीतल बनाया है
रेत को भी चंद्र किरण ने
चांदी सा चमकाया है

नदियों के धारे मुस्काए
चम-चम चमके तारों से
धवल चांदनी फैली इत-उत
शोभित है मनुहारों से

गंगा के आंचल पर चमके
ब्रह्मांड का गगन मंडल
शीतल, धवल चांदनी में अब
दूध सा श्वेत लगे है जल

बच्चा मांगे मां से अपनी
चंद्र खिलौना ला दो ना
हाथ बढ़ाकर उसे बुलाता
चंदा मामा आओ ना

जहां-जहां जाता है चंदा
वहीं चांदनी जाती है
एक पल को साथ न छूटे
यही चांदनी चाहती है

एक रात मिली अरमानों की
अगले क्षण भय जुदाई का
धीरे-धीरे छुपता है चंदा
साथ मिला हरजाई का

धीरे-धीरे घटता चंद्रमा
द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी को
निशा कालिमा डस जाएगी
प्रेमी-प्रियतम चंदा को

ओझल होते चंदा के चांदनी
छुपकर अश्रु बहाती है
कटेंगे कैसे विरह के क्षण
निशा सोच घबराती है

धीरे-धीरे छुपते चंदा को
अमावस रात गई निगल
प्रिय से दूर विह्वल चांदनी
हुई परबस, अधीर, विकल

अब तक आता जो चंदा तो
चांदनी खिल-खिल जाती थी
भोली सी मुस्कान बिखेर कर
मन में प्यार भर जाती थी

हंसती-खेलती रात सुहानी
अश्रु धारा बहाती है
कब आएगा उसका चंदा
विरह गीत वह गाती है

रात अंधियारी घोर कालिमा
नींद चुरा ले जाती है
कसक उठाती है मन में
व्याकुलता दे जाती है

दिन भी बीता, रातें बीतीं
मन को लेकिन चैन कहां
चंदा फिर मिलने को आए
ऐसी है वो रात कहां

चांद से दूर रहकर चांदनी
फीकी सी पड़ती जाती है
रात की रानी चंचल चांदनी
मरणासन्न हो जाती है

कितना प्यार करती है चांदनी
अपने प्रियतम चंदा से
चांद के छुपते ही वह रोती
गुम हो जाती धरती से

जाने किस बैरन का होकर
मुझको इतना सताता है
पूनम-अमावस का ये छलावा
जन्म-जन्म का नाता है

होगी कोई दूजी चांदनी
जिसको बैरी चाहता है
पूनम का चंदा बनकर
अमावस रात दे जाता है

जाओ चंदा कहे चांदनी
दूजे जग को चमकाओ
मैं तो आदी हूं रह लूंगी
कहीं और रात को महकाओ

चांदनी रोकर फीकी पड़ती
जाती है प्रतिपल-प्रतिक्षण
कब आएगी रात सुहानी
होगा जब फिर मधुर मिलन

चंदा भी कितना ठगता है
अपनी प्रेम दीवानी को
बार-बार मिलन सुख देकर
छलता अपनी रानी को

चंदा ठहरा शक्की मन का
हर क्षण परखे चांदनी को
कहीं चांदनी नहीं और की
दुविधा में पड़ जाता वो

इसलिए गायब हो जाता
छुप जाता है कहीं जाकर वो
वहीं बैठ हर रात वो ढूंढ़ता
दूजा नहीं कोई चंदा तो

उजली चांदनी फीकी पड़कर
कोयला होती जाती है
एक रात ऐसी भी आती
जब कालिख में मिल जाती है

देख चांद अधीर हुआ
अब जुदाई न सह पाए
अमावस रात गई अब तो
बस जल्द पूर्णिमा आ जाए

चंदा बन बैठा बैरागी
पल-पल याद सताए है
रात से मिलने को है उत्सुक
एक पल चैन न आए है

उसकी याद सताते ही
चंदा व्याकुल हो जाता है
दूजे जग का मोह छोड़कर
धीरे से सामने आता है

रात जो फीकी मन भी फीका
चांदनी गुमसुम बैठी है
आ जाए बस कहीं से चंदा
मन से हरदम कहती है

चुपके से देखा चंदा ने
ढूंढा अपनी चांदनी को
देखा उदास, फीकी है चांदनी
झट आया वो मिलने को

धीरे से झांका जो चंदा
चांदनी मंद मुस्काई है
विरह बेला बीत गई अब
मिलन रात फिर आई है

आज जो निकला नभ में चंदा
चांदनी के अधर मुस्काए हैं
धीरे से वह हंसकर बोली
आजा अब क्यूं सताए है

रोज देखता है चंदा अब
तिरछी-तिरछी नजरों से
धीरे-धीरे आएगा सामने
खेलेगा अपनी किरणों से

अमावस बाद जो निकला चंदा
चांदनी चमकी धीरे से
वापस आए प्रियतम का
स्वागत करती मुस्कानों से

रात की स्याही ओढ़े चांदनी
प्रेमी से बिछड़ तो जाती है
चंदा की झलक पाकर
वो मंद-मंद मुस्काती है

उदास चांदनी खिलती जाती
ज्यों-ज्यों चंदा मुख दिखलाता
विरह व्यथा के बाद मिलन है
ये पूनम रात का वादा

आंख-मिचौली करके रात में
जब निकले है पूरा चांद
हंसकर बिखेरती अपनी किरणें
चांदनी करती है मधुर गान

चांदनी के अधरों पर फूटी
मुस्कानों की मधुर हंसी
झूम-झूम आलिंगन करती
कण-कण में है रची-बसी

रात से मिलकर गले चांदनी
फिरसे अब मुस्काई है
अब चंदा रहेगा उसका
सोच-सोच हर्षाई है।

रविवार, 7 अक्टूबर 2007

हकीकत

रेत के टूटे बिखरे साए
जीवन में ये कब जुड़ पाए
कोई हकीकत में न उतरा
आंखों ने जो ख्वाब दिखाए

चेहरे पर था चेहरा दूजा
खोट ही खोट था मन में गहरा
पीती रही तेरे दर्दों को
तूने ही फिर जख्म खिलाए

बादल को जीवन समझी थी
कोहरे को आचल समझी थी
प्यास बुझी न तनमन भीगा
कोहरा हटा तो नग्न थे साए

जीवन तू मत पूछ पहेली
तेरी-मेरी थी खूब सहेली
छाया जब घलघोर अंधेरा
उजियारों ने दीप बुझाए

चाचा के शांत होने पर

रोज निकलता है सूरज
आज नहीं निकला
अस्त कर गया
वो सितारा
जो था घर का भानु
जिससे मिलता था जीवन
सभी सदस्यों को
जिसके टिमटिमाते प्रकाश से
रोशन होता था पूरा घर
अब कहां से आएगा वह प्रकाश
कौन दूर करेगा अंधकार
कौन दिखाएगा दीप
अंधेरी रातों में
किस बुलंद इमारत के नीचे
सिर छुपाएंगे बच्चे
कभी नहीं सज पाएगा
मां का आंचल
वक्त ने बना दिया उसे
संगमरमर की मूरत

सोमवार, 17 सितंबर 2007

रात के 1.10 बजे हैं

गुडनाइट

पड़ाव

पड़ाव
जीवन की दौड़
न जाने
कब, कैसे, कहां खत्म हो
किसी को नहीं पता
हम...भागीदार बन गए हैं
इस...दौड़ के
जबसे चले हैं
बस चलते ही जा रहे हैं
पड़ाव की
आकांक्षा में
कठिनाइयों से जूझते
तूफानी राहों में भी
मन की ज्योति
प्रज्वलित किए
निरंतर...चल रहे हैं
न जाने कब तक
चलते रहेंगे...यूं ही
संभवतया
कभी पड़ाव मिल जाए
पर क्या...
वो दौड़ खत्म हो जाएगी
नहीं...
दौड़ गतिमय रहेगी
भागीदार बदल जाएंगे
क्योंकि
चलना ही है
जीवन का दूसरा नाम
ठहरना...अर्थ
दौड़ का अंत
अर्थ...
जीवन का अंत