मंगलवार, 1 मार्च 2011

आस........वीना

वो रोज जलाती है 
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी 
मुस्कुराहटों  की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से 
पकाती है दाल
रख देती है 
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
सिल पर घिसकर
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए 
दाल-भात