मंगलवार, 22 जून 2010

तुमने कहा था......

कल आपके लिए मीर तकी मीर साहब की गजल प्रस्तुत थी आज मेरी एक कविता है.....


तुमने कहा था

तुमने कहा था
कभी आत्म विश्वास

मत खोना
मैं हूं तुम्हारे साथ
मैं चलती रही

अंगारों पर
तूफान में घिरी

नाव का तरह
खाती रही हिचकोले
टकराती रही
चट्टानों से
लड़ती रही
लहरों के थपेड़ों से
लड़ते-लड़ते

हो गया चूर
आत्म विश्वास
तुमने कहा था
कभी मत हारना
मैं चोट खाती गई
खेलती गई
जुआरी की तरह
उम्मीद में

कुछ मिलने की
मैं हार गई
जीवन का जुआ
लेकिन

नहीं बनी युधिष्ठिर
तुमने कहा था
कभी मत थकना
मैं चलती गई
रात-दिन, सर्दी-गर्मी
सब कुछ सहती गई
पांव के छाले फूटकर
बन गए घाव
लेकिन उन्हें
नहीं बनने दिया नासूर
तुमने कहा था
कभी झूठ मत बोलना
मैं घिरती गई
षडयन्त्रों के जाल में
खाती रही मार
वक्त की
संघर्ष करती रही
हरिश्चंद्र बनने के लिए
तुमने कहा था
किसी का

बुरा मत करना
मैने चुपचाप सहे
गैरों के ताने
अपनों से मिला अपमान
जख्मों पर मरहम लगाए
करती रही प्रयास
अच्छा करने का
तुमने कहा था
इंसान बनना
इस झूठी दुनिया में
जहां पाप फलता है
सच जलता है
भावनाएं हाथ मलती हैं
इंसान खलता है
मैने खुद को
नहीं बनने दिया हैवान
निराश भी नहीं हूं
लडख़ड़ाई थी एक बार
नहीं गिरूंगी बार-बार
तुम साथ हो तो
फिर पनपेगा

आत्म विश्वास
जीत हमारी होगी
लड़ूंगी जीवन से
सच के लिए
अंतिम सांसों तक
और बनूंगी इंसान
क्योंकि.....

तुमने कहा था

सोमवार, 21 जून 2010

मीर तकी मीर साहब की गजल आपकी खिदमत में पेश है

मीर तकी मीर साहब की गजल

हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।

चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

मीरउन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।

हुबाब-बुलबुले, सराब-भ्रम, इज्तेराब- चिंता. नीमबाज- अधखुली

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरते-युसुफ़ है ये वक़्ते-अज़ीज़
मीर इसको रायगाँ खोता है क्या

कठिन श्ब्दों के अर्थ
राहे-दूरे-इश्क़----- इश्क़ के लम्बे रास्ते
सब्ज़-----हरी, सरज़मीं-----धरती
तुख़्मे-ख़्वाहिश -----इच्छाओं के बीज
वक़्ते-अज़ीज़------बहूमूल्य समय
रायगाँ------फ़िज़ूल--बेकार---व्यर्थ

साभार.....हिंदयुग्म

इमरोज-अमृता.......जीवन के कुछ पहलू, कुछ रंग

प्रस्तुत है.... प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़जी से रश्मि प्रभा की मुलाकात के कुछ अंश। साभार-हिंदयुग्म

रोज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?

इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?

इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह
कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ

लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?

इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है

सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं.

कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है.
मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छूट गया है, पर संस्कार नहीं छूंट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रही! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है, वह हैरान तो है, मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सीख रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है, घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है, अपने आप का ख्याल रखना, मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है. पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?

इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?

इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती

ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....

वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है

मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है

हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही ना,

सिर्फ जीने के लिए ही है ....

जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?

इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में
आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....
किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है

आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं

शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?

मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......

वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए

तब अपने आप से शिकायत होती रही है....

दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व

इमरोज़ - अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई

सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
उससे मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते
अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....