मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जीवन कलाकार का

चमक लो. थिरक लो
जितना चाहे आज
पूछूंगी कल
जब नहीं रहेगी यह चमक
नहीं थिरक सकेंगे
ये पांव
न बचेगा साज
न होगी आवाज
न बचेगी स्याही
कलम में
कुछ पन्नें होंगे खाली
जिसको इच्छा होगी
भरने की
अपनी ये हालत बताने की
पर नही बता सकोगे कल
पड़े रहोगे किसी कोने में
'आउट आफ डेट' हुए
फटे-पुराने कपड़ों की
गठरी की तरह
खांस-खांसकर
जीना मुहाल कर दोगे
घर वालों का
न होगा कोई रखवाला
कढ़िल-कढ़िलकर
दम तोड़ दोगे
टूट गाएगी वीणा
सिसकेंगे घुंघरू
हो सकता है मरने पर
तुम्हारा ये अछूता शरीर
रख दिया जाए
अंतिम दर्शन के लिए
फूल-माला पहना दें ये नेता
यह कहकर श्रद्धांजलि दें
यह है
कला जगत की अपूर्णीय क्षति
कुछ सालों बाद
राजनीतिक जरूरत आन पड़ने पर
हो सकता है
'पदमश्री' भी मिल जाए
लेकिन तब तक
तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा
अभावों में जी रहे होंगे परिजन
कोसेंगे तुम्हें
तुम्हारे कलाकार होने पर
क्योंकि
न जोड़ सके तुम एक दमड़ी
उनके लिए
न कर सके दायित्व पूरा
मुखिया होने का
क्या रखा है ऐसी कला में
या कलाकार के जीने-मरने में
इसीलिए कहती हूं
छोड़ दो ये जीवन
कमाओ दो जून की रोटी
स्वयं जैसा
भला नहीं है ये संसार
क्योंकि बाबू
यही है जग का नियम
यहां की रीति है करना
प्रणाम उगते सूऱज को
कोई सुधि नहीं लेता
ढलते सूरज की
डूबते सूरज का
पता लगता है तब
जब हो जाता है अंधकार
बजती हैं मंदिर की घंटियां
होती है अजान

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान

बच्चे राष्ट्र की शान
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट
चीथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें ....
मुस्काती हैं
बिलखते हुए
चलने का अभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों
चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये... मासूम नजरें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
लेकिन... आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके मुस्कराते चेहरे पर
जो खाई से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
होंठ
भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती हैं
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अन्त
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान