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सोमवार, 18 जनवरी 2021

 

अल्हड़पन


वक्त के साथ जाने कहां खो गया

तेरा अमड़ेलापन और मेरा शहतूती अल्हड़पन

मन की गौरैया भी जाने कहां उड़ गई

छौने दहशत में हैं

कास से नहीं लहराते हम

दूब से नहीं तने हम

आओ फिर से बो दें

चाहत के बीज

पीछे वाले उजड़े जंगल में

         वीना श्रीवास्तव

         18.1.21

 


शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बेबस मन..........वीना....

आजकल  
भागता है मन 
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में 
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है 
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग 
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

प्यार का दामन....वीना

मन को बांधो 
भावनाएं साथ चलेंगी
ह्रदय भरेगा उड़ान
रोशनी के
किनारे होंगे
दीपों की राह पर
हौसलों के कदम होंगे
किरणों के धागे
बांधेगे नया जीवन
चांदनी को पीते जाओ
तृप्ति की बूंद तक
कण-कण में
रचते-बसते हुए
मिल जाए कहीं अगर
प्यार का दामन
दो दिशाएं भी
साथ चलेंगी