रेत के टूटे बिखरे साए
जीवन में ये कब जुड़ पाए
कोई हकीकत में न उतरा
आंखों ने जो ख्वाब दिखाए
चेहरे पर था चेहरा दूजा
खोट ही खोट था मन में गहरा
पीती रही तेरे दर्दों को
तूने ही फिर जख्म खिलाए
बादल को जीवन समझी थी
कोहरे को आचल समझी थी
प्यास बुझी न तनमन भीगा
कोहरा हटा तो नग्न थे साए
जीवन तू मत पूछ पहेली
तेरी-मेरी थी खूब सहेली
छाया जब घलघोर अंधेरा
उजियारों ने दीप बुझाए
6 टिप्पणियां:
इन बुझे दीपों को ही जलाना है ...मान के भावों को खूबसूरती से लिखा है
बहुत ही खूबसूरत कविता।
सादर
बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।
udasi bhare ...thahre bhaav ..
bahut sunder ehsaas..
बादल को जीवन समझी थी
कोहरे को आचल समझी थी
प्यास बुझी न तनमन भीगा
कोहरा हटा तो नग्न थे साए
pyari si kavita.......
behtareen bhawo ko samete hue:)
गहन भावों की खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
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