रविवार, 7 अक्टूबर 2007

हकीकत

रेत के टूटे बिखरे साए
जीवन में ये कब जुड़ पाए
कोई हकीकत में न उतरा
आंखों ने जो ख्वाब दिखाए

चेहरे पर था चेहरा दूजा
खोट ही खोट था मन में गहरा
पीती रही तेरे दर्दों को
तूने ही फिर जख्म खिलाए

बादल को जीवन समझी थी
कोहरे को आचल समझी थी
प्यास बुझी न तनमन भीगा
कोहरा हटा तो नग्न थे साए

जीवन तू मत पूछ पहेली
तेरी-मेरी थी खूब सहेली
छाया जब घलघोर अंधेरा
उजियारों ने दीप बुझाए

6 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

इन बुझे दीपों को ही जलाना है ...मान के भावों को खूबसूरती से लिखा है

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत कविता।

सादर

vandana gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।

Anupama Tripathi ने कहा…

udasi bhare ...thahre bhaav ..
bahut sunder ehsaas..

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

बादल को जीवन समझी थी
कोहरे को आचल समझी थी
प्यास बुझी न तनमन भीगा
कोहरा हटा तो नग्न थे साए

pyari si kavita.......
behtareen bhawo ko samete hue:)

Dorothy ने कहा…

गहन भावों की खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.