लेकिन कहां?
शायद तुममे?
तुम्हारी यादों में
तुम्हारे विचारों में
नहीं ..
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे या हमारे?
तुम्हारा जीवन
मेरा जीवन है
तो मैं खोई कहां?
तुममे खोकर ही तो
पाया है तुम्हे
मिली हूं खुद से
मैं पल-पल खोती हूं
फिर पाती हूं
स्वयं को
तुम्हारे अंदर
जीती हूं
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे साथ
लम्बे समय बाद पुन: आपके साथ हूं। यकीन मानिए या तो समय पंखों पर सवार था या जीवन चल रहा था कछुए की गति। यूं कहूं या तो समय आगे निकल गया या जीवन पीछे रह गया। दोनो ही सूरत में आप सबसे दूर रही। अब चाहे समय को पंख लगें या वो खुद सवारी करे और जीवन चाहे खुद ही क्यों न कछुआ बन जाए लेकिन दोस्तों कछुआ कभी नहीं हारता। सभी दोस्तों को आने वाले त्यौहारों-उत्सवों के लिए ढेर सारी, खूब सारी बधाइय़ां।

6 टिप्पणियाँ:
अच्छी कविता लिखी है आपने। यह सिलसिला अब निरंतर बना रहेगा, ऐसी उम्मीद है।
फिर पाती हूं
स्वयं को
तुम्हारे अंदर
जीती हूं
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे साथ
बहुत ही बढ़िया।
-----------
कल 24/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
सुन्दर कविता...
है न कितनी अजीब सी बात ..... मेरी रचना को भी आज ही शामिल किया गया है " नयी पुरानी हलचल में '.... हालाँकि ये रचना अपने ब्लॉग में कुछ दिन पहले डाली थी ..... हमारे विचार कितना मेल खा रहे हैं.... दोनों कविताओं का सार मिलता है कितना .... स्वयं आ केर देखें ..........
बहुत अच्छा लिखा है ..
फिर पाती हूं
स्वयं को
तुम्हारे अंदर
जीती हूं
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे साथ
behatreen kavita....
एक टिप्पणी भेजें