पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट
चीथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें ....
मुस्काती हैं
बिलखते हुए
चलने का अभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों
चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये... मासूम नजरें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
लेकिन... आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके मुस्कराते चेहरे पर
जो खाई से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
होंठ
भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती हैं
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अन्त
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान
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