मीर तकी मीर साहब की गजल
हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।
चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।
बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।
मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।
‘मीर’ उन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।
हुबाब-बुलबुले, सराब-भ्रम, इज्तेराब- चिंता. नीमबाज- अधखुली
राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या
क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या
ग़ैरते-युसुफ़ है ये वक़्ते-अज़ीज़
मीर इसको रायगाँ खोता है क्या
कठिन श्ब्दों के अर्थ
राहे-दूरे-इश्क़----- इश्क़ के लम्बे रास्ते
सब्ज़-----हरी, सरज़मीं-----धरती
तुख़्मे-ख़्वाहिश -----इच्छाओं के बीज
वक़्ते-अज़ीज़------बहूमूल्य समय
रायगाँ------फ़िज़ूल--बेकार---व्यर्थ
साभार.....हिंदयुग्म
4 टिप्पणियां:
आगे-आगे देखिए होता है क्या यह लाइन तो पता थी....पहली लाइन बताने का शुक्रिया..
खूबसूरत प्रस्तुति आभार ।
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। लेखन मेरी आत्मा है....एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ है...तुम और मैं.... दूसरा जल्द ही प्रकाशित होगा। उम्मीद है आपके अनुभव का लाभ और मार्ग दर्शन मिलता रहेगा
धन्यवाद पूजा
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