मंगलवार, 1 मार्च 2011

आस........वीना

वो रोज जलाती है 
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी 
मुस्कुराहटों  की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से 
पकाती है दाल
रख देती है 
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
सिल पर घिसकर
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए 
दाल-भात

87 टिप्पणियाँ:

यशवन्त माथुर ने कहा…

यही तो होती है आस ...एक उम्मीद...जो आज नहीं शायद कल मिल जाए.

बहुत अच्छी लगी यह कविता.

सादर

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

बहुत अच्छी कविता.
सादर...........

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी

armano ke ashk...ye pankti ek dum se padh kar dil ko chhoo gaya..:)

bahut pyari rachna!

Dilbag Virk ने कहा…

bhartiy smaj men nari ki dasha aur nari ki mhanta ka steek chitran karti sarthak kavita

निर्मला कपिला ने कहा…

बस उमीद पर दुनिया कायम है।

: केवल राम : ने कहा…

चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी

नए बिम्बों का प्रयोग और सटीक अभिव्यक्ति के साथ रची गयी कविता , कहीं पर जाकर समर्पण के भाव को दर्शाती है ,और कहीं लगता है की दिल की टीस उभर आई है , पर पूरी कविता ग्रामीण भाव बोध को सटीक अभिव्यक्ति देती है .....

shalusri ने कहा…

सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
बहुत ही खूबसूरती के साथ लिखा है...
अरमानों के भात
बहुत बढ़िया

shaan ने कहा…

उम्मीद ही तो जीवन देती है। और आपने उम्मीद को जिंदा रखा है
लाजवाब रचना...

Vijai Mathur ने कहा…

बजट के बाद एक गरीब गृहणी की व्यथा-कथा को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है.

nilesh mathur ने कहा…

बहुत ही मार्मिक और बेहतरीन अभिव्यक्ति!

vijay ने कहा…

अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
क्या खूब लिखा है
कोई जवाब नही आपका
जितना अच्छी रोमेंटिक कविताएं लिखती हैं उतनी ही सुंदरता से जीवन की बारीकियां उकेरती हैं। वाकई में वीणा के तार खनकते हैं आपके सुर में
आपकी लेखनी के सलाम

aastha ने कहा…

चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात
हिंदुस्तान की अधिकांश जनता की दास्तां..और आस जिंदा रखती है यह है जनता का विश्वास
आस पर ही हम कायम हैं...
बहुत खूबसूरत रचना

राजेंद्र तिवारी ने कहा…

वह तोड़ती पत्थर
इलाहाबाद के पथ पर....

radha ने कहा…

बहुत सही चित्रण
क्या कहूं
कोई शब्द नहीं
एक ही शब्द
अतिसुंदर

रश्मि प्रभा... ने कहा…

aashanwit muskaan ke aage aankhon se kuch tapka ... dekhna mat

रंजना ने कहा…

मंहगाई,देश की राजनितिक दुर्दशा से पीड़ित मन पर आपकी ये रचना जैसे फुहार सी पडी..लगा जैसे मन अभिव्यक्त हो पाया...

आपकी इस रचना की प्रशंसा शब्दों में बाँध मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत न कर पाउंगी...

ईश्वर आपकी कलम को प्रखरता दें....

आप ऐसे ही सुन्दर सार्थक रचती रहें....

girish pankaj ने कहा…

poori kavitaa aapkee samvedanaon ka sansparsh kari hui khadee hotee hai. aur dil ko chhoo letee hai. badhai.

एस.एम.मासूम ने कहा…

एक अच्छी कविता. वीणा जी यही तो दुनिया है..

lokendra singh rajput ने कहा…

वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से...........
सच ही कहा है...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन का पेट तो भर ही जाता है ऐसे।

आशुतोष ने कहा…

शब्द आप के हैं मगर ये पीड़ा ८० करोड़ हिन्दुस्तानियों की है जो रोज २० रूपये से कम पर जीते हैं..
सुन्दर रचना

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत अच्छी लगी यह कविता| धन्यवाद|

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना...

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

अच्छे कल की चिरस्मरणीय आस...

'साहिल' ने कहा…

सच्ची कविता......

कुमार राधारमण ने कहा…

हज़ारों-लाखों की कथा-व्यथा। दम तोड़ती मानवता और आंकड़ों के खेल में लगी व्यवस्था।

muskan ने कहा…

Bahut Sundar...

सुबीर रावत ने कहा…

आपके ब्लॉग पर एक सुन्दर कविता पढने को मिलेगी इस आस में रोज खोलता हूँ ब्लॉग. ........ देश की स्थिति को बयां करती आपकी यह कविता तो एक पूरा दस्तावेज लगता है वीणा जी........ आभार.

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
मार्मिक भावों की प्रभावी अभिव्यक्ति ....... मन को दिलासा देती ऐसी उम्मीदें ना जाने कब पूरी होंगीं....

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

वीना जी!
आपका लेखन सराहनीय हैं।
इस शमा को जलाए रखिए।
-डॉ0 डंडा लखनवी

' मिसिर' ने कहा…

उम्मीद अच्छी है कि - जिंदा रखती है,
लेकिन बुरी है - कि इसीमें ज़िंदगी कट भी जाती है !
बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने !

क्षितिजा .... ने कहा…

वाह !! क्या शब्द दिए हैं आपने ... बहुत खूब .. एक आस ही है जिस के भरोसे हम सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं .. :(

JAY SHANKER PANDEY ने कहा…

marvellous work.

अजय कुमार ने कहा…

जाने कब पूरी होगी ये आस

Dr Varsha Singh ने कहा…

अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी

बेहतरीन अभिव्यक्ति!
आपके विचारों का मेरे ब्लॉग्स पर सदा स्वागत है।

sandhya ने कहा…

यही तो होती है एक माँ की आस ...वो पकाती है अरमानो के भात... सुन्दर प्रस्तुति..बहुत ही मार्मिक और बेहतरीन अभिव्यक्ति...

ehsas ने कहा…

हमारे देश ना जाने कितनों के साथ ऐसा ही होता है। सच्चाई बयां करती खुबसुरत रचना। आभार।

mridula pradhan ने कहा…

bahut bhawpurn.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

आशा और उम्मीद का संचार करती अच्छी और थोड़ी चटपटी रचना.

वीना ने कहा…

यशवंत जी, भाकुनी जी,मुकेश जी,दिलबाग जी, केवल जी,निर्मला जी,शालू जी, शान जी, विजय माथुर जी,नीलेश जी, विजय जी,आस्था जी, राजेंद्र जी,राधा जी आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद

वीना ने कहा…

रश्मि जी, रंजना जी,गिरीश जी, मासूम जी, लोकेंद्र जी,प्रवीण जी. आशुतोश जी, पटाली द विलेज, महफूज जी, सुशील जी,साहिल जी, राधारमण जी, मुस्कान जी,सुबीर जी, मोनिका जी, डा.लखनवी जी,मिसिर जी, क्षितिजा जी, जय शंकर पांडेय जी,अजय़ जी, डा.वर्षा,संध्या जी, एहसास जी, मृदुला जी और कुसुमेश जी आप सबका अपना कीमती समय निकालकर आने और विचार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद....

अभिषेक मिश्र ने कहा…

आस पर ही टिकी होती है कई लोगों की जिंदगी. भावपूर्ण पंक्तियाँ.

इमरान अंसारी ने कहा…

वीणा जी,

बहुत ही सुन्दर.....कितने मार्मिक ढंग से शब्दों में इतना कडवे सच को बांधा है आपने.....मेरा सलाम आपको इस पोस्ट के लिए|

Rajiv ने कहा…

वीणा जी,
वाकई अद्भुत चित्रण है जीवन के एक अंधरे पक्ष का.अंतर को झकझोरने वाली रचना.

रानी पात्रिक ने कहा…

सुन्दर रचना। भावनाओं का सुन्दर चित्रण। बधाई।

हमारे ब्लाग तक आने के लिए धन्यवाद। आप जैसे लोगों की प्रेरणा से ही लिखना हो जाता है वरना शब्द सब मन में ही धरे रह जाते है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

कठिन परिस्थितियों में भी इन्सान किस जीवटता के
साथ ज़िम्मेदारियां उठाता है बहुत सुन्दर कविता.

आग़ाज़.....नयी कलम से... ने कहा…

bhut sundar.....

nida fazli sahab ki ek line yad aati hai-

बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ.
याद आती है चौका- बासन, चिमटा, फुकनी जैसी माँ...

anurag anant ने कहा…

vo jaisi thi us jaisi aur kanha mili , bahut dhoonda par maa ke baad maa kanha mili ,

Amit K Sagar ने कहा…

उत्कृष्ट. आपके लिखने की अलग ही शैली को भी दर्शाती है ये रचना.
--
व्यस्त हूँ इन दिनों-विजिट करें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वो माँ है .. बहन है ... पत्नी है ... नारी है ... तभी तो ये सब कर पाती है .... अच्छी रचना है ..

Nityanand Gayen ने कहा…

आदरणीय वीणा जी , धन्यवाद . आपको अनुसरण करते हुए खुशी हो रही है . आपकी कवितायों पर टिप्पणी देने क लिए अभी समय लगेगा
क्योंकि अभी मैं सीखने के दौड़ से गुजर रहा हूं और आपसे भी सीखूंगा .

संतोष पाण्डेय ने कहा…

दिल को छू लेनेवाली कविता के लिए बधाई और विश्व महिला दिवस की शुभकामनायें.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बढ़िया.
महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

हरीश सिंह ने कहा…

आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए तथा प्रत्येक भारतीय लेखको को एक मंच पर लाने के लिए " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" का गठन किया गया है. आपसे अनुरोध है कि इस मंच का followers बन हमारा उत्साहवर्धन करें , साथ ही इस मंच के लेखक बन कर हिंदी लेखन को नई दिशा दे. हम आपका इंतजार करेंगे.
हरीश सिंह.... संस्थापक/संयोजक "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच"
हमारा लिंक----- www.upkhabar.in/

हरकांड ने कहा…

प्रति वर्ष आठ मार्च को, भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां में "महिला दिवस" के रूप में मनाया जाता है, महिला दिवस को मनाए जाने से पूर्व ही आपने भारतीय महिलाओं कि बेबसी,लाचारी,त्याग,
और बलिदान को शब्दों में पिरो कर अपनी रचना के माध्यम से उजागर करने का जो सफल प्रयास किया है.उसके लिए कोटि कोटि धन्यवाद...

archit pandit ने कहा…

bahut accha hai
join me www.architpandit.blogspot.com

Ajit Singh Taimur ने कहा…

veena ji aapke profile mein maine dekha ki aapne 50 se zyada blogs ko follow kar rakha hai ......aap kaise itne blogs ko padh paati hogi .....aur fir comments karti hongi / kya ye sirf ek tareeka hai zyada se zyada logon ko apna follower banane ka ...unka blog follow karo jisse ki wo aapka blog follow karen ...kya hamein bhi yahi sab karna padega .....apne followers ki sankhya badhaane ke liye .......
kripaya is shanka ka samadhaan karein ....
saadar
ajit

ishwar khandeliya ने कहा…

क्या बात कही है आपने वीणा जी ऐसा लगा मानो जीवन के सत्य से साक्षात्कार हो रहा हो
आपकी रचनाशीलता को शत शत नमन
ईश्वर खंदेलिया

वीना ने कहा…

अजित जी,
इसमें इतनी हैरानी की बात नहीं है..जिसकी एक भी रचना चाहे पहली बार में ही पसंद क्यूं न आए, मैं उसे फॉलो करती हूं...ये जरूरी नहीं कि वो भी हमें फॉलो करे...ऐसे बहुत लोग हैं जिन्हें मैं फॉलो कर रही हूं और उनके बंलॉग पर जाकर टिप्पणी भी करती हूं...और नियमित रूप से पढ़ती हूं...अपने डेश बोर्ड को हमेशा देखती हूं....सब लोग एकसाथ भी नहीं लिखते...जब कभी बहुत व्यस्त होती हूं या किसी भी अन्य वजह से ब्लॉग पर नहीं आ पाती तो मुआफी भी मांग लेती हूं। यह अपनी रुचि पर निर्भर करता है...मैं समय देती हूं...अपने फॉलोअर का ध्यान भी रखती हूं ....थोड़ी बहुत देर चलती है...पर ज्यादा नहीं, अभी मैं फिर होली के बाद 15 दिन बाहर रहूंगी तो पिछली पोस्ट आकर देखूंगी। या जो डैश बोर्ड में रहेंगे मैं उनको जरूर पढ़ूंगी। ई मेल द्वारा आई हुई मैं रचनाएं जरूर पढ़ती हूं...
मैने आपको भी पहली बार में फॉलो किया.. क्योंकि छोटी के बच्ची के माध्यम से जो संस्मरण आपने लिखा वह काबिले तारीफ है...
जहां तक बात अपने ब्लॉगर भाई-बंधु को आमंत्रण देने की है, वह मैं देती हूं और आगे दूंगी भी... ...वह शिष्टता है। यहां ऐसे भी ब्लॉगर हैं जो दो सौ-ढाई सौ, न जाने कितने ब्लॉग्स को फॉलो करते हैं...यह सवाल आपने उनसे नहीं पूछा कि कैसे वो मैनेज करते हैं और वो भी करते ही होंगे ..मैं किसी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहती, हां अपने बारे में मैं स्पष्ट हूं...मेरा कोई तरीका नहीं है बस जो भा गया उसे फॉलो किया, इससे दूसरे का उत्साह बढ़ता है और यह सच है...यहां कोई प्रतियोगिता नहीं है...जिसमें परिपक्वता जरूरी हो...महज एक रुचि है मन की चाहत है जिसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए...और मैं तो जिसकी गलती होती है(वर्तनी मे)उसकी गलती भी बताती हूं इस पर मुझसे यह भी कहा गया कि गलतियों को छोड़िए अपने लिखने पर ध्यान दीजिए...फिर भी मुझे कहीं किसी की गलती नजर आती है, मैं जरूर बताती हूं...हां उसके भावों पर कुछ नहीं कहती क्योंकि भाव सच्चे होते हैं और खुद के भी...लेकिन वर्तनी की गलती जरूर बताती हूं वह भी यह ध्यान रखते हुए कि खराब न लगे...और क्षमा भी मांगती हूं कि कहीं किसी के अहं को ठेस न पहुंचे। मेरा कोई खास तरीका नहीं है, जो भी है यही है, आप इसे कुछ भी कहें,मैं अपने आप में या कहें, जो करती हूं उसमें स्पष्ट हूं। आप बड़े हैं, समझदार हैं...आंख मूंदकर कुछ मत करिए जो समझ आए, ठीक लगे करिए...मुझे लगता है आपको जवाब मिल गया होगा...

राजेश उत्‍साही ने कहा…

कविता के भाव अच्‍छे लगे।

वीना ने कहा…

अभिषेक जी, इमरान जी, राजीव जी,रानी जी, वंदना जी, आगाज..नई कलम से,अनुराग जी, अमित जी, नासवा जी,नित्यानंद जी, कुसुमेश जी, संतोष जी,हरीश जी, हरकांड जी, अर्चित जी,अजित जी, खंडेलिया जी और राजेश जी आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद

ZEAL ने कहा…

बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात

hriday-sparshi panktiyaan

.

.

ghazalganga ने कहा…

आप तो बहुत अच्छी कवितायेँ लिखती हैं वीणा जी. कभी मेरी गजलों के ब्लॉग gazalganga.blogspot.com पर भी तशरीफ़ लायें

----देवेंद्र गौतम

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

वीना जी होली की शुभकामनाएं |

नेहा ने कहा…

बहुत ही मार्मिक है

Dr Varsha Singh ने कहा…

वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल...

सुन्दर प्रतीक ...बहुत सुन्दर....
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

amit-nivedita ने कहा…

laajawab..

ashish ने कहा…

झंझावत से लडती जिंदगी के उद्विग्न क्षणों में नैराश्य से उबरना , इन्सान के लिए सबसे दुष्कर कार्य है . आशा का संचार करती आपकी कविता मन को छू गयी . देर से आया लेकिन दुरुस्त आया .

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय वीणा जी
नमस्कार !
क्या बात कही है आपने
दिल को छू लेनेवाली कविता के लिए बधाई और विश्व महिला दिवस की शुभकामनायें.

संजय भास्कर ने कहा…

कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bahut hi acchi rachna .. ek sapne ko aankh me liye hue ...


badhayi sweekar kare..

---------

मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
"""" इस कविता का लिंक है ::::
http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आदरणीया वीना जी ,
आम आदमी के जीवन दर्द को उकेरती आपकी रचना बहुत ही प्रभावशाली है |
बधाई स्वीकारें |

शुभम जैन ने कहा…

bahut sundar kavita...
bitiya k blog ki follower banne ke liye shukriya...dekhiye aapne bulaya aur hum chale aaye, aap bhi aate rahiyega.

regards.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.
होली की हार्दिक शुभकामनायें.

यशवन्त माथुर ने कहा…

आप को सपरिवार होली की हार्दिक शुभ कामनाएं.

सादर

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

होली पर मैं आपको तथा परिवार के लिए मंगल कामनाएं करता हूँ !

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

वीणा जी , गहरे एहसास के साथ एक मर्म स्पर्शी कविता. सुंदर प्रस्तुति. होली की हार्दिक शुभकामनायें .
लघुकथा --आखिरी मुलाकात

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत मर्मस्पर्शी रचना...होली की हार्दिक शुभकामनायें!

राजेन्द्र राठौर ने कहा…

सुंदर कविता। जिसकी सुंदरता बयां करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं हैं।

सारा सच ने कहा…

nice

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

वीना जी!
बहुत मर्मस्पर्शी रचना...

शोभना चौरे ने कहा…

यही तो है मेरा भारत महान |
सशक्त अबिव्यक्ति \

Amit K Sagar ने कहा…

अगले सृजन के इंतज़ार में!
---
मैं शादी क्यों करूं...? Its All About Marriage DEBATE @ उल्टा तीर

Sunil Kumar ने कहा…

वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
बहुत बढ़िया.....

दीप ने कहा…

अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी


बहुत अच्छी कविता

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

शायद इसी लिए कहते हैं कि आशा ही जीवन है।

............
ब्‍लॉगिंग को प्रोत्‍साहन चाहिए?
लिंग से पत्‍थर उठाने का हठयोग।

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

Umeed ki kiran jagati bahut hi bhavprad evam sarthak kavita........ sunder prastuti.