वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
सिल पर घिसकर
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
सिल पर घिसकर
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात
87 टिप्पणियाँ:
यही तो होती है आस ...एक उम्मीद...जो आज नहीं शायद कल मिल जाए.
बहुत अच्छी लगी यह कविता.
सादर
बहुत अच्छी कविता.
सादर...........
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
armano ke ashk...ye pankti ek dum se padh kar dil ko chhoo gaya..:)
bahut pyari rachna!
bhartiy smaj men nari ki dasha aur nari ki mhanta ka steek chitran karti sarthak kavita
बस उमीद पर दुनिया कायम है।
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
नए बिम्बों का प्रयोग और सटीक अभिव्यक्ति के साथ रची गयी कविता , कहीं पर जाकर समर्पण के भाव को दर्शाती है ,और कहीं लगता है की दिल की टीस उभर आई है , पर पूरी कविता ग्रामीण भाव बोध को सटीक अभिव्यक्ति देती है .....
सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
बहुत ही खूबसूरती के साथ लिखा है...
अरमानों के भात
बहुत बढ़िया
उम्मीद ही तो जीवन देती है। और आपने उम्मीद को जिंदा रखा है
लाजवाब रचना...
बजट के बाद एक गरीब गृहणी की व्यथा-कथा को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है.
बहुत ही मार्मिक और बेहतरीन अभिव्यक्ति!
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
क्या खूब लिखा है
कोई जवाब नही आपका
जितना अच्छी रोमेंटिक कविताएं लिखती हैं उतनी ही सुंदरता से जीवन की बारीकियां उकेरती हैं। वाकई में वीणा के तार खनकते हैं आपके सुर में
आपकी लेखनी के सलाम
चटनी की सुगंध के साथ
खुद चाट लेती है सिल
पीकर पानी
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात
हिंदुस्तान की अधिकांश जनता की दास्तां..और आस जिंदा रखती है यह है जनता का विश्वास
आस पर ही हम कायम हैं...
बहुत खूबसूरत रचना
वह तोड़ती पत्थर
इलाहाबाद के पथ पर....
बहुत सही चित्रण
क्या कहूं
कोई शब्द नहीं
एक ही शब्द
अतिसुंदर
aashanwit muskaan ke aage aankhon se kuch tapka ... dekhna mat
मंहगाई,देश की राजनितिक दुर्दशा से पीड़ित मन पर आपकी ये रचना जैसे फुहार सी पडी..लगा जैसे मन अभिव्यक्त हो पाया...
आपकी इस रचना की प्रशंसा शब्दों में बाँध मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत न कर पाउंगी...
ईश्वर आपकी कलम को प्रखरता दें....
आप ऐसे ही सुन्दर सार्थक रचती रहें....
poori kavitaa aapkee samvedanaon ka sansparsh kari hui khadee hotee hai. aur dil ko chhoo letee hai. badhai.
एक अच्छी कविता. वीणा जी यही तो दुनिया है..
वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से...........
सच ही कहा है...
मन का पेट तो भर ही जाता है ऐसे।
शब्द आप के हैं मगर ये पीड़ा ८० करोड़ हिन्दुस्तानियों की है जो रोज २० रूपये से कम पर जीते हैं..
सुन्दर रचना
बहुत अच्छी लगी यह कविता| धन्यवाद|
बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना...
अच्छे कल की चिरस्मरणीय आस...
सच्ची कविता......
हज़ारों-लाखों की कथा-व्यथा। दम तोड़ती मानवता और आंकड़ों के खेल में लगी व्यवस्था।
Bahut Sundar...
आपके ब्लॉग पर एक सुन्दर कविता पढने को मिलेगी इस आस में रोज खोलता हूँ ब्लॉग. ........ देश की स्थिति को बयां करती आपकी यह कविता तो एक पूरा दस्तावेज लगता है वीणा जी........ आभार.
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
मार्मिक भावों की प्रभावी अभिव्यक्ति ....... मन को दिलासा देती ऐसी उम्मीदें ना जाने कब पूरी होंगीं....
वीना जी!
आपका लेखन सराहनीय हैं।
इस शमा को जलाए रखिए।
-डॉ0 डंडा लखनवी
उम्मीद अच्छी है कि - जिंदा रखती है,
लेकिन बुरी है - कि इसीमें ज़िंदगी कट भी जाती है !
बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने !
वाह !! क्या शब्द दिए हैं आपने ... बहुत खूब .. एक आस ही है जिस के भरोसे हम सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं .. :(
marvellous work.
जाने कब पूरी होगी ये आस
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
बेहतरीन अभिव्यक्ति!
आपके विचारों का मेरे ब्लॉग्स पर सदा स्वागत है।
यही तो होती है एक माँ की आस ...वो पकाती है अरमानो के भात... सुन्दर प्रस्तुति..बहुत ही मार्मिक और बेहतरीन अभिव्यक्ति...
हमारे देश ना जाने कितनों के साथ ऐसा ही होता है। सच्चाई बयां करती खुबसुरत रचना। आभार।
bahut bhawpurn.
आशा और उम्मीद का संचार करती अच्छी और थोड़ी चटपटी रचना.
यशवंत जी, भाकुनी जी,मुकेश जी,दिलबाग जी, केवल जी,निर्मला जी,शालू जी, शान जी, विजय माथुर जी,नीलेश जी, विजय जी,आस्था जी, राजेंद्र जी,राधा जी आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद
रश्मि जी, रंजना जी,गिरीश जी, मासूम जी, लोकेंद्र जी,प्रवीण जी. आशुतोश जी, पटाली द विलेज, महफूज जी, सुशील जी,साहिल जी, राधारमण जी, मुस्कान जी,सुबीर जी, मोनिका जी, डा.लखनवी जी,मिसिर जी, क्षितिजा जी, जय शंकर पांडेय जी,अजय़ जी, डा.वर्षा,संध्या जी, एहसास जी, मृदुला जी और कुसुमेश जी आप सबका अपना कीमती समय निकालकर आने और विचार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद....
आस पर ही टिकी होती है कई लोगों की जिंदगी. भावपूर्ण पंक्तियाँ.
वीणा जी,
बहुत ही सुन्दर.....कितने मार्मिक ढंग से शब्दों में इतना कडवे सच को बांधा है आपने.....मेरा सलाम आपको इस पोस्ट के लिए|
वीणा जी,
वाकई अद्भुत चित्रण है जीवन के एक अंधरे पक्ष का.अंतर को झकझोरने वाली रचना.
सुन्दर रचना। भावनाओं का सुन्दर चित्रण। बधाई।
हमारे ब्लाग तक आने के लिए धन्यवाद। आप जैसे लोगों की प्रेरणा से ही लिखना हो जाता है वरना शब्द सब मन में ही धरे रह जाते है।
कठिन परिस्थितियों में भी इन्सान किस जीवटता के
साथ ज़िम्मेदारियां उठाता है बहुत सुन्दर कविता.
bhut sundar.....
nida fazli sahab ki ek line yad aati hai-
बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ.
याद आती है चौका- बासन, चिमटा, फुकनी जैसी माँ...
vo jaisi thi us jaisi aur kanha mili , bahut dhoonda par maa ke baad maa kanha mili ,
उत्कृष्ट. आपके लिखने की अलग ही शैली को भी दर्शाती है ये रचना.
--
व्यस्त हूँ इन दिनों-विजिट करें
वो माँ है .. बहन है ... पत्नी है ... नारी है ... तभी तो ये सब कर पाती है .... अच्छी रचना है ..
आदरणीय वीणा जी , धन्यवाद . आपको अनुसरण करते हुए खुशी हो रही है . आपकी कवितायों पर टिप्पणी देने क लिए अभी समय लगेगा
क्योंकि अभी मैं सीखने के दौड़ से गुजर रहा हूं और आपसे भी सीखूंगा .
दिल को छू लेनेवाली कविता के लिए बधाई और विश्व महिला दिवस की शुभकामनायें.
बढ़िया.
महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें
आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए तथा प्रत्येक भारतीय लेखको को एक मंच पर लाने के लिए " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" का गठन किया गया है. आपसे अनुरोध है कि इस मंच का followers बन हमारा उत्साहवर्धन करें , साथ ही इस मंच के लेखक बन कर हिंदी लेखन को नई दिशा दे. हम आपका इंतजार करेंगे.
हरीश सिंह.... संस्थापक/संयोजक "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच"
हमारा लिंक----- www.upkhabar.in/
प्रति वर्ष आठ मार्च को, भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनियां में "महिला दिवस" के रूप में मनाया जाता है, महिला दिवस को मनाए जाने से पूर्व ही आपने भारतीय महिलाओं कि बेबसी,लाचारी,त्याग,
और बलिदान को शब्दों में पिरो कर अपनी रचना के माध्यम से उजागर करने का जो सफल प्रयास किया है.उसके लिए कोटि कोटि धन्यवाद...
bahut accha hai
join me www.architpandit.blogspot.com
veena ji aapke profile mein maine dekha ki aapne 50 se zyada blogs ko follow kar rakha hai ......aap kaise itne blogs ko padh paati hogi .....aur fir comments karti hongi / kya ye sirf ek tareeka hai zyada se zyada logon ko apna follower banane ka ...unka blog follow karo jisse ki wo aapka blog follow karen ...kya hamein bhi yahi sab karna padega .....apne followers ki sankhya badhaane ke liye .......
kripaya is shanka ka samadhaan karein ....
saadar
ajit
क्या बात कही है आपने वीणा जी ऐसा लगा मानो जीवन के सत्य से साक्षात्कार हो रहा हो
आपकी रचनाशीलता को शत शत नमन
ईश्वर खंदेलिया
अजित जी,
इसमें इतनी हैरानी की बात नहीं है..जिसकी एक भी रचना चाहे पहली बार में ही पसंद क्यूं न आए, मैं उसे फॉलो करती हूं...ये जरूरी नहीं कि वो भी हमें फॉलो करे...ऐसे बहुत लोग हैं जिन्हें मैं फॉलो कर रही हूं और उनके बंलॉग पर जाकर टिप्पणी भी करती हूं...और नियमित रूप से पढ़ती हूं...अपने डेश बोर्ड को हमेशा देखती हूं....सब लोग एकसाथ भी नहीं लिखते...जब कभी बहुत व्यस्त होती हूं या किसी भी अन्य वजह से ब्लॉग पर नहीं आ पाती तो मुआफी भी मांग लेती हूं। यह अपनी रुचि पर निर्भर करता है...मैं समय देती हूं...अपने फॉलोअर का ध्यान भी रखती हूं ....थोड़ी बहुत देर चलती है...पर ज्यादा नहीं, अभी मैं फिर होली के बाद 15 दिन बाहर रहूंगी तो पिछली पोस्ट आकर देखूंगी। या जो डैश बोर्ड में रहेंगे मैं उनको जरूर पढ़ूंगी। ई मेल द्वारा आई हुई मैं रचनाएं जरूर पढ़ती हूं...
मैने आपको भी पहली बार में फॉलो किया.. क्योंकि छोटी के बच्ची के माध्यम से जो संस्मरण आपने लिखा वह काबिले तारीफ है...
जहां तक बात अपने ब्लॉगर भाई-बंधु को आमंत्रण देने की है, वह मैं देती हूं और आगे दूंगी भी... ...वह शिष्टता है। यहां ऐसे भी ब्लॉगर हैं जो दो सौ-ढाई सौ, न जाने कितने ब्लॉग्स को फॉलो करते हैं...यह सवाल आपने उनसे नहीं पूछा कि कैसे वो मैनेज करते हैं और वो भी करते ही होंगे ..मैं किसी के बारे में कुछ नहीं कहना चाहती, हां अपने बारे में मैं स्पष्ट हूं...मेरा कोई तरीका नहीं है बस जो भा गया उसे फॉलो किया, इससे दूसरे का उत्साह बढ़ता है और यह सच है...यहां कोई प्रतियोगिता नहीं है...जिसमें परिपक्वता जरूरी हो...महज एक रुचि है मन की चाहत है जिसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए...और मैं तो जिसकी गलती होती है(वर्तनी मे)उसकी गलती भी बताती हूं इस पर मुझसे यह भी कहा गया कि गलतियों को छोड़िए अपने लिखने पर ध्यान दीजिए...फिर भी मुझे कहीं किसी की गलती नजर आती है, मैं जरूर बताती हूं...हां उसके भावों पर कुछ नहीं कहती क्योंकि भाव सच्चे होते हैं और खुद के भी...लेकिन वर्तनी की गलती जरूर बताती हूं वह भी यह ध्यान रखते हुए कि खराब न लगे...और क्षमा भी मांगती हूं कि कहीं किसी के अहं को ठेस न पहुंचे। मेरा कोई खास तरीका नहीं है, जो भी है यही है, आप इसे कुछ भी कहें,मैं अपने आप में या कहें, जो करती हूं उसमें स्पष्ट हूं। आप बड़े हैं, समझदार हैं...आंख मूंदकर कुछ मत करिए जो समझ आए, ठीक लगे करिए...मुझे लगता है आपको जवाब मिल गया होगा...
कविता के भाव अच्छे लगे।
अभिषेक जी, इमरान जी, राजीव जी,रानी जी, वंदना जी, आगाज..नई कलम से,अनुराग जी, अमित जी, नासवा जी,नित्यानंद जी, कुसुमेश जी, संतोष जी,हरीश जी, हरकांड जी, अर्चित जी,अजित जी, खंडेलिया जी और राजेश जी आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद
बुझा लेती है प्यास
बुझा देती है चूल्हा
सिसकियों से
नई आस के साथ
शायद
कल मिल जाए
दाल-भात
hriday-sparshi panktiyaan
.
.
आप तो बहुत अच्छी कवितायेँ लिखती हैं वीणा जी. कभी मेरी गजलों के ब्लॉग gazalganga.blogspot.com पर भी तशरीफ़ लायें
----देवेंद्र गौतम
वीना जी होली की शुभकामनाएं |
बहुत ही मार्मिक है
वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
मुस्कुराहटों की
पकाती है भात
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल...
सुन्दर प्रतीक ...बहुत सुन्दर....
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।
laajawab..
झंझावत से लडती जिंदगी के उद्विग्न क्षणों में नैराश्य से उबरना , इन्सान के लिए सबसे दुष्कर कार्य है . आशा का संचार करती आपकी कविता मन को छू गयी . देर से आया लेकिन दुरुस्त आया .
आदरणीय वीणा जी
नमस्कार !
क्या बात कही है आपने
दिल को छू लेनेवाली कविता के लिए बधाई और विश्व महिला दिवस की शुभकामनायें.
कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..
bahut hi acchi rachna .. ek sapne ko aankh me liye hue ...
badhayi sweekar kare..
---------
मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
"""" इस कविता का लिंक है ::::
http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
आदरणीया वीना जी ,
आम आदमी के जीवन दर्द को उकेरती आपकी रचना बहुत ही प्रभावशाली है |
बधाई स्वीकारें |
bahut sundar kavita...
bitiya k blog ki follower banne ke liye shukriya...dekhiye aapne bulaya aur hum chale aaye, aap bhi aate rahiyega.
regards.
हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.
होली की हार्दिक शुभकामनायें.
आप को सपरिवार होली की हार्दिक शुभ कामनाएं.
सादर
होली पर मैं आपको तथा परिवार के लिए मंगल कामनाएं करता हूँ !
वीणा जी , गहरे एहसास के साथ एक मर्म स्पर्शी कविता. सुंदर प्रस्तुति. होली की हार्दिक शुभकामनायें .
लघुकथा --आखिरी मुलाकात
बहुत मर्मस्पर्शी रचना...होली की हार्दिक शुभकामनायें!
सुंदर कविता। जिसकी सुंदरता बयां करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं हैं।
nice
वीना जी!
बहुत मर्मस्पर्शी रचना...
यही तो है मेरा भारत महान |
सशक्त अबिव्यक्ति \
अगले सृजन के इंतज़ार में!
---
मैं शादी क्यों करूं...? Its All About Marriage DEBATE @ उल्टा तीर
वो रोज जलाती है
चूल्हा
यादों की लकड़ियों से
भावों के कंडे पर
सेंकती है रोटी
बहुत बढ़िया.....
अरमानों के
अश्कों से
पकाती है दाल
रख देती है
कल के लिए
अच्छे खाने का
लालच देकर
बांट देती है रोटी
बहुत अच्छी कविता
शायद इसी लिए कहते हैं कि आशा ही जीवन है।
............
ब्लॉगिंग को प्रोत्साहन चाहिए?
लिंग से पत्थर उठाने का हठयोग।
Umeed ki kiran jagati bahut hi bhavprad evam sarthak kavita........ sunder prastuti.
एक टिप्पणी भेजें