सोमवार, 23 मई 2011

मेरे पापा.....................वीना



  • आज से 11 साल पहले 23 तारीख को ही पापा हम सबको
  •  रोता-बिलखता छोड़कर परमात्मा में लीन हो गए थे...मुझे 
  • हमेशा लगता रहा है वो आज भी मेरे पास हैं और मुझे हर 
  • मुसीबत से उन्होंने बचाया...तभी कहते हैं कि माता-पिता 
  • रहे या न रहें उनकी आत्मा हमेशा बच्चों के पास रहती है...
  • यह रचना पहले भी पोस्ट कर चुकी हूं आज फिर कर रही हूं...
  • काश फिर से मिल जाए...सच में कोई जिद नहीं करूंगी.....

तुम क्यों रूठ गए पापा
मैं निपट अकेली हो बैठी
किसे गुहारूं, किसे पुकारूं
मैं तो तन्हा हो बैठी


जब तुम थे तो बात और थी
एक आंसू न गिरने देते थे
अब रोते-रोते रात कटे
अश्कों का समंदर हो बैठी


पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत है क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी


सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी


बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी


एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी


अपने पास बुला लो मुझे
क्यों छोड़ा इस निर्दय जग में
पापा न कोई बन पाएगा
मैं अपनी किस्मत खो बैठी


हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहें
अब यही दुआ मैं कर बैठी





85 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

वीना जी कोई लौटकर नहीं आता। बस यादें ही रह जाती है। धैर्य से काम लीजिए। ये दुनिया यूं ही चलती है। उनकी आत्मा को शांति मिले...

vijay ने कहा…

भगवान उनकी आत्मा को शांति दे...
लेकिन उनकी याद में यह रचना बहुत रुलाने वाली है...

vijay ने कहा…

aap duhki mat hona...sabko ekna ek din jana hai koi pahle koi baad meib...

Mansoor ali Hashmi ने कहा…

बहुत दर्द भरी रचना लिख दी है वीना जी, बेटियाँ किस क़दर भावुक हो सकती है, इसका एहसास हुआ. मेरे तो चारो बेटे ही है, हाँ ! चार बहुए बेटियों के रूप में ज़रूर मिल गयी है. ईश्वर आपको जुदाई का यह ग़म सहने की शक्ती दे. अमीन.

कविता का साहित्यिक मूल्यांकन करे तो अच्छी रचना है.

aastha ने कहा…

मेरे तो मां और बाबूजी दोनों नहीं हैं मैं आपका दर्द समझ सकती हूं भगवान किसी को आनाथ न करे पर जीवन तो यही है न...
रचना पढ़कर रोना आ रहा है
बहुत दर्द है और दुख को अलग कर दें तो बहुत अच्छी रचना...

shalusri ने कहा…

दर्द से भरी सुंदर रचना...

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय वीना बहन
सादर सस्नेह नमस्कार !

ऐसा नहीं करते …
यह प्रकृति का नियम है । विधि का विधान है ।
इतना अधिक भावनाओं में बहने से आपके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है ।
यदि किसी कारण से आप अपने दायित्वों का ढंग से निर्वहन न कर पाएं तो पापा की आत्मा को ठेस लग सकती है …
इसलिए स्वयं को संभालिए !

और संसार में हिम्मत से हर स्थिति का मुकाबला करते हुए जीना पड़ता है ।
हताशा - निराशा आती है , लेकिन इन्हें स्वयं पर हावी न होने दें ।
जीना पड़ता है । अपना ग़म भुला कर मुस्कुराना पड़ता है ।

आप जानती हैं , हमारे प्रिय दूर हो'कर भी हमसे दूर नहीं होते ।
हम उन्हें नहीं भूलते तो वे भी हमें कहां भूलते हैं …

रचना के बारे में क्या कहूं … अब एक रचना ऐसी लिखें कि जितने आंसू मेरे बहाए हैं , उससे ज़्यादा ख़ुशी मिल सके … वरना मैं उलाहना दूंगा कि मेरा बकाया नहीं चुकाया … :)

परमात्मा अपके पूज्य पापा की आत्मा को शांति और आपको उनके बिछड़ने का दुःख सहने की शक्ति दे …

संभव हो तो मेरे स्वर्गवासी पिताजी की याद में समर्पित इस पोस्ट को तसल्ली में देखलें …
लिंक है -
आए न बाबूजी
…लेकिन पुनः मन को मज़बूत रखने का मेरा निवेदन है ।

- राजेन्द्र स्वर्णकार

मदन शर्मा ने कहा…

आप की रचना पढ़ के मुझे भी मेरी पापा की याद आ गयी मेरे पापा तो मुझे बचपन में ही छोड़ के चले गए जब मुझे ये भी एहसास न था की पापा का प्यार क्या होता है आप तो अपने को खुश नसीब समझिये की आप को कुछ तो पापा का प्यार मिला
यही तो ज़िदगी की रीत है ये दुनिया यूं ही चलती है। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी


एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी
aankhen nam ho gai

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

बहुत दर्द भरी रचना है.
ईश्वर से कामना है उनकी आत्मा को शान्ति दे.

सादर

संजय भास्‍कर ने कहा…

दर्द भरी रचना वीना जी
भगवान उनकी आत्मा को शांति दे

बेनामी ने कहा…

he will be reading this poem of yours
its a touching poem.....

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

हम आपके पिताजी की इस पुन्य तिथि पर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं.
गणेश माता-पिता की सेवा के कारण ही प्रथम पूजनीय बने.आप का अपने माता-पिटा के प्रति लगाव भी कम नहीं है,इस सम्बन्ध में नन्द लाल जी का यह कहना उद्धृत करना चाहता हूँ.-
'जो माँ -बाप की सेवा करते हैं ...वे दुःख में घबराना क्या जानें?'

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

जिस लोक में वे चले गए हैं हरेक को वहीं जाना है । थोड़े दिन सब्र कीजिए , बस । फिर हम सबको मालिक ज़रूर इकठ्ठा करेगा। आपके मन की पुकार निष्फल नहीं जाएगी।

शूरवीर रावत ने कहा…

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं
sundar rachna,apno ko yaad kar aankhe nam ho jaati hai. Fir papa to papa hain.....

SANDEEP PANWAR ने कहा…

भगवान भी अच्छे लोगों की तलाश में रहते है,

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं
पिता की छाँव सच में बरगद के समान ही होती है..... हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ आँखें नम करतीं ....

नमन .....श्रद्धांजलि

devendra gautam ने कहा…

marmik rachna...

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

वीणा जी!
वे आपके साथ ही हैं.. आपकी प्रेरणा बनकर!!

SAJAN.AAWARA ने कहा…

MAM JO JANM LETA HAI USKO JANA HI PADTA HAI. KOI HAMSE DUR CHLA JATA HAI TO DARD TO HOTA HAI, PAR KYA KAREN VIDHI KE VIDHAN KO KON BADAL SAKTA HAI. AAP HIMMAT RAKHEN . PITAJI KE SAPNO KO PURA KARNE KI KOSIS KAREN. OR DUKHI MAT HON, OR WO BHI KHUS HONGE AAPKO KHUS DEKHKAR.
JAI HIND JAI BHARAT

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हमारी भी श्रद्धान्जलि। संबल रखिये, उनकी यादों का।

Satish Saxena ने कहा…

दर्द भरी पुकार अपने पापा के लिए ....
शुभकामनायें !

Unknown ने कहा…

आपकी रचना ने आँखें नम कर दी वीणा जी ।
ईश्वर आपके पापा के आत्मा को शांति दे ।
पर एक बात आपसे कहना चाहुँगा कि इस तरह मायूस और दुःखी मत रहा कीजिए । इस जिंदगी के बाद की दुनिया अगर सच है तो सोचिए आपको इस हालत में देखकर आपके पापा की क्या हालत होती होगी ।
इसलिए अपने लिए न सही अपने पापा के लिए ही सारे गम भुला कर खुश रहा कीजिए ।

Unknown ने कहा…

आपकी रचना ने आँखें नम कर दी वीणा जी ।
ईश्वर आपके पापा के आत्मा को शांति दे ।
पर एक बात आपसे कहना चाहुँगा कि इस तरह मायूस और दुःखी मत रहा कीजिए । इस जिंदगी के बाद की दुनिया अगर सच है तो सोचिए आपको इस हालत में देखकर आपके पापा की क्या हालत होती होगी ।
इसलिए अपने लिए न सही अपने पापा के लिए ही सारे गम भुला कर खुश रहा कीजिए ।

बेनामी ने कहा…

फिर यक्ष ने युधिष्ठर से पुछा - आसमान से भी ऊँचा क्या है?
युधिष्ठर ने कहा - पिता का साया

सच है माता-पिता की कमी कभी कोई पूरी नहीं कर सकता.......खुदा आपके पिता को जन्नत अता फरमाए ......आमीन |

Unknown ने कहा…

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं

दर्द भरी रचना
सचमुच पिता बरगद का साया ही होते हैं,मेरे पापा भी मुझे बहुत प्यार करते थे। अब नहीं हैं मुझे भी लगता है वो मेरे साथ हैं
आंखों में आंसू आ गए पढ़कर
आपने रुला दिया
बस आपको फालो भी कर रही हूं...

रंजना ने कहा…

बेहद मार्मिक....

मन भींग गया....

सच है यह दुःख सहना कितना दुष्कर होता है....

Vivek Jain ने कहा…

ईश्वर से कामना है उनकी आत्मा को शान्ति दे
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

भगवान उनकी आत्मा को शांति दे...
बहुत दर्द भरी रचना , दर्द से भरी सुंदर रचना

ZEAL ने कहा…

भावुक कर दिया इस कविता ने। माता पिता से बढ़कर कौन है भला? विनम्र श्रद्धांजलि।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत भावुक करती रचना ...यही ज़िंदगी है

Urmi ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है! दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ!

रचना दीक्षित ने कहा…

यादें हमेश साथ रहती है कभी साथ नहीं छोडती. मेरी संवेदनाएं.

एस एम् मासूम ने कहा…

वीणा जी , यह सच है जाने वाले लौट के नहीं आते बस यादें रह जाती हैं. सब्र करना पड़ता है.

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

veena jee...koi bhi yaad dil ko chhuti hai ...fir PAPA wo to dil me baste hain..!!

bahut pyari si rachna....

Khare A ने कहा…

bahu hi dard me dubi hui rachna!
bakai pita ka sath hona kitna mehtavpurn hota hai! isko main bhi mehsoos karta hun,

महेन्‍द्र वर्मा ने कहा…

आंखें भर आईं।
आपके पिताजी की यादें ही अब आपका संबल है।
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पिता के जाने के बाद उनकी यादें ही संबल देती हैं ... बहुत ही भावुक कर गयी आपकी रचना ....

virendra sharma ने कहा…

"मैं गम का समन्दर हो बैठी "पिता का छाता ही निस्स्वार्थ होता है ,ज़िन्दगी की आंच से बचाए रहता है .लडकियां वैसे भी पिता का अक्ष होतीं हैं इसीलिए कहा गया -"माँ पर पूत पिता पर घोड़ा ,बहुत नहीं तो थोडंम थोड़ा ."यहाँ घोड़ा लडकी के लिए और पूत ,पुत्र के लिया प्रयुक्त हुआ है .पूत कपूत सुने हैं लेकिन माता हुईं सुमाता .घोड़े को लेकर ऐसी कोई फटकार नहीं है .अलबत्ता ढोल गंवार शुद्र पशु नारी का ज़वाब किसी ने यूं दिया था -
"पुरुष गंवार और घोड़ा ,इन्हें जितना मारो थोड़ा "यहाँ घोड़ा पुल्लिंग है .सुन्दर भावाव्यक्ति संवाद लिए थी पिता से बतियाती कविता .अतीत का आवाहन करती .पर जाने वाले लौट के कहाँ आतें हैं ,जाने वालों की याद आती है ।
"तुझे खो दिया हमने पाने के बाद ,तेरी याद आई तेरे जाने के बाद ".सशक्त लेखन के लिए आपको बधाई .

Dadda ki Khari Khari ने कहा…

जब कभी गर्दिशे दौराँ ने सताया है मुझे
मेरी जानिब तेरे फैले हुए बाजू आये
बाप का साया कुछ ऐसा ही होता है ........बूढा होता बाप .....जब वो जर्जर हो चूका होता है .......तो वो सिर्फ अपनी उपस्थिति मात्र से ही सहारा देता है ..........और जब वो भी न रहे ...तो फिर इश्वर तो है न ........
ॐ शांतिः
ajit

कुमार राधारमण ने कहा…

पिता पर बहुत कम लिखा गया है। पुत्री को यों भी पिता से अधिक स्नेह होता है। बहुत मार्मिक लिखा आपने।

Swarajya karun ने कहा…

आपके दिल की गहराइयों से निकली यह आवाज़ सबके दिलों को छू रही है. हम सबकी संवेदनाएं आपके साथ हैं. धीरज रखें. जीवन के इस लंबे सफर में हिम्मत से काम लें और अपने दिवंगत पिताजी के सपनों को साकार करने की कोशिश करें. आपको सफलता ज़रूर मिलेगी . ईश्वर से प्रार्थना है कि वह आपके पूज्य पिताजी की आत्मा को शान्ति प्रदान करें

Vivek Mishrs ने कहा…

बहुत दर्द भरी रचना लिख दी है वीना जी
सचमुच पिता बरगद का साया ही होते हैं

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत मार्मिक प्रस्तुति...बेटी और पिता का रिश्ता ही ऐसा होता है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता...लेकिन नियति के सामने इंसान कितना मज़बूर होता है...भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे..

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

शान जी,विजय जी,मंसूर जी, आस्था जी, शालू जी,राजेंद्र जी,मदन जी, रश्मि जी,यशवंत जी, संजय जी, चिराग जी,आक सबका दिल से आभार,,,,

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

विजय जी, डा.अनवर, जाट देवता जी,सुबीर जी,मोनिका जी, ग़ज़ल गंगा जी,साजन जी, प्रवीण जी, सतीश जी,प्रदीप जी, वंदना जी, इमरान जी,रंजना जी, विवेक जी, संजय जी,आप सबका भी आभार

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

विवेक जी, दिव्या जी, संगीता जी,बबली जी, रचना जी, मासूम जी,महेश जी, खरे जी, महेंद्र जी, नासवा जी, वीरूभाई,स्वराज्य जी, राधारमण जी,अजित जी, विवेक जी, कैलाश जी,आप सबका बहुत-बहुत आभार...

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

राजेंद्र भाई...आपने जिस प्यार से सांत्वना दी है मैं उसका शुक्रिया कैसे अदा करूं...प्यार औप भावों का कोई मोल नहीं होता...यूं तो सभी बेटियां को पिता से ज्यादा लगाव रहता है पर अपने प्यार का पलड़ा सभी को भारी लगता है...मुझे मालूमं था कि मैं दो आंसू बहाऊंगी और पापा जिद पूरी कर देंगे...बहुत प्यार दिया...उन्हें कैंसर हो गया था...तीन आपरेशन हुए और अपने अंत से दो-तीन दिन पहले जबकि वो डैथ बेड पर थे मैं आफिस से लौटी तो वो धीरे-धीरे मेरा सिर दबा रहे थे...और ढांचा रहे पैरों से पैर पर धीरे-धीरे मार रहे थे ये कहकर तुम थक गई होगी..मैं उस समय नोएडा पोस्टेड थी लेकिन पापा की वजह से मैने 6 महीने के लिए लखनऊ आ गई थी....
मैं बहुत डिस्टर्ब हो जाती हूं जानती हूं कि वो कभी नहीं आएँगे फिर भी रोती हूं और यह सच है डैथ के बाद मैं जब-जब मुसीबत में हुई वो हमेशा दिखाई देते हैं और फिर परेशानी खत्म भी हो जाती है...वो नहीं दिखाई देते तो सोचती हूं क्यूं नहीं दिखाई दे रहे.....

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शान्ति प्रदान करे।

राजेंद्र अवस्थी. ने कहा…

बाबा जब से चले गए तुम वीरानी सी छाई है,
याद आपको करते करते आँख मेरी भर आई है..
जब याद तुम्हारी आती है नेत्र नीर टपकाते है,
टेढ़े मेढे अनगढ़ से चित्र कई बन जाते है..
मुझे तो आज भी अहसास होता है की मेरी माँ हर पल मेरे साथ रहती हैं..
बहुत अच्छी तरह भावनाओं को शब्दों में व्यक्त किया आपने ..इस टिप्पणी के माध्यम से मै आपकी भावनाओं का आदर करता हूँ..

रजनीश तिवारी ने कहा…

बहुत मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ हैं । पिता की याद में समर्पित भावभीनी रचना । श्रद्धांजलि ...

वैज्ञानिक प्रार्थना ने कहा…

आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा| आपकी भावाभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है और सोच गहरी है! लेखन अपने आप में संवेदनशीलता का परिचायक है! शुभकामना और साधुवाद!

"कुछ लोग असाध्य समझी जाने वाली बीमारी से भी बच जाते हैं और इसके बाद वे लम्बा और सुखी जीवन जीते हैं, जबकि अन्य अनेक लोग साधारण सी समझी जाने वाली बीमारियों से भी नहीं लड़ पाते और असमय प्राण त्यागकर अपने परिवार को मझधार में छोड़ जाते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

"एक ही परिवार में, एक जैसा खाना खाने वाले, एक ही छत के नीचे निवास करने वाले और एक समान सुविधाओं और असुविधाओं में जीवन जीने वाले कुछ सदस्य अत्यन्त दुखी, अस्वस्थ, अप्रसन्न और तानवग्रस्त रहते हैं, उसी परिवार के दूसरे कुछ सदस्य उसी माहौल में पूरी तरह से प्रसन्न, स्वस्थ और खुश रहते हैं, जबकि कुछ या एक-दो सदस्य सामान्य या औसत जीवन जी रहे हैं| जो न कभी दुखी दिखते हैं, न कभी सुखी दिखते हैं! आखिर ऐसा क्यों?"

यदि इस प्रकार के सवालों के उत्तर जानने में आपको रूचि है तो कृपया "वैज्ञानिक प्रार्थना" ब्लॉग पर आपका स्वागत है?

मीनाक्षी ने कहा…

दिल के बहुत करीब के भाव दिल को छू गए...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

अपने पापा के प्रति आपके प्यार को सलाम.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

आपकी रचना ने नेतो मेरे आँखों में पानी ला दिया ... मैं आपका दर्द समझ सकता हूँ ... मेरे पिताजी की तब्यत भी खराब होती है तो इतना बुरा लगता है कि क्या कहूँ ... मेरी बेटी भी मुझसे इतना प्यार करती है कि एक बेटी के लिए पितृवियोग क्या हो सकता है .. मैं अनुमान लगा सकता हूँ ...
जब दिल में दर्द हद से ज्यादा बढ़ जाए तो बेहतरीन रचना निकलती है ... और आपकी यह रचना भी लाजवाब है ...

Asha Joglekar ने कहा…

आपका दुख हर बेटी का जिसके पिता बिछ गयें है , साझा दुक है । आपने भावों को शब्दों में ढाला, आसा है इससे आपके दुखों को बहने का मौका मिला । धीरज रखिये समय के साथ हर दुख कम हो जाता है ।

Patali-The-Village ने कहा…

दर्द से भरी सुंदर रचना| भगवान उनकी आत्मा को शांति दे|

amlendu asthana ने कहा…

Ma baap to bargad ki chhaon hote hain. Apne marmik rachna likhi hai

ज्योति सिंह ने कहा…

पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत है क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी


सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी
dard aur kami dono gahre hai ,aankh bhar aai .

Mridula Ujjwal ने कहा…

Fear of losing dearest ones creeps wen I read it
aah....
its difficult to let go

सदा ने कहा…

बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी

भावमय करते शब्‍द इस रचना के दिल को छू गये ...।

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

veena ji.......papa ke naa hone ka dukh kya hai mai acche se samjh sakti hun......16 saal ki umr mei maine bhi apne papa ko kho diya tha

meri aatma ke kareeb aapki ye kavita....

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आंसू आ गए वीना जी ...आपकी वेदना भरी रचना पढ़कर |
पापा की मधुर यादें तो हैं ही ...

अशोक सलूजा ने कहा…

शुभकामनाएँ!
आशीर्वाद !


जो दिल ने कहा ,लिखा वहाँ
पढिये, आप के लिये;मैंने यहाँ:-
http://ashokakela.blogspot.com/2011/05/blog-post_1808.html

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

वीणा जी!
पापा जी स्मृति में लिखी आपकी रचना काबिले तारीफ़ है। मैं निम्नलिखित मुक्तक से आपको आशीष देता हूँ।
+++++++++++++++++++++++++++++
"उत्साह व उमंगें नित पीठ थपथपाएं|
उज्ज्वल भविष्य के हित हैं मेरी कामनाएं||
दे आपको सुरक्षा पापाओं का वो पापा|
बटुआ भरापुरा हो आए नहीं बुढ़ापा॥"
=============================
-सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

Coral ने कहा…

भगवान उनकी आत्मा को शांति दे...
बहुत दर्द है इसमें ...आखो में पानी आगया

Happy Environmental Day !

Roshi ने कहा…

bahut hi marmik .........

Roshi ने कहा…

maine apni maa ko 10 yrs pehle kho diya aapki rachna mein papa ki jagah maa ka nam yad kerke unko yaad kar rahi haan

Asha Lata Saxena ने कहा…

अपनों से बिछुड़ने का गम वही समझ सकता है
जिसने यह रिक्तता महसूस की हो |बहुत भावपूर्ण रचना |मन को गहराई तक छू गई |

आशा

Maheshwari kaneri ने कहा…

कोई लौटकर नहीं आता। बस यादें ही रह जाती है।उनकी आत्मा को शांति मिले...

www.navincchaturvedi.blogspot.com ने कहा…

पिता के प्रति आप की भावनाएं पढ़ कर हम भी द्रवित हो उठे| ईश्वर उन की आत्मा को चिर शांति प्रदान करें

Unknown ने कहा…

Veena ji, sach mein kaha jata hai ki lekhni aur bhavanaon mein bahut taakat hoti hai... main sabse pahle aapko is baat ke liye thanks kahunga ki aapne bahut hi jivantata ke sath bhavnaon ko shabdon mein parinat kiya hai.. bhagwaan aapke pitaji ki aatma ko param shanti de.. aur aap ko unki kami ka ehsaas na hone de...

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

पिता को अत्यंत मार्मिक शब्दांजलि समर्पित की गयी है.स्व-स्फुटित भावों का शाब्दिक स्वरूप ही कविता है.अशोक कुमार व् सुमित्रा सान्याल अभिनीत हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म आशीर्वाद का एक गीत -इक था बचपन ,यदि मिल जाये तो कलेक्शन में रखियेगा.मन को बहुत शांति देता है.वैसे यह फिल्म ही कलेक्शन योग्य है.मैंने ढूँढा पर मेरे क्षेत्र में नहीं मिली.

अभिषेक मिश्र ने कहा…

भावुक कर देने वाली पंक्तियाँ. पिता-पुत्री का संबंध अनूठा ही होता है.

Dr Varsha Singh ने कहा…

बहुत दर्द भरी रचना है.....निःशब्द कर दिया है मुझे.
ईश्वर से कामना है कि आपके स्वर्गवासी पिताजी की आत्मा को शांति दे.

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

दिल के तारों झंकृत कर गयी रचना।

---------
हॉट मॉडल केली ब्रुक...
लूट कर ले जाएगी मेरे पसीने का मज़ा।

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

श्रद्धांजलि।

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

श्रद्धांजलि।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहें
अब यही दुआ मैं कर बैठी
...आमीन।
बचपन में पिता का साया उठ जाना सभी के लिए भयंकर कष्टकारी है लेकिन पुत्रियों के लिए यह असहनीय होता होगा।

रमेश कुमार जैन उर्फ़ निर्भीक ने कहा…

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

Minakshi Pant ने कहा…

भावपूर्ण रचना |
एक सार्थक रचना |

Irfanuddin ने कहा…

Namaskar vena ji.....

Pehli baar aapke blog per aaya hu.....and believe me after reading this literally i am crying.....

Regards,
irfan.

Roshi ने कहा…

meri maa bhi 10 sal pehle hamko chorkar chali gayi apki rachna mein papa ki jagah unko pati ...........
bahut dard bhari prastuti maa pita jab nahi rehte hai tab pata chalta hai

अनुपमा पाठक ने कहा…

आँखें नम हो गयीं!

कौशल किशोर ने कहा…

bahut khub......
http://dilkikashmakash.blogspot.com/