रोज निकलता है सूरज
आज नहीं निकला
अस्त कर गया
वो सितारा
जो था घर का भानु
जिससे मिलता था जीवन
सभी सदस्यों को
जिसके टिमटिमाते प्रकाश से
रोशन होता था पूरा घर
अब कहां से आएगा वह प्रकाश
कौन दूर करेगा अंधकार
कौन दिखाएगा दीप
अंधेरी रातों में
किस बुलंद इमारत के नीचे
सिर छुपाएंगे बच्चे
कभी नहीं सज पाएगा
मां का आंचल
वक्त ने बना दिया उसे
संगमरमर की मूरत
2 टिप्पणियां:
बहुत ही मार्मिक और हृदय स्पर्शी। मैंने अपनी बच्चियों की ओर से पढ़ी, उनके चाचु हाल ही में उनसे बहुत दूर चले गए अपनी यादें छोड़कर।
Today again i read this poem and understood more clear. Bahoot khoob!!
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