शनिवार, 10 नवंबर 2007

व्यक्तित्व बच्चों का

बच्चा भी
नहीं है आजाद
उससे ज्यादा है वजन
उसकी पुस्तकों का
खिलौने सा
हल्का नहीं है उसका जीवन
भार है उसके नन्हें कंधों पर
नपे-तुले टाइम टेबल का
तथाकथित
संपूर्ण शिक्षा का
जिसकी पूर्णता
रिक्त कर देती है
उसके बचपन को
नपे-तुले टाइम टेबल में
90 प्रतिशत नंबर लाने की होड़
खड़ा कर देती है उसे
छोटी सी उम्र में
प्रतियोगिता के क्षेत्र में
खोखला कर देती है
उसका जीवन
स्वाभाविक जीवन जीने से पहले ही
कांट-छांट कर
तराशा जाता है
एक मनचाहा आकार
जिसमें उसे
फिट होना ही है
चाहे फिट होते-होते
वह बिखर ही जाए
उसके नन्हें हाथों में खिलौने की जगह
होते हैं कंप्यूटर
आंखों में चमक की जगह
चढ़ा होता है चश्मा
तितलियां पकड़ने की जगह
वे जाते हैं
थोपी हुई हॊबी क्लासेज में
थ्योरी बनकर रह जाता है
इनका जीवन
नहीं कर पाते हैं प्रैक्टिकल
बालसुलभ क्रियाएं
ढल जाती हैं
सधे जीवन में
उम्र से ज्यादा अवस्था का ज्ञान
खोखला कर देता है
उनका व्यक्तित्व।

4 टिप्‍पणियां:

उन्मुक्त ने कहा…

आजकल तो लगता है कि बचपन खो गया है।

Abhishek ने कहा…

वह क्या लिखा हे ! बचपन की उन्मुक्तता और उस पर प्रतियोगिता के बड़ते दवाब को बहुत खूबसूरती से शब्दों में ढाला हे !

सहज साहित्य ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है वीना जी ।

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

बिलकुल सही बात लिखी है आपने,

सादर