विकल्प नहीं
जीवन के लिए भी
कोई विकल्प नहीं
सोचकर नहीं
घुलकर रचे-बसे हो
मेरी सांसों में
तुम क्षीर हो
या मैं नीर
तुम नीर हो
या मैं क्षीर
कोई अंतर नहीं
हमारा अस्तित्व है
एक-दूसरे के साथ
हम नहीं हो सकते अलग
मैं नहीं बन सकती
जहाज का पंछी
जो उड़ता है बार-बार
और फिर
कोई विकल्प न मिलने पर
ठहरता है उसी जहाज पर
मैं उड़ना ही नहीं चाहती
मैं नहीं खोजना चाहती
कोई विकल्प
क्योंकि
जीवन का
कोई विकल्प नहीं
1 टिप्पणियाँ:
कविता बंधे रखती है.
नीर तुम नीर हो
या मैं क्षीर
कोई अंतर नहीं
ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं.
सादर
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