मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

मातृ भाषा बोलने पर क्या तख्ती लटकाने की सजा उचित है?


अभी मैं टी.वी. चैनल पर एक खबर देख रही थी, खबर आंध्र प्रदेश की है जहां स्कूल में तेलुगु बोलने पर दो बच्चों के गले में तख्ती टांग दी गई कि i'ii never speak in telugu. इस तरह की सजा क्या दर्शाती है कि अपनी मातृभाषा में बात करने पर उन्हें इतना कठोर दंड दिया जाएगा जिसका असर मानसिक रूप में पड़ेगा। यह सजा सुनाई गई सेंट जोसेफ स्कूल में। बाकी प्रदेशों में भी ये स्कूल हैं लेकिन कहीं ऐसी सजा नहीं है। हमारा देश धर्म निरपेक्ष है जहां सभी धर्मों, भाषाओं का सम्मान किया जाता है। अपनी मातृ भाषा बोलने के लिए हमें किसी की आज्ञा की जरूरत नहीं है। उन छोटे-छोटे बच्चों ने ऐसा गुनाह नहीं किया कि गले में तख्ती लटकाकर घूमें। स्कूल किसी ईसाई बहुल देश में नहीं बल्कि भारत जैसे गौरवशाली देश में है जहां प्रत्येक व्यक्ति को हर प्रकार की आजादी है। ये क्या बार-बार याद दिलाना होगा ? वैसे भी हम अपने देश में हैं। बहुत दु:ख होता है जब हम अपने देश में आज भी जाति, धर्म, भाषा की दीवार उठाए हुए हैं। यदि इन्हीं सीमित दायरों में बंधे होते तो हमें आजादी कभी नहीं मिली होती और विरासत में यही हम अपने बच्चों को दे रहे हैं। आज जरूरत इंसान को इंसान से प्यार सिखाने की है न की छोटे-छोटे बच्चों को सजा देने की। उन बच्चों पर तो आज के समय ने वैसे भी पढ़ाई का इतना बोझ डाला है कि वो अपना बचपन ही भूल गए। हमने तो बढ़े मजे में पढ़ाई की मगर आज जितना बोझ है वही उनके लिए सजा है। मगर समय की मांग यही है कि हम उन्हें थोड़ी आजादी दें मगर स्कूल में आजादी की जगह सजा ? क्या असर होगा उन पर। सरकार ने जांच के जो आदेश दिए हैं वह निश्पक्ष रूप से पूरी होनी चाहिए।

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