अब मैं आपको कुछ गीत और गज़ल पढ़वाऊंगी जिन्हे मैने मंच पर पढ़ा.....
दिल का दीवानापन
मत पूछ ऐ सनम
ये हो चुका है तेरा
तेरा है मेरा मन
राह-ए-वफा पे अब से
पहले न चले थे
पीछे न कभी आएंगे
बढ़ते हुए कदम
यूं अब जो मिले हैं तो
हम मिलते ही रहेंगे
टूटे न कभी तेरे-मेरे
प्यार की सरगम
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम
51 टिप्पणियाँ:
आदरणीया वीना जी
शायद हर व्यक्ति किसी न किसी के प्रति लगाव रखता है इस हद तक की वो उसको अपने जीवन का हिस्सा समझने लगता है.
और शायद आप ये भी कहना चाहती हैं-
तू कहे न कहे मगर मैं जानता हूँ
क्या मेरा साहिल और क्या तेरी रज़ा है.
(इस ग़ज़ल को पढ़ते हुए ये शेर बन गया)
आप की हर नयी पोस्ट का इंतज़ार रहता है.
शुभकामनाएं
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम
क्या रचना है...बहुत खूबसूरत,वैसे भी आप जैसा जीवनसाथी पाकर कोई भी संवर सकता है और जिसके लिए आपने लिखी है। कभी रांची आना हुआ तो मिलूंगा जरूर आपसे और आपके पति से भी। मेरी इच्छा है यह। जितना भी पढ़ता हूं आपको उतना ही चाहता हूं आपको जानना। अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।
वीना दी आपने बहुत अच्छा लिखा है....मुझे बहुत अच्छी लगी। मुझे यह बंद सबसे अच्छा लगा
राह-ए-वफा पे अब से
पहले न चले थे
पीछे न कभी आएंगे
बढ़ते हुए कदम
बधाई हो आपको
आदरणीय वीना जी
बहुत सुंदर। बस क्या कहूं।
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
बहुत सुंदर। कुछ कहने की जरूरत नहीं
ये रचना भी बहुत अच्छी लगी मगर मै तो तुम्हारी लिखी ही पढना चाहती हूँ। आशीर्वाद।
निर्मला जी ये भी मैने ही लिखी है और काफी पहले की है मगर कवि सम्मेलन में अपनी आवाज़ में सुनाई थी पर यहां तो मैं पढ़वा ही सकती हूं....अगर किसी और की होगी तो मैं उसे साभार प्रस्तुत करूंगी...
यशवंत जी क्या बात है...बातों ही बातों में शेर...बहुत खूब। कमाल कर दिया..शालू और शान जी आपका भी धन्यवाद
bahut sunder bhavo kee sunder abhivykti.......
विजय जी आपने ठीक कहा है जिसके लिए लिखी है वो हैं ही ऐसे...और मेरे जीवनसाथी भी हैं। आप कभी रांची आएं तो हमारे छोटे से आशियाने में आपका स्वागत है। आज की भाग-दौड़ वाली जिंदगी में फुर्सत के लम्हे मिलना ही मुश्किल हैं और जो मिले तो वो पल प्यार के लिए ही होने चाहिए...वर्ना जीवन में क्या रखा है
वीणा जी! कविता सुन्दर है |
आदरणीया वीणा जी
नमस्कार !
अच्छी रचना के लिए बधाई !
टूटे न कभी तेरे-मेरे
प्यार की सरगम
आमीन !
आपकी सुखी गृहस्थी आने वाले सौ वर्षों तक बनी रहे ! तथास्तु !!
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम....
सच्चे प्यार की बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति....आभार...
वीणा जी
नमस्कार !
आपकी हर रचना दिल को छू जाती है !
आपकी इस खूबसूरत रचना के लिए एक बार फिर हार्दिक बधाई !
बहुत खूबसूरत गीत ...
वीणा जी, बहुत ही खुबसूरत रचना,,...
अब ज्यादा क्या कहूं.....
उम्दा..
मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html
ek jivansathi ke liye is se sundar shabd ho hi nahi sakte. bahut pyar hai is kavita me. lajwab
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
bahut hi sundar
सुन्दर भाव,सुन्दर अभिव्यक्ति !
इस सुंदर रचना का पोडकास्ट भी लगाइए। सुनने का भी मन कर रहा है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
योगदान!, सत्येन्द्र झा की लघुकथा, “मनोज” पर, पढिए!
बहुत ही सुन्दर गीत लिखा है आपने ..........प्यार के पल बहुत मुश्किल से मिलते हैं इन कुछ पलों में ही जिंदगी सिमट जाती है |
यूं अब जो मिले हैं तो
हम मिलते ही रहेंगे
टूटे न कभी तेरे-मेरे
प्यार की सरगम ...
बहुत लाजवाब रचना है ... ये ऑरिम की सरगम अगर यूँ ही बजती रहे तो जीवन आसान हो जाता है ....
अपनी आवाज़ में गा कर इस गीत तो ब्लॉग पर लगाएँ ...
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम
...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
wah...veena ji...badhai swikaren..
बहुत ही खुबसूरत लिखती है आप शुक्रिया
वीना दी आपने बहुत अच्छा लिखा है.
बहुत सुंदर। कुछ कहने की जरूरत नहीं
मेरे ब्लॉग पर मेरी नयी कविता संघर्ष
खूबसूरत, भावपूर्ण गीत, ----यशवन्त जी यह गज़ल नहीं , हां नज़्म कहा जा सकता है ।
डा.नूतन,अपनत्व, राजेंद्र जी,कैलाश जी, संतोष जी, संगीता जी, शेखर जी, दक्षा जी, मिसिर जी, मनोज जी,ज्योति जी, इमरान जी, दिगम्बर जी,कविता जी योगेंद्र जी, रंजना जी, संजय जी और डा.श्याम आप सबका आभार...राजेंद्र जी मित्रों की शुभकामनाएं ही जरूरत पर काम आती हैं...बस शुभकामनाएं ही चाहिए...
सचमुच वीना जी प्यार में वो शक्ति है जो जिन्दगी को बदल देता है। बहुत सुन्दर रचना के लिए आपको बधाई
गहरे अपनत्व को सुंदर शब्दों में संजोती सुंदर कविता।
आपका ब्लॉग बहुत पसंड आया है, सारी पोस्ट पढ़ी हैं, आभार स्वीकारें इस सार्थक ब्लॉग को चलाने के लिये।
बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें
veenaji bahut sundar kavita badhai
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम
इन पंक्तियों ने तो दिल को छू लिया.... पूरी रचना बहुत ही सुंदर लगी... खासकर लास्ट लाइंस...
मेरे बेटे की डेथ की वजह से मैं देरी आया ... हूँ... वो सिर्फ चार साल का था...
प्रेम में स्वयं ही समर्पण का भाव आ जाता है।
हिमांशु जी,राजभाषा हिंदी, महेंद्र जी,जयकृष्ण जी, राधारमण जी और केरला हिंदी टीचर्स आप सबका दिल से शुक्रिया। अच्छा लगा कि केरला हिंदी टीचर्स ने भी पसंद किया और हिंदी में टिप्पणी भी की...धन्यवाद
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
सही है
मह्फ़ूज़ का बेटा!
बेटा ही तो था
देखिए हम फिर साथ खेलेंगे: महफ़ूज़ कह्ते रह गए और उनका बेटा चले गया
कोई जब मिले, मिल के बिछड़े, फिर मिले और फिर हमेशा के लिए बिछड़े तो तकलीफ होती है,
खैर वो अलग बात है, एक कविता याद आई इसे पढ़ के..
बहुत खूबसूरत लगा मुझे आपके दिल का दीवानापन :)
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
सुंदर, प्यार का इजहार करती हुई कोमल कविता ।
.
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम...
Beautiful expression of emotions.
Regards,
.
सरल एवं सुन्दर भावाभ्यक्ति| एक अच्छी रचना| शुभकामनायें|
- अरुण मिश्र.
बहुत सुन्दर.
वीणा जी कोई भी टिप्पणी नही । कुछ कहना
भी मेरे लिए इस रचना का अपमान करने जैसा होगा।
बस इतना कहना चाहुगॉं कि वीणा के सुर सदा सुनाई देता रहे।
लिल्लाह!
आशीष
--
प्रायश्चित
मन मुग्ध हो गया. अति सुन्दर !
seedhi ,sunder,saral.
प्रेम किसी अकिंचन अतिथि के रूप में हमारी जिंदगियों में प्रवेश करता है और हमारी स्व केंद्रित जीवनों को पूर्णतया बदल कर देता है और अधिकार जमाने की प्रवृति को मूक "अनकडीशनल समर्पण" की भाषा सिखा जाता है. बहुत सुंदर. आभार.
सादर
डोरोथी.
प्रेम किसी अकिंचन अतिथि के रूप में हमारी जिंदगियों में प्रवेश करता है और हमारी स्व केंद्रित जीवनों को पूर्णतया बदल कर देता है और अधिकार जमाने की प्रवृति को मूक "अनकंडीशनल समर्पण" की भाषा सिखा जाता है. बहुत सुंदर. आभार.
सादर
डोरोथी.
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
बहुत सुन्दर !
वाह...बहुत ही भावपूर्ण सुन्दर रचना...
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