शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बेबस मन..........वीना....

आजकल  
भागता है मन 
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में 
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है 
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग 
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

94 टिप्पणियाँ:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

समर्पण को परिभाषित करती हुई बेहतरीन कविता।

सादर

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

shandaar rachna
bahut umda

Dilbag Virk ने कहा…

man ke divanepan ko byan karti khoobsoorat rachna

बी एस पाबला ने कहा…

चंचल
पर बेबस मन की अभिव्यक्ति

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीय वीना जी
नमस्कार !
मन के भावो को अपने बखूबी चित्रित किया है
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ... yahi to mann ki vivashta hai

vijay ने कहा…

बेहतरीन...
बेबस मन की बेबसी.....

shaan ने कहा…

निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

मन मोह लिया....

इमरान अंसारी ने कहा…

काश ये मन न होता.......कभी कभी तो मन बहुत बेबस कर देता है इंसान को |

ashish ने कहा…

उधौ मन ना भये दस बीस , एक हुतो सो गए श्याम संग . अब पछताए क्या होता है . दिल लगाने से पहले सोचा होता . मन तो चंचल है ही . सुँदर रचना .

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

कुछ कविताये सिर्फ शब्द बंक्जर ही नहीं रहते , आपकी कविता उनमे से एक है , दिल को छूती हुई सी और मन में समाती हुई सी है ..

आभार

विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Vijai Mathur ने कहा…

मन के द्वारा मनन करके कार्य करने के कारण ही इंसान मनुष्य है। अतः मन तो नियंता है ही सभी कार्यों का। ।

वन्दना ने कहा…

इसी विवशता के आगे सभी लाचार हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मन की मनःस्थिति तो ऐसी ही होती है!
सुन्दर रचना!

Rajiv ने कहा…

जब कोई अपना सा मिल जाए तो ऐसा ही होता है.बहुत कोमल अहसासों से बुनी हुई रचना.

Maheshwari kaneri ने कहा…

बेबस मन की सुन्दर अभिव्यक्ति....

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

यह अनजाना पडाव गज़ब का आकर्षण रखता है । सुंदर कोमल प्रस्तुति ।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीय वीना जी
आजकल
भागता है मन
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
बहुत ही अच्छा लिखा है सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!

kumar ने कहा…

निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

kya baat hai.....
sundar

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रभावशाली प्रस्तुति, सुन्दर अभिव्यक्ति , आभार

रचना दीक्षित ने कहा…

मन रे तू कहे ना धीर धरे...

कोमल भावों से सजी सुंदर रचना.

Dorothy ने कहा…

कोमल अहसासों को पिरोती हुई एक खूबसूरत रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

man hai ji aakhi....pawan se tez...vo kaise tumhari baat sunega???

bahut sunder post.

आशुतोष की कलम ने कहा…

मनभावन मनःस्थिति

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

मन की मनःस्थिति तो ऐसी ही होती है!
सुन्दर रचना!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अनजानी है प्रेम डगरिया।

Saru Singhal ने कहा…

Beautiful, I have a smile on my face now...

सतीश सक्सेना ने कहा…

खूबसूरत अभिव्यक्ति....
शुभकामनायें आपको !

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

शब्दों और भावों का सुंदर समन्वय ..... उम्दा रचना

शिखा कौशिक ने कहा…

man की व्याकुलता ko शब्दों में बहुत कुशलता के साथ अभिव्यक्त किया है आपने .सुन्दर रचना .आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मन की कश्मकश ..
अच्छी प्रस्तुति

मनोज कुमार ने कहा…

ये मन भी बड़ा चंचल होता है।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

जिसके मिलाने की आशा न हो या जो हमारा न हो वो हमेशा खींचता है अपनी ओर... एक अज्ञात खिंचाव!! आपने भावों को खूबसूरत शब्द दिए हैं!!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय वीणा जी
सादर सस्नेहाभिवादन !


बड़ी भावपूर्ण रचना !
आजकल
भागता है मन
तुम्हारी तरफ्…

मन की स्थिति होती है इस तरह की कई बार …

प्रेम की सुंदर कविता है … आभार !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

राजेंद्र अवस्थी. ने कहा…

मन की मौलिकता के साथ साथ मन की चंचलता को शब्दों में पिरो कर द्र्शयांकित कर दिया आपने तो, बहुत उम्दा रचना....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

the best

ZEAL ने कहा…

nice creation !

sushma 'आहुति' ने कहा…

खुबसूरत अभिवयक्ति...

Amit Chandra ने कहा…

बहुत खुबसुरत रचना है। आभार।

S.N SHUKLA ने कहा…

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,आपकी कलम निरंतर सार्थक सृजन में लगी रहे .
एस .एन. शुक्ल

Mansoor Ali ने कहा…

भाव पूर्ण रचना.

उफ़ ! ये बेचारगी,
मन की आवारगी,
तन की अनबुझ तड़प,
कैसी लाचारगी ?

http://aatm-manthan.com

Amrita Tanmay ने कहा…

कविता ने मन मोह लिया।

Vaanbhatt ने कहा…

सावन के महीने में...ये तो होना ही था...

Murari Pareek ने कहा…

ये मन सचमुच वहीँ रमा रहता है जिसका हो जाता है ! कितना सझाने वाले समझाते है पर कहाँ समझता है ! सुन्दर अभिव्यक्ति है!!

रचना दीक्षित ने कहा…

एक अजीब सी कशमकश जो शायद हम सबके मन में रहती है दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में '
.................सच्चे प्रेम- समर्पण की भावपूर्ण प्रस्तुति

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मन तो मन है उसे बांधा nahin जा saktaa ....
aapne imandaari से मन के भाव प्रकट किये हैं .....
बधाई .....

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

mann unse lagaa hai,yahi kya kam hai ?
sundar bhav !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

mann unse lagaa hai,yahi kya kam hai ?
sundar bhav !

स्वाति ने कहा…

जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन..
bahut khoobsurat....

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, ने कहा…

वाह कितनी खूबसूरती के साथ मन की व्यथा को ढाल दिया आपने अपने शब्दों में यही है उत्तम लेखनी की पहचान बहुत अच्छा लगा ब्लॉग पर आकर


कई जिस्म और एक आह!!!

Anil Avtaar ने कहा…

जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ ?

Bahut hi pyari aur mahsusiyat ke saath likhi gai rachna.. aabhar.. aap hamare blog par aayin, hausala badhaya.. dhanyawaad..

Dr Varsha Singh ने कहा…

निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ


बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
हार्दिक शुभकामनायें !

Dr. shyam gupta ने कहा…

आशिकी की ये डोर भी कैसी है श्याम,
न भूल पायें उन्हें न याद कर पायें ज़नाब |

Vidhan Chandra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Vidhan Chandra ने कहा…

थोड़ी व्यस्तताओं के चलते ब्लॉग नहीं लिख पा रहा हूँ, मेरी मजबूरी समझ कर मुझे माफ़ करेंगे ऐसी उम्मीद है.

daanish ने कहा…

कई बार यूं भी देखा है ,
ये जो मन की सीमा-रेखा है ,,
मन 'खोजने' लगता है ......

बहुत प्रभावशाली रचना !

आशा ने कहा…

सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति |
बधाई |
आशा

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

khubsurat...
man ke andar ki baat:)

S.N SHUKLA ने कहा…

रक्षाबंधन एवं स्वाधीनता दिवस के पावन पर्वों की हार्दिक मंगल कामनाएं.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जहां प्रेम का प्रबल भाव होता है ... वहां ऐसा अक्सर होता है ... पर इस होने में भी समर्पण है प्रेम के निश्छल रूप के प्रति .... बहुत अच्छी लगी ये रचना ...

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

यूँ बेबस हो मन तो दुःख काहे का..!

Babli ने कहा…

आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

SM ने कहा…

shandaar rachna

NEELKAMAL VAISHNAW ने कहा…

नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"

इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्

1- MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

2-BINDAAS_BAATEN: व्यंगात्मक क्षणिकाएं......

3- http://neelkamal5545.blogspot.com

Babli ने कहा…

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Kailash C Sharma ने कहा…

कोमल अहसासों और सम्पूर्ण समर्पण के भाव संजोये बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बेहद खुबसूरत भाव...
उत्तम रचना...
सादर बधाईयाँ...

G.N.SHAW ने कहा…

ये किसी अनजानी बंधन के परिणाम है !ढाई अक्षर प्रेम का जो है !

रंजना ने कहा…

भावपूर्ण प्रेमाभिव्यक्ति...वाह !!!

Mired Mirage ने कहा…

वाह!सुंदर!
घुघूती बासूती

NEELKAMAL VAISHNAW ने कहा…

Veena jee आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए...
BINDAAS_BAATEN कृपया यहाँ चटका लगाये
MADHUR VAANI कृपया यहाँ चटका लगाये
MITRA-MADHUR कृपया यहाँ चटका लगाये

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। आपके जीवन का यह नया वर्ष असीमित सुख और समृद्धि देने वाला हो।
सादर

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…





आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

.



कहां हैं आप ?
पोस्ट बदलें अब … :)

हेमंत कुमार दुबे (Hemant Kumar Dubey) ने कहा…

आध्यात्मिकता की एक झलक देती सुंदर रचना !

Vijai Mathur ने कहा…

आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।

रचना दीक्षित ने कहा…

मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ.

विवशता का सफर समर्पण से जीतने का प्रयास.

dwij ने कहा…

बहुत ख़ूब.
अच्छी रचनाओं के लिए धन्यवाद.

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

दिनेश पारीक ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुंदर!

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बेहतरीन कविता.
Happy Deepawali.

amrendra "amar" ने कहा…

shandaar rachna
bahut umda

वाणी गीत ने कहा…

अपनी क्यों का जवाब खुद ही दिया ...
मन की डोर जो उन हाथों में है ...
सुन्दर प्रस्तुति!

चन्दन भारत ने कहा…

बहुत सुन्दर समर्पण क अभिव्यक्त करती !

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

बेहतरीन लिखा है,

Veerendra Vivek ने कहा…

achchhi kavita likhi hai. bahut badhiya hai.

Krishna Kumar Mishra ने कहा…

सुन्दर अति सुन्दर और क्य कहूं !

JAY SHANKER PANDEY ने कहा…

very nice lines veena ji.

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना , मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका आभारी हूँ .