आजकल
भागता है मन
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ
भागता है मन
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ
94 टिप्पणियाँ:
समर्पण को परिभाषित करती हुई बेहतरीन कविता।
सादर
shandaar rachna
bahut umda
man ke divanepan ko byan karti khoobsoorat rachna
चंचल
पर बेबस मन की अभिव्यक्ति
आदरणीय वीना जी
नमस्कार !
मन के भावो को अपने बखूबी चित्रित किया है
..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ... yahi to mann ki vivashta hai
बेहतरीन...
बेबस मन की बेबसी.....
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ
मन मोह लिया....
काश ये मन न होता.......कभी कभी तो मन बहुत बेबस कर देता है इंसान को |
उधौ मन ना भये दस बीस , एक हुतो सो गए श्याम संग . अब पछताए क्या होता है . दिल लगाने से पहले सोचा होता . मन तो चंचल है ही . सुँदर रचना .
कुछ कविताये सिर्फ शब्द बंक्जर ही नहीं रहते , आपकी कविता उनमे से एक है , दिल को छूती हुई सी और मन में समाती हुई सी है ..
आभार
विजय
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html
मन के द्वारा मनन करके कार्य करने के कारण ही इंसान मनुष्य है। अतः मन तो नियंता है ही सभी कार्यों का। ।
इसी विवशता के आगे सभी लाचार हैं।
मन की मनःस्थिति तो ऐसी ही होती है!
सुन्दर रचना!
जब कोई अपना सा मिल जाए तो ऐसा ही होता है.बहुत कोमल अहसासों से बुनी हुई रचना.
बेबस मन की सुन्दर अभिव्यक्ति....
यह अनजाना पडाव गज़ब का आकर्षण रखता है । सुंदर कोमल प्रस्तुति ।
आदरणीय वीना जी
आजकल
भागता है मन
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
बहुत ही अच्छा लिखा है सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए आभार!
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ
kya baat hai.....
sundar
बहुत सुन्दर प्रभावशाली प्रस्तुति, सुन्दर अभिव्यक्ति , आभार
मन रे तू कहे ना धीर धरे...
कोमल भावों से सजी सुंदर रचना.
कोमल अहसासों को पिरोती हुई एक खूबसूरत रचना. आभार.
सादर,
डोरोथी.
man hai ji aakhi....pawan se tez...vo kaise tumhari baat sunega???
bahut sunder post.
मनभावन मनःस्थिति
मन की मनःस्थिति तो ऐसी ही होती है!
सुन्दर रचना!
अनजानी है प्रेम डगरिया।
Beautiful, I have a smile on my face now...
खूबसूरत अभिव्यक्ति....
शुभकामनायें आपको !
very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥
very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥
very nice.............
प्रेम गहन अनुभूति है, प्रेम अमित आनन्द।
यह परोसने से बढ़े, अद्भुत मन-मकरंद॥
शब्दों और भावों का सुंदर समन्वय ..... उम्दा रचना
man की व्याकुलता ko शब्दों में बहुत कुशलता के साथ अभिव्यक्त किया है आपने .सुन्दर रचना .आभार
मन की कश्मकश ..
अच्छी प्रस्तुति
ये मन भी बड़ा चंचल होता है।
जिसके मिलाने की आशा न हो या जो हमारा न हो वो हमेशा खींचता है अपनी ओर... एक अज्ञात खिंचाव!! आपने भावों को खूबसूरत शब्द दिए हैं!!
प्रिय वीणा जी
सादर सस्नेहाभिवादन !
बड़ी भावपूर्ण रचना !
आजकल
भागता है मन
तुम्हारी तरफ्…
मन की स्थिति होती है इस तरह की कई बार …
प्रेम की सुंदर कविता है … आभार !
-राजेन्द्र स्वर्णकार
मन की मौलिकता के साथ साथ मन की चंचलता को शब्दों में पिरो कर द्र्शयांकित कर दिया आपने तो, बहुत उम्दा रचना....
the best
nice creation !
खुबसूरत अभिवयक्ति...
बहुत खुबसुरत रचना है। आभार।
मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,आपकी कलम निरंतर सार्थक सृजन में लगी रहे .
एस .एन. शुक्ल
भाव पूर्ण रचना.
उफ़ ! ये बेचारगी,
मन की आवारगी,
तन की अनबुझ तड़प,
कैसी लाचारगी ?
http://aatm-manthan.com
कविता ने मन मोह लिया।
सावन के महीने में...ये तो होना ही था...
ये मन सचमुच वहीँ रमा रहता है जिसका हो जाता है ! कितना सझाने वाले समझाते है पर कहाँ समझता है ! सुन्दर अभिव्यक्ति है!!
एक अजीब सी कशमकश जो शायद हम सबके मन में रहती है दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती
'निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में '
.................सच्चे प्रेम- समर्पण की भावपूर्ण प्रस्तुति
मन तो मन है उसे बांधा nahin जा saktaa ....
aapne imandaari से मन के भाव प्रकट किये हैं .....
बधाई .....
mann unse lagaa hai,yahi kya kam hai ?
sundar bhav !
mann unse lagaa hai,yahi kya kam hai ?
sundar bhav !
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन..
bahut khoobsurat....
वाह कितनी खूबसूरती के साथ मन की व्यथा को ढाल दिया आपने अपने शब्दों में यही है उत्तम लेखनी की पहचान बहुत अच्छा लगा ब्लॉग पर आकर
कई जिस्म और एक आह!!!
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है
उसी तरफ ?
Bahut hi pyari aur mahsusiyat ke saath likhi gai rachna.. aabhar.. aap hamare blog par aayin, hausala badhaya.. dhanyawaad..
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ
बहुत सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !
हार्दिक शुभकामनायें !
आशिकी की ये डोर भी कैसी है श्याम,
न भूल पायें उन्हें न याद कर पायें ज़नाब |
थोड़ी व्यस्तताओं के चलते ब्लॉग नहीं लिख पा रहा हूँ, मेरी मजबूरी समझ कर मुझे माफ़ करेंगे ऐसी उम्मीद है.
कई बार यूं भी देखा है ,
ये जो मन की सीमा-रेखा है ,,
मन 'खोजने' लगता है ......
बहुत प्रभावशाली रचना !
सुन्दर भाव पूर्ण प्रस्तुति |
बधाई |
आशा
khubsurat...
man ke andar ki baat:)
रक्षाबंधन एवं स्वाधीनता दिवस के पावन पर्वों की हार्दिक मंगल कामनाएं.
जहां प्रेम का प्रबल भाव होता है ... वहां ऐसा अक्सर होता है ... पर इस होने में भी समर्पण है प्रेम के निश्छल रूप के प्रति .... बहुत अच्छी लगी ये रचना ...
यूँ बेबस हो मन तो दुःख काहे का..!
आपको एवं आपके परिवार को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
shandaar rachna
नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"
इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्
1- MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......
2-BINDAAS_BAATEN: व्यंगात्मक क्षणिकाएं......
3- http://neelkamal5545.blogspot.com
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
कोमल अहसासों और सम्पूर्ण समर्पण के भाव संजोये बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति..
बेहद खुबसूरत भाव...
उत्तम रचना...
सादर बधाईयाँ...
ये किसी अनजानी बंधन के परिणाम है !ढाई अक्षर प्रेम का जो है !
भावपूर्ण प्रेमाभिव्यक्ति...वाह !!!
वाह!सुंदर!
घुघूती बासूती
Veena jee आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए...
BINDAAS_BAATEN कृपया यहाँ चटका लगाये
MADHUR VAANI कृपया यहाँ चटका लगाये
MITRA-MADHUR कृपया यहाँ चटका लगाये
जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। आपके जीवन का यह नया वर्ष असीमित सुख और समृद्धि देने वाला हो।
सादर
♥
आपको सपरिवार
नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !
-राजेन्द्र स्वर्णकार
.
कहां हैं आप ?
पोस्ट बदलें अब … :)
आध्यात्मिकता की एक झलक देती सुंदर रचना !
आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ.
विवशता का सफर समर्पण से जीतने का प्रयास.
बहुत ख़ूब.
अच्छी रचनाओं के लिए धन्यवाद.
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! और शानदार प्रस्तुती!
मैं आपके ब्लॉग पे देरी से आने की वजह से माफ़ी चाहूँगा मैं वैष्णोदेवी और सालासर हनुमान के दर्शन को गया हुआ था और आप से मैं आशा करता हु की आप मेरे ब्लॉग पे आके मुझे आपने विचारो से अवगत करवाएंगे और मेरे ब्लॉग के मेम्बर बनकर मुझे अनुग्रहित करे
आपको एवं आपके परिवार को क्रवाचोथ की हार्दिक शुभकामनायें!
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
सुंदर!
बेहतरीन कविता.
Happy Deepawali.
shandaar rachna
bahut umda
अपनी क्यों का जवाब खुद ही दिया ...
मन की डोर जो उन हाथों में है ...
सुन्दर प्रस्तुति!
बहुत सुन्दर समर्पण क अभिव्यक्त करती !
बेहतरीन लिखा है,
achchhi kavita likhi hai. bahut badhiya hai.
सुन्दर अति सुन्दर और क्य कहूं !
very nice lines veena ji.
बहुत सुन्दर रचना , मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका आभारी हूँ .
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