क्यों ?
लगते हैं
पत्ते पेड़ों पर
क्यों ?
झरने बहते हैं
क्यों ?
रोज निकलता है
सूरज
क्यों ?
होती है रात
क्यों ?
बरसते हैं बादल
पेड़ देते हैं छाया
क्यों ?
राहें पहुंचाती हैं
मंजिल तक
क्यों ?
मोड़ देते हैं
जीवन चुनने के
बेहतर अवसर
क्यों ?
प्रकृति कराती है विश्वास
अनादि शक्ति का
जब इंसान
रौंदता है
विश्वास को
अच्छाई का सिला
देता है धूर्तता से
करता है छल
कपटता से
जीवन बिता देता है
झूठ को
सच बनाते
आंखों में
सुरमें की जगह
डाल लेता है बाल
सूअर के
आत्मा पर
चढ़ा लेता है चर्बी
कपट की
गिद्ध की तरह
तलाशता है
नया शिकार
कहां है वो
अनादि शक्ति
क्या ?
उसने भी पहन लिया
हार का हार
या हो रही है तैयार
सहने को अंत
एक और सभ्यता का
7 टिप्पणियाँ:
वीणा जी,
आपके सवालों में जो उत्तर समाहित हैं वे हृदयस्पर्शी हैं. आशा है ऐसी सुन्दर अभिव्यक्तियाँ आगे भी स्फुटित होंगी.
कुछ सवाल ..............और उतने ही अच्छे ढंग से उनके जवाब दिए है....बहुत खूब !!! सुन्दर रचना !!!
मदन जी राजेंद्र जी उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद। उम्मीद है आगे भी इसी तरह उत्साहवर्धन करेंगे
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ ही एक सशक्त सन्देश भी है इस रचना में।
आप लिखी की ख़राब नहीं लगेगा...नहीं बिलकुल ही नहीं... हमारे लिए हो ये बहुत बरी बात है की आप से मै कुछ सिख रहा हु .मै नई हु इस ब्लोग्स के दुनिया में आप यू ही आपना सलाह देते रहेगी .एक सलाह लेना था आप लोग जो कमेन्ट भेजते है वह मेरे सेट्टिंग के कमेन्ट के पब्लिकेस में चला जाता है.यह कैसे ठीक होगा ??
Very well written.Very Motivating.These types of ideas will certainly bring revolution one date
"क्यों ?लगते हैं पत्ते पेड़ों पर" बहुत सुन्दर आप यू ही लिखते रहे ताकी समाज को कुछ सिखने को मिले .मेरे रचना "तुम्हारी परछाई" और "आ भी जाओ अब" कैसा लगा लिखागे .
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