बुधवार, 11 अगस्त 2010

दया नहीं स्वाभिमान दो............


चांद को मत देखो
सितारों को
तोडऩे की बात
मत करो
किसी से
कुछ करने का साहस है
तो दूर करो
समाज में फैली
कुरीतियों को
पोछो आंसू
समाज की ठोकरों में
पलने वाले जीवन के
सहारा बनो
लडख़ड़ाते पैरों का
नफरत की आग को
बुझा दो
प्यार के नीर से
बरसा दो प्रेम के मेघ
खिलने दो फूल
फैलने दो हरियाली
पूरे करो
बच्चों की आंखों में
पलते सपनों को
दया नहीं
स्वाभिमान दो
जीवन को

7 टिप्पणियाँ:

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

खिलने दो फूल
फैलने दो हरियाली
पूरे करो
बच्चों की आंखों में
पलते सपनों को
दया नहीं
स्वाभिमान दो
जीवन को
बहुत प्रेरक और सुंदर भी ।

वीना ने कहा…

आशा जी प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद

वीना ने कहा…

आशा जी प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Sundarv rachna .. prerna deti huyi .. aasha ka sanchaar karti ....

vinita ने कहा…

आपने मेरे ब्लॉग पर आकर मुझे अपने भाव को व्यक्त करें के लिए प्रोत्साहित किया इसके लिए धन्यवाद !
आपकी इस रचना ने मुझे मेरे द्वारा लिखी रचना का याद दिला दिया ! निश्चय ही स्वाभिमान ही देना है जो ना जाने कही खोग्य है !

JAY SHANKER PANDEY ने कहा…

bahut sundar rachna.

Apanatva ने कहा…

bahut sunder sandesh dete rachana....
bahut pasand aaee....
pahlee var hee aana huaa hai aapke blog par ..........
saarthak raha .....
bahut accha laga......