अंजाम-ए-मुहब्बत क्या होगा, जब दिल ही हम यूं लगा बैठे
अब आगे न जाने क्या होगा, हम ऐसी नादानी कर बैठे
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जीवन में, यादों पर हम भी जी बैठे
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
86 टिप्पणियाँ:
आपने खुद को खुदाई से बुलंद कर लिया फिर क्या चाहिए?
ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
क्या बात है, यही प्यार है। सच्ची बंदगी
आपकी एक बड़ी गलती। इतनी अच्छी रचनाएं पढ़वाने से आप बहुत दिन महरूम रखती हैं। थोड़ा जल्दी पोस्ट किया करें। इंतजार रहता है- आपका और आपकी रचना का-
क्या बात है वीना जी...आज अंदाज़ थोड़े बदले हुए से दिख रहे हैं आपके...
दिल खुश कर दिया जी आपने..
......शुक्रिया
आदरणीय वीना जी,
नमस्कार !
अच्छी लगी आपकी शिल्पकारी . प्रेम की भाव प्रवणअभिव्यक्ति
बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति !
.........बधाई हो !
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान है
सच कहा है प्यार किसी बंधन का मोहताज नहीं..हम सब बस इंसान ही है
खूबसूरत गज़ल
एक बार फिर से बहुत उम्दा रचना....बधाई
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान है
सच कहा है प्यार किसी बंधन का मोहताज नहीं..हम सब बस इंसान ही है
खूबसूरत गज़ल
एक बार फिर से बहुत उम्दा रचना....बधाई
क्या बात है! बड़े दिनों बाद आईं और आते ही धमाका कर दिया। बेहतरीन गजल।
इस बार मेरे ब्लाग पर `उदासी का सबब´।
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
चलिए किसी ने तो हमें बरी किया। शम्मा ने खुद स्वीकारा वरना हमेशा परवाने को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। बहुत खूबसूरत गज़ल। आपने कमाल कर दिया
Adarniiya Veena ji,
ek ek shabd me jaan daal kar bahut hi saral shabdon me bahut badi baat kah di hai aapne.
saadar-
yashwant
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
बेहद खूबसूरत गज़ल। वीना दी नई पोस्ट में इतनी देर क्यूं पर देर से ही सही धमाल-कमाल कर दिया
क्या बात है दीदी। आपने तो कमाल कर दिया। इतनी रूमानियत भरी गज़ल।
एक-एक शब्द दिल की जुबान है...
अंतिम पंक्तियों का तो कोई जवाब ही नही
बहुत खूबसूरत हैं। यही होना ही चाहिए।
इश्क सबसे बड़ी इंसानियत है
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे...
बहुत भावपूर्ण गज़ल.हरेक शेर लाज़वाब..आभार
वीणा जी,
बहुत खुबसूरत कोशिश है आपकी.....काफी दिनों के बाद आपको पढ़ना अच्छा लगा......पर आप बुरा न मने तो एक बात कहूँ..... मेरी नज़र में इस रचना में कुछ सुधर किया जा सकता है...मैंने कोशिश की है....बताईएगा आपको कैसी लगी....
"अंजाम-ए-मुहब्बत क्या होगा, जब दिल ही हम यूं लगा बैठे
अब आगे न जाने क्या होगा, हम होश अपना गँवा बैठे
परवाना ही चला जलने को, शमा को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद परवाने ने,शमा को क्यूं जला बैठे
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जिन्दगी में, यादों पर भी हम पहरे लगा बैठे
इश्क ईमान है, इश्क अरमान है, इश्क में बने इंसान हैं
इश्क को 'वीना' ने सजदा किया, ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे"
Iyana gar tut jaye to Koi baat nahi
ey dhost dil bikta nahi bazaro main.
Bhoj
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
वीणा जी , बहुत ही सुंदर प्रस्तुति . अब इश्क कर ही लिया तो अंजाम से क्या डरना.
.
उपेन्द्र
सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )
इमरान जी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने सुझाव दिए।
जहां तक मतला है उसमें होश गंवाने की नही नादानी की बात कही है।
दूसरे शेर में आपने अपनी बात कही है...आशिक के दिल की बात कही है..परवाने की बात कही है पर आप भूल गए मैं शमा की बात कर रही हूं। हमेशा क्या परवाना ही खता करता है क्या शमा खुद नहीं जल सकती....या वह जलना नहीं चाहती। ऐसा भी होता है।
तीसरा शेर .......
तो यादों पर मैने जीने की बात कही है...पहरे लगाने की नहीं और होता भी है। क्या यादों के सहारे नहीं जिया जाता...यादों के सहारे मैने लोगों को पूरा जीवन गुजारते देखा है।...कभी मैने भी जीने की सोची थी।...
अब बात आखिरी शेर की...
इश्क में हम सब केवल और केवल इंसान हैं...इंसान बने नहीं हैं। जब हम प्यार करते हैं तो केवल इंसान होते हैं। उस समय हम हिंदू-मुस्लिम, ब्राह्मण-क्षत्रिय नहीं होते..प्यार किसी बंधन का मोहताज नहीं है...उम्र,जाति,धर्म, रंग-रूप किसी भी बात का नही, इसीलिए हम सब बस इंसान है। इसीलिए प्यार को अंधा कहा गया है...और मैं किसी को भी किसी जाति या अन्य बंधन से जोड़कर नहीं देखती। वैसे भी मेरी नजर में हम सब पहले इंसान हैं बाद में किसी जाति या सम्प्रदाय के। इसलिए मैने लिखा है
इश्क में हम सब बस इंसान हैं।
उम्मीद है आप मेरी बातों से सहमत होंगे। यह गज़ल मेरी जान है....मेरी आत्मा। बहुत पहले लिखी थी...लेकिन मै वाकई मानती हूं प्यार ही पूजा है और मैं यह पूजा करती हूं।
लेकिन अच्छा लगा कि आपने बिना किसी संकोच के अपनी बात सामने रखी। लगा आपने काफी मन से पढ़ा है इसे। लिखने वाले को और क्या चाहिए....
bahut badhiyaa
अच्छी ग़ज़ल ...!
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
दिल दिमाग पर अच्छा प्रभाव डालने वाली रचना...बधाई।
वीणा जी
बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल..एक एक शेर सटीक पड़े हैं...
वाह...
मुट्ठी भर आसमान...
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
बहुत अच्छी रचना है। दिल को छू गयी। और आखिरी पाँक्तियाँ तो लाजवाब हैं बधाई और शुभकामनायें।
सुन्दर गजल!
वाकई में दिल पर कोई जोर नहीं चलता!
विजय जी, शान जी,संजय जी शालूजी, विजय जी यशवंत जी, पूजा जी, आस्था जी, कैलाश जी,इमरान जी, भोज जी, उपेंद्र जी, अमित जी आप सभी का स्नेह और आशीर्वाद देने के लिए धन्यवाद...विश्वास है यह सहयोग और साथ आगे भी बनाए रखेंगे...
इतने दिन नदारद नहीं रहना चाहिए आपको। यदि आप नदारद नहीं रहतीं तो हमको अब तक कुछ और उम्दा रचनाएं पढ़ने को मिल जातीं। अब सिलसिला बनाए रखिएगा...
बेहद खूबसूरत गज़ल....बधाई
बहुत अच्छी प्रस्तुति ...आपकी यह गज़ल पढ़ कर बहुत पहले अपना लिखा शेर याद आ गया ---
परवाने की मौत पर शमा रोती है
उसके हर अश्क की बूंद परवाने के लिए होती है
परवाना शमा का दीवाना होता है
और उसकी मौत शमा से ही होती है ...
वीणा जी,
पहले शेर में आपसे इत्तेफाक है पर दूसरे शेर में शमां का तो काम ही जलना है वो परवाने के लिए नहीं जलती वो तो खुद जलकर दूसरो को रौशनी देती है....हाँ परवाना ज़रूर शमां की वजह से जल जाता है| तीसरा भी ठीक है पर आख्रिरी शेर आपकी सभी बातों से मैं सहमत हूँ पहले कोई इंसान है फिर इंसान ने उसे बाँट दिया है......पर आप गौर करें तो मैंने ये कहा था -
इश्क ईमान है, इश्क अरमान है, इश्क में बने इंसान हैं
इश्क को 'वीना' ने सजदा किया, ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे"
सच तो ये है की इश्क से ही इंसान बनता है उससे पहले तो वो एक मुर्दा, एक जानवर ही है.....वो इश्क ही है जो उसे जीना सिखाता है, जो वाकई में उसे इंसान बनाता है......
आपने मेरे सुझावों को तवज्जो दी उसके लिए आपका शुक्रिया......और संकोच किस बात का मैं सिर्फ किसी की शान में कसीदे पड़ने के लिए उसके ब्लॉग पर नहीं जाता......मैं सिर्फ पोस्ट पड़ता हूँ अगर कुछ कमी लगती है तो बोल देता हूँ.......
अंजाम ए मुहब्ब्त में प्रेम ही खुदा हो जाता है
।
छिपी हुई कलियों यानी छिपकलियों का कहना है कि बिन बोले अब मुझे, नहीं कहना है
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
अच्छी अभिव्यक्ति !बधाई हो !
इमरान जी
आपतो बुरा मान गए। मैं भी किसी की शान में कसीदे नहीं पढ़ती, गलत लगता है तो जरूर कहती हूं पर किसी के भावों को गलत नही ठहराती, क्योकि अपनी सोच के स्तर पर ही हम स्वतंत्र है और कवि या कलाकार जितनी दूर तक जाना चाहता है,जाता है। मैं बताती हूं तो उसकी भाषा से सम्बद्ध गलतियां या शब्दों का हेर-फेर वो भी वर्तनी के स्तर पर और अगर एक या दो बार कोई शब्द गलत हो तो नहीं कहती क्योंकि वो टाइप करने में भूल हो सकती है पर वही गलती बार-बार हो तभी कहती हूं
आप भी उसी सोच के है कि शमा का काम जलना है...माना कि रोशनी के लिए जलती है ऐसे तो बहुत सारी बातें है..जो लागू ही नही होतीं पर कवि सोचता हैं और नए प्रयोग भी करता है।...यहां सीधी बात शमा-परवाने की नहीं बल्कि रूपक के तौर पर रखा गया है अगर शमा का काम जलना है तो परवाने का क्या है...उसको भी जलकर मरना ही है और वो भी किसी भी शमा के लिए..तो उस पर इतना हंगामा क्यूं....क्यों परवाने पर लिखा जाता है....जब उसका काम ही जलना है तो इस बात की इतनी एहमियत क्यूं.....शमा जलती है तो परवाने आते ही है। मैने तो उसे इस बात से बरी किया है कि परवाने पर तोहमत क्यों.... मैने तो उसको रूपक की तरह रखा है एक उदाहरण है...यहां बात प्रेमी-प्रेमिका की है क्या हमेशा प्रेमी ही जलना चाहता है क्या प्रेमिका नहीं चाह सकती, क्या उसकी कोई इच्छा या उसकी इच्छाओं का कोई सम्मान नहीं....यह केवल आपकी ही नहीं पुरुष प्रधान मानसिकता वालों की सोच है और हो भी तो यह सच नहीं बदलेगा कि प्रेमिका की अपनी चाहत हो सकती है...और प्यार तभी फलेगा-फूलेगा जब दोनों तरफ से प्यार होगा तो एक पर इल्ज़ाम क्यों...प्यार में दोनों बराबर के भागीदार हैं। मैने शमा-परवाने का सहारा लेकर एक प्रेमिका के दिल की बात कही है।
रही बात इंसानियत की तो जो प्यार नही करते इमरान जी वो भी इंसान हैं...मैं मानती हूं कि प्यार आदमी को इंसान बनाता है...पर यहां जो मैं कहना चाह रही हूं और मेरा अपना क्या प्यार करने वालों का ही ये मानना है कि वो कुछ और नही देखते बस इंसान देखते हैं...और प्यार जानवरों से भी होता है पर जीवनसाथी इंसान ही बनता है। मेरा भी मानना है कि जब प्यार होता है तो केवल व्यक्ति विशेष को देखा जाता है यहां भी रूपक है। यह सच है कोई जाति-धर्म देखकर नहीं प्यार करता...एक और उदाहरण दूं दिल का क्या काम है..केवल और केवल रक्त शुद्ध करना तो कोई दिल के हाथों कैसे मजबूर हो सकता है। भावनाओं की खातिर तो मजबूरी हो सकती है पर दिल के हाथों बेचारा दिल..शरीर का एक हिस्सा। सारा इल्जा़म उसके सिर। दिमाग तो सोचता है लेकिन दिल एक खून साफ करने की मशीन है बस.... पर यहां तो सारा मामला दिल का ही है...सारी बातों की शुरुवात तो दिल से ही होती है...
गालिब तो बहुत पहले लिख गए
प्यार वो आतिश है गालिब
कि लगाए न लगे बुझाए न बुझे
मैं कायस्थ परिवार से हूं और मेरे जीवनसाथी ब्राह्मण हैं...हमने प्यार किया तो जाति-धर्म नही देखा और हमें गर्व है कि हम पहले इसान हैं बाद में कायस्थ या ब्राह्मण....मेरा इंसान से यह मतलब था।...न कि मैं किसी को इंसान बनाने चली थी...और दोस्ती में किसी को इंसान बनाया भी जा सकता है पर हर दोस्त प्यार नहीं हो सकता।
आपको जो ठीक लगा आपने कहा और जो मुझे ठीक लगा मैने लिखा...आपके अपने विचार हैं अपनी सोच है...मेरी अपनी....और जो लिखा उसके लिए अपनी बात रखने की कोशिश की भी है...सफल हुई कि नहीं मैं नही जानती...हां भाषाई गलती होगी तो जरूर सुधारूंगी....सादर
इमरान जी
आपतो बुरा मान गए। मैं भी किसी की शान में कसीदे नहीं पढ़ती, गलत लगता है तो जरूर कहती हूं पर किसी के भावों को गलत नही ठहराती, क्योकि अपनी सोच के स्तर पर ही हम स्वतंत्र है और कवि या कलाकार जितनी दूर तक जाना चाहता है,जाता है। मैं बताती हूं तो उसकी भाषा से सम्बद्ध गलतियां या शब्दों का हेर-फेर वो भी वर्तनी के स्तर पर और अगर एक या दो बार कोई शब्द गलत हो तो नहीं कहती क्योंकि वो टाइप करने में भूल हो सकती है पर वही गलती बार-बार हो तभी कहती हूं
आप भी उसी सोच के है कि शमा का काम जलना है...माना कि रोशनी के लिए जलती है ऐसे तो बहुत सारी बातें है..जो लागू ही नही होतीं पर कवि सोचता हैं और नए प्रयोग भी करता है।...यहां सीधी बात शमा-परवाने की नहीं बल्कि रूपक के तौर पर रखा गया है अगर शमा का काम जलना है तो परवाने का क्या है...उसको भी जलकर मरना ही है और वो भी किसी भी शमा के लिए..तो उस पर इतना हंगामा क्यूं....क्यों परवाने पर लिखा जाता है....जब उसका काम ही जलना है तो इस बात की इतनी एहमियत क्यूं.....शमा जलती है तो परवाने आते ही है। मैने तो उसे इस बात से बरी किया है कि परवाने पर तोहमत क्यों.... मैने तो उसको रूपक की तरह रखा है एक उदाहरण है...यहां बात प्रेमी-प्रेमिका की है क्या हमेशा प्रेमी ही जलना चाहता है क्या प्रेमिका नहीं चाह सकती, क्या उसकी कोई इच्छा या उसकी इच्छाओं का कोई सम्मान नहीं....यह केवल आपकी ही नहीं पुरुष प्रधान मानसिकता वालों की सोच है और हो भी तो यह सच नहीं बदलेगा कि प्रेमिका की अपनी चाहत हो सकती है...और प्यार तभी फलेगा-फूलेगा जब दोनों तरफ से प्यार होगा तो एक पर इल्ज़ाम क्यों...प्यार में दोनों बराबर के भागीदार हैं। मैने शमा-परवाने का सहारा लेकर एक प्रेमिका के दिल की बात कही है।
रही बात इंसानियत की तो जो प्यार नही करते इमरान जी वो भी इंसान हैं...मैं मानती हूं कि प्यार आदमी को इंसान बनाता है...पर यहां जो मैं कहना चाह रही हूं और मेरा अपना क्या प्यार करने वालों का ही ये मानना है कि वो कुछ और नही देखते बस इंसान देखते हैं...और प्यार जानवरों से भी होता है पर जीवनसाथी इंसान ही बनता है। मेरा भी मानना है कि जब प्यार होता है तो केवल व्यक्ति विशेष को देखा जाता है यहां भी रूपक है। यह सच है कोई जाति-धर्म देखकर नहीं प्यार करता...एक और उदाहरण दूं दिल का क्या काम है..केवल और केवल रक्त शुद्ध करना तो कोई दिल के हाथों कैसे मजबूर हो सकता है। भावनाओं की खातिर तो मजबूरी हो सकती है पर दिल के हाथों बेचारा दिल..शरीर का एक हिस्सा। सारा इल्जा़म उसके सिर। दिमाग तो सोचता है लेकिन दिल एक खून साफ करने की मशीन है बस.... पर यहां तो सारा मामला दिल का ही है...सारी बातों की शुरुवात तो दिल से ही होती है...
गालिब तो बहुत पहले लिख गए
प्यार वो आतिश है गालिब
कि लगाए न लगे बुझाए न बुझे
मैं कायस्थ परिवार से हूं और मेरे जीवनसाथी ब्राह्मण हैं...हमने प्यार किया तो जाति-धर्म नही देखा और हमें गर्व है कि हम पहले इसान हैं बाद में कायस्थ या ब्राह्मण....मेरा इंसान से यह मतलब था।...न कि मैं किसी को इंसान बनाने चली थी...और दोस्ती में किसी को इंसान बनाया भी जा सकता है पर हर दोस्त प्यार नहीं हो सकता।
आपको जो ठीक लगा आपने कहा और जो मुझे ठीक लगा मैने लिखा...आपके अपने विचार हैं अपनी सोच है...मेरी अपनी....और जो लिखा उसके लिए अपनी बात रखने की कोशिश की भी है...सफल हुई कि नहीं मैं नही जानती...हां भाषाई गलती होगी तो जरूर सुधारूंगी....सादर
आदरणीय वीणा जी आप सही हैं मैं आपकी बात से सहमत हूं कि शमा खुद भी चाह सकती है और धन्यवाद कि आपने हम पुरुष वर्ग को बरी किया वरना हम पर ही इल्जाम लगाया जाता है कि हमारी लड़की तो भोली थी लड़के का ही कुसूर है। यह अक्सर होता है। बरगलाने का इल्जाम लड़के पर आता है पर मजा आया आपकी बहस में। वैसे भी किसी के भावों पर हमें नहीं कहना चाहिए। जितना अधिकार उन्हें लिखने का है सोचने का है ,सभी को उतना है। आप सही है कि भाषाई गलती को जरूर सुधारा जाना चाहिए हम सबका कर्तव्य भी है अगर हम हिंदी में लिखते हैं तो पहली शर्त शुद्ध हिंदी होनी चाहिए।
gazal ke bhav achchhe hain...
pingal ya radeef- kafiya ke chakkar me kya padna....
wah to rachnakar khud hi dekhta hai...
ham koi ustad thode hain jo kisi sundar bhav ki kavita ki bakhiya udhedne me lag jayen...
वीणा जी,
आपने यहाँ रूपक दिए थे ये मुझे नहीं पता....क्या करूँ शयरी की शायद इतनी समझ नहीं है मुझमे....मैंने उसके बारे में कहा....जो लिखा गया था....शायद मैं उसमे छिपे आपके भावों को नहीं समझ पाया......ये बात आपने ठीक की है ये अपनी-अपनी सोच की बात है.......बात पुरुष की या स्त्री की मानसिकता वाली नहीं है और न मैंने इस तरफ ध्यान दिया मैंने यहाँ उर्दू अदब में जो लफ्ज़ बयां किये जाते हैं उसको बयां किया था.....
बात आखिर में वही अहं पर आ जाती है...बस उस पर चोट न लग जाये......एक बात कहना चाहूँगा ........फ़क़त बड़ी-बड़ी बातें कर लेने से कोई बड़ा नहीं होता.....हमने जो लिख दिया वो ठीक है .......
मैं आपसे उम्र में छोटा हूँगा ....अगर मेरी वजह से आपको तकलीफ हुई है तो मैं आपसे माफ़ी मांगता हूँ.....छोटा समझ के माफ़ कीजियेगा......ऐसी गुस्ताखी अब नहीं होगी......तौबा बात कहाँ से कहाँ पहुंचा दी आपने...
बहुत ही सुन्दर ...;।
वाह बहुत सुंदर..
गा के पढ़ने को दिल किया इसे.
इमरान जी माफी मांगने जैसी कोई बात नहीं है। मुझे आपकी सिर्फ यह बात खराब लगी थी जो आपने कहा था कि मैं कसीदे पढ़ने के लिए किसी के ब्लॉग पर नहीं जाता गोया मैं यह चाहती हूं कि मेरी तारीफ ही हो...बाकी जो आपको लगा आपने कहा,जो कहीं से गलत नहीं था, उस पर मैने अपना पक्ष रखा क्योंकि आपके मन में कुछ सवाल उठे। रचना मेरी थी इसलिए आपको समझाना,अपना पक्ष रखना मेरा कर्त्तव्य था मैने वही किया...वैसे भी आप उम्र में छोटे हैं जाहिर है समय के साथ आप समझेंगे। मुझे इसके आलावा कुछ खराब नहीं लगा। सादर
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
वीना जी
गजल की हर पंक्ति सुंदर और मानवीय सन्देश देती है ...बहुत खूब
चलते -चलते पर आपका स्वागत है
अंजाम-ए-मुहब्बत क्या होगा, जब दिल ही हम यूं लगा बैठे
अब आगे न जाने क्या होगा, हम ऐसी नादानी कर बैठे
क्या बात है वीना जी आपके शेर में
किसी ने खूब कहा है,वीना जी:-
ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जीवन में, यादों पर हम भी जी बैठे
बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति...
Kya visphot hai. Dil aur dimag dono ghayal ho gaya. sundar prastuti.Hamara bhi blog jara dekhne ki koshis kijiyega.
खूबसूरत!
लिल्लाह! वल्लाह! माशाल्लाह!
आशीष
---
नौकरी इज़ नौकरी!
खूबसूरत गज़ल, कमाल
बेहद खूबसूरत गज़ल,
बधाई
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे|
बहुत सुन्दर रचना, बहुत - बहुत शुभकामना
@ ऐ मेरी अज़ीमुल मरतबत बहन , वीणा जी !
रूसवाई के सिवा अंजामे मुहब्बत क्या होगा
दीवाना सोचता कब है कि इश्क़ का अंजाम क्या होगा
और
पैग़ाम है माँ का ये बेटे के नाम
है तेरा काम देना अमन का पैग़ाम
क्या माँ ने झूठ बोला था सोचा बहुत सुबह शाम
फिर सवाल किया मैंने लेकर प्रभु का नाम
निहारा उसने ऐसे मुझको जैसे मैं घनश्याम
फिर यूँ बोली मुझसे बेटा मत दे इल्ज़ाम
जो कहा उसे तू इक वसीयत समझ मेरी
जिसे पूरा करना ही अब है तेरा काम
हंस यहां अपशकुन करे जंगल जले तमाम
हर पेड़ पे लिखना अल्लाह तू पात पात पे राम
अपने रूप सा सुंदर तू बनाना दुनिया सारी
हर जन को पहुंचाकर 'अमन का पैग़ाम'
आपकी आमद के लिए मैं आपका बेहद शुक्रगुज़ार हूँ ।
@ ऐ मेरी अज़ीमुल मरतबत बहन , वीणा जी !
रूसवाई के सिवा अंजामे मुहब्बत क्या होगा
दीवाना सोचता कब है कि इश्क़ का अंजाम क्या होगा
और
पैग़ाम है माँ का ये बेटे के नाम
है तेरा काम देना अमन का पैग़ाम
क्या माँ ने झूठ बोला था सोचा बहुत सुबह शाम
फिर सवाल किया मैंने लेकर प्रभु का नाम
निहारा उसने ऐसे मुझको जैसे मैं घनश्याम
फिर यूँ बोली मुझसे बेटा मत दे इल्ज़ाम
जो कहा उसे तू इक वसीयत समझ मेरी
जिसे पूरा करना ही अब है तेरा काम
हंस यहां अपशकुन करे जंगल जले तमाम
हर पेड़ पे लिखना अल्लाह तू पात पात पे राम
अपने रूप सा सुंदर तू बनाना दुनिया सारी
हर जन को पहुंचाकर 'अमन का पैग़ाम'
आपकी आमद के लिए मैं आपका बेहद शुक्रगुज़ार हूँ ।
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जीवन में, यादों पर हम भी जी बैठे ...
बहुत खूब ... सच हैं इन यादों के सहारे पूरा जीवन बिताया जा सकता है ...
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जीवन में, यादों पर हम भी जी बैठे ...
खूबसूरत गज़ल वीना जी . मन को छू गई .
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
बहुत खूबसूरत विचार हैं। बधाई।
अच्छी रचना...वीना जी!
waah!!! lajwaab prastuti
सुन्दर शेरोँ से सजी बहुत ही लाजबाव गजल।
मन को मोह लेने वाली रचना के लिए आभार वन्दना जी।
सादर वन्दे वीणा जी ,
बहुत बढ़िया भावनात्मक रचना लिखी हे आपने
मान ब्लॉग पर पधारने के लिए धन्यवाद
http://jaishariram-man.blogspot.com/2010/12/blog-post_05.html
इश्क ईमान है इश्क अरमान है इश्क में हम सब बस इंसान हैं
इश्क में वीना ने जो सजदा किया ऐ खुदा हम तुझको भुला बैठे
ये इश्क बला ही ऐसी है
क्या करते??? जो हम भी इश्क से इश्क निभा बैठे...
बहुत खूब...
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
वादों के तसव्वुर में खोकर, यादों को सजाया है हमने
यादें ही तो हैं जीवन में, यादों पर हम भी जी बैठे
.
अच्छी ग़ज़ल
बहुत..सुन्दर..ख़यालात
"शुभ"
bahut khuub!
वाह! क्या बात है वीना जी :)
शुभकामनायें...
मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......
आपने खुद को खुदाई से बुलंद कर लिया फिर क्या चाहिए?
आदरणीय वीना जी,
आपका ब्लॉग बहुत पसंद आया है!
तारीफ के लिए शब्द नही है
मैं आपके ब्लाग को फालो कर रहा हूँ । आप भी कृपया मेरे ब्लाग "एक्टिवे लाइफ" को फालो करें. धन्यवाद...
वीनाजी नमस्कार,
आपने आकर मेरा ब्लाग नजरिया फालो किया उसके लिये आपका दिल से शुक्रिया । दिल से इसलिये भी कि यदि आप मेरे ब्लाग पर नहीं आतीं तो मैं आपकी शख्सियत से महरुम ही रहता । आपकी भाषा में लिखने की कोशिश कर रहा था वैसे उर्दू तो मुझे आती नहीं है । आपके ब्लाग की टिप्पणियां पढकर ही ये तो समझ में आ गया कि आप इस विधा की कितनी लोकप्रिय फनकार हैं । अपनी इस बेहतरीन फनकारी पर मेरी भी प्रशंसा कबूल करें । धन्यवाद...
वीनाजी,
दिलचस्प संयोग. आपके ब्लाग के 99 फालोअर्स की संख्या मुझसे जुडकर शतक में प्रवेश कर रही है । अतः इस अवसर पर मेरी शुभकामना है कि ये शतक भी जल्दी-जल्दी गुणात्मक दायरों को पार करते हुए आपकी लोकप्रियता में दिन-दूना रात चौगुना इजाफा करे
राजेंद्र जी, मोनिका जी,केवल राम जी, कुसुमेश जी, फिरदौस जी,प्रेम जी, आशीष जी, दीप जी मान जी,डा.जमाल,नासवा जी, निर्मला जी,देवेश जी,सवाई सिंह, रोशनी जी,आशीष जी, जितेंद्र जी,शेखर जी,देवेश जी, अशोक जी,मन जी, पूजा जी,मासूम जी आप सभी का यहां आने और मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद....इसी पोस्ट में एक सौ फॉलोवर भी हुए...बहुत-बहुत धन्यवाद...आप सबके प्यार व आशीर्वाद का। मुझे विश्वास है ये आगे भी बना रहेगा..
सुशील जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..मैं भी सोच रही थी कि एक सौवां फॉलोवर कौन-सा होगा...आपने जैसे मेरा उत्साह बढ़ाया उसके लिए धन्यवाद अदा करना मुश्किल है...बस आपका स्नेह, आशीर्वाद और दुआएं ही चाहिए...सौवां फॉलोवर बनने पर बहुत-बहुत धन्यवाद...
सुर्य दीप जी और अल्पना जी आपका भी बहुत-बहुत शुक्रिया...
veena ke veenaa ke suron ne to dil ke taar taar chhed diye..
bahut khoob likha hai veena ji...
ishq ko bayaan karne ka andaaz to wakai mein kaabile taarif hai....
मैं ब्लॉगर पर नया हूँ लेकिन थोडा बहुत लिखने की गुस्ताखी कर लेता हूँ प्लीज आप मेरे ब्लोग्स पर अपनी नज़रों का करम करें और मेरे लिखे हुए साधारण से कुछ पोस्ट्स पर अपने कमेंट्स भी जरूर दें और मुझे आगे भी लिखते रहने के लिए प्रेरित करें. मेरे ब्लोग्स का यूआरएल है:-
samratonlyfor.blogspot.com और
reportergovind.blogspot.com
nice poem,
lovely blog.
वीणा जी आप का मै आभारी हों की आप ने हमारी गलती दिखाई है,मुझे आशा है की मै ऐसे ही आप की अनुग्रह का पात्र बना रहोंगा
बहुत - बहुत धन्यवाद
बेहतरीन प्रस्तुति -आभार ।
बहुत भावपूर्ण गज़ल.हरेक शेर लाज़वाब..आभार
veena ji bahut bahut shukriya aapka ki aapne apne comment meri posts par rakhe,
aur jo word aapne bataya "dabochna" uske liye bura nahin maana balki main to aapka aabhari hoon jo aapne meri galti batai.
dhanywaad.
i hope ki aap mera blog padhti rahengi aur mujhe prerit karti raheingi.
aap mere blog ko follow b kar sakti hai taaaki jab b main koi nayi post daalu to aapko pta chal jaaye aur aap us par comment kar ke mujhe kritarth karein.
dhanywaad
शानदार गज़ल!!
अभिव्यक्ति का अनूठा प्रयोग!
शम्मा ही चली खुद जलने को, परवाने को तोहमत क्यूं दें हम
गुस्ताखी करी खुद शम्मा ने, परवाने को क्यूं तरसा बैठे
waah !!
खूबसूरत गज़ल
बहुत ही सुन्दर रचना.....
veena ke sajde se pata chala isq kya bala hai:)
bahut khub mam!!!!
aapka ye blog maine kbhi dekha hi nhi....ab barabar aana parega!:)
सुज्ञ जी, दानिश जी, गोविंद जी,मुकेश जी, लोकेंद्र जी, रचना जी, दिव्या जी, दीप जी आप सबका बहुत-बहुत आभार.....
बेहतरीन!
veena ji...namste...
bahut hi achchi gazal padhne ko mili..kaphi achcha laga...
...again thanks to you.
bhut hoob hai aapka andajebya .
प्रेमरस में पगी शानदार रचना।
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आपका सुनहरा भविष्यफल, सिर्फ आपके लिए।
खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में आप क्या जानते हैं?
good ...
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