मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

हताशा ........वीना

कितना हताश था
वह ऑटो चालक
टूटा-सा, बिखरा-सा
पैसे कमाने की धुन में
भूल गया था भूख
भूखा पेट, वीरान आंखें
अनर्थ की आशंका
सुबह से 
इकट्ठा कर रहा था
रुपये
खुद मंजिल से दूर
पहुंचा रहा था दूसरों को
उनकी मंजिलों तक
गिड़गिड़ाया बहुतों के आगे
डॉक्टरों से भी मिन्नत की
मौत को हर पल 
देख रहा था पास आते
अपनी गुमसुम आंखों से
उसे नहीं मिल पा रहा था खून
अपने बेटे के लिए
जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत

75 टिप्‍पणियां:

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

"...जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत"

आज के समाज की सच्ची और वास्तविक तस्वीर उकेरी है इस कविता में.

सादर

babanpandey ने कहा…

गरीबी ka स्पस्ट chitrn

संजय भास्‍कर ने कहा…

गरीबी बहुत ही बुरी होती है ...आज के समाज में गरीबी की सच्ची तस्वीर

संजय भास्‍कर ने कहा…

आज के समय में इंसानियत तो बिलकुल मर चुकी है

कविता रावत ने कहा…

देख रहा था पास आते
अपनी गुमसुम आंखों से
उसे नहीं मिल पा रहा था खून
अपने बेटे के लिए
जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत

..... इंसानियत का ऐसा विद्रूप चेहरा देख एक गहरी आह निकल कर सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ऐसे इंसान भी इंसान कहलाने योग्य हैं?
..गहरी संवेदना से भरी मर्मस्पर्शी रचना के लिए आभार

एस एम् मासूम ने कहा…

खुद मंजिल से दूर
पहुंचा रहा था दूसरों को
उनकी मंजिलों तक
.
बहुत अच्छे अंदाज़ मैं पेश किया है और एक ऐसी हकीकत जिसे सब जानते हैं लेकिन मुह मोड़ लेते हैं.

Rajendra Tiwari ने कहा…

उसके पास पैसे नहीं थे
और लोगों के पास इंसानियत
....समाज का सजीव चित्र...

बेनामी ने कहा…

.जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत"

बहुत ही ह्रदयस्पर्शी। दिल को छू गई। इंसानियत कहां है आज लोगों में

vijay ने कहा…

कुछ कहने लायक नहीं हू। बहुत मर्म स्पर्शी रचना।

vijay ने कहा…

आपको सादर अभिवादन इस अति सुंदर और दिल को छूने वाली रचना के लिए
रोक नही सका दोबारा आने के लिए पर सही मैं बहुत ही अच्छी, कोई शब्द नही आभार

बेनामी ने कहा…

मौत को हर पल
देख रहा था पास आते
अपनी गुमसुम आंखों से
उसे नहीं मिल पा रहा था खून
अपने बेटे के लिए
जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत
क्या कहूं विजय जी की बात से सहमत शब्द नहीं हैं कुछ भी कहने को। बहुत गहराई लिए शब्द

बेनामी ने कहा…

मौत को हर पल
देख रहा था पास आते
अपनी गुमसुम आंखों से
उसे नहीं मिल पा रहा था खून
अपने बेटे के लिए
जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत
क्या कहूं विजय जी की बात से सहमत शब्द नहीं हैं कुछ भी कहने को। बहुत गहराई लिए शब्द

aastha ने कहा…

जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत

आज की इंसानियत का यह नंगा सच है। सिगरेट में पान में रुपये ज़ाया कर सकते हैं मगर किसी की मदद करने के लिए कोई हाथ आगे नहीं बढ़ाता। क्या यह सच्चा किस्सा हैं।

लोकेन्द्र सिंह ने कहा…

बहुत ही संवेदनशील रचना..........

अनुपमा पाठक ने कहा…

इंसानियत का लोप अत्यंत दुखद है...
करुण कथा को निरुपित करती कविता!

shalusri ने कहा…

वीना दी दिल को अंदर तक छू गई। मैं भी जानना चाहूंगी क्या वाकई में यह किसी का सच है

radha ने कहा…

बहुत ही संवेदना शील और इंसानियत दुखद पहलू

Rajiv ने कहा…

"उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत"
वीणा जी आपने तो भावुक होने पर मजबूर कर दिया.
मैंने अपनी नज़रों के सामने ऐसी घटना देखी है.अतः उस ड्राईवर के दर्द को समझ सकता हूँ और चूंकि २० वर्षों से दिल्ली में हूँ तो शहरों और महानगरों की हृदयहीनता भी करीब से देखी है.यह आज आम जीवन का बड़ा ही घिनौना रूप हमारे सामने है .होने यह लगा है कि अपने पर पड़े तभी लोगों को दर्द का अहसास होता है.बहुत ही संवेदनापूर्ण तरीके से कही बात .ऐसी रचनाएँ ही मन को झकझोरती है.मार्मिक प्रस्तुति के लिए बधाई.

Rajiv ने कहा…

"उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत"
वीणा जी आपने तो भावुक होने पर मजबूर कर दिया.
मैंने अपनी नज़रों के सामने ऐसी घटना देखी है.अतः उस ड्राईवर के दर्द को समझ सकता हूँ और चूंकि २० वर्षों से दिल्ली में हूँ तो शहरों और महानगरों की हृदयहीनता भी करीब से देखी है.यह आज आम जीवन का बड़ा ही घिनौना रूप हमारे सामने है .होने यह लगा है कि अपने पर पड़े तभी लोगों को दर्द का अहसास होता है.बहुत ही संवेदनापूर्ण तरीके से कही बात .ऐसी रचनाएँ ही मन को झकझोरती है.मार्मिक प्रस्तुति के लिए बधाई.

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

यशवंत जी,बबन जी,संजय जी,कविता जी, मासूम जी,राजेंद्र जी, पूजा जी, विजय जी,शान जी, लोकेंद्र जी, ऱाधा जी आप सबका इस ह्रदयस्पर्शी रचना को पसंद करने के लिए धन्यवाद...और सच में यह किसी का सच है...

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

आस्था जी, शालू जी,
यह सच है। करीब दस साल पहले की बात है...मैं दिल्ली में थी किसी काम से आईटीओ जाना था। जिस ऑटो वाले से पूछा उसने पटपड़गंज सें 80 रुपये बताए...ये ऑटो वाला कुछ खा रहा था मैने पूछा चलोगे। उसने कहा हां दीदीजी अभी कुछ खा लूं सुबह से कुछ नहीं खाया। मैने कहा ठीक है खा लो। फिर पूछा कितने पैसे लोगे..उसने कहा जो भी दे दीजिएगा मेरे लिए तो एक-एक पैसा कीमती है। फिर रास्ते में बताया कि मेरे बेटे को ब्लड कैंसर है। वह 9वीं क्लॉस में पढ़ता है। मैं जानता हूं वह बचेगा नहीं क्योंकि कब तक मैं खून चढ़वाऊंगा पर औलाद है जब तक हो सकेगा कोशिश करूंगा..वह पढ़ने में बहुत अच्छा है उसे पढ़ाना चाहता था। मगर अब तो उसकी जिंदगी कुछ समय की मेहमान है। वह खून चढ़वाने के लिए ऑटो चलाकर रुपये इकट्ठे कर रहा था। मुझे बहुत दुख हुआ..लगा कैसे यह अपने इतने बड़े बच्चे की अर्थी को कंधा देगा फिर भी हिम्मत नहीं हार रहा है जब तक हो सकेगा उसको बचाएगा...उसे तीन बोतल खून के लिए पैसा इकट्ठा करना था। उसने डा. के प्रिसक्रिप्शन भी दिखाए। उसने बताया कि वह डा. के आगे गिड़गिड़ाया और आस-पास के लोगों से मदद मांगी मगर कोई तैयार नही हुआ तो सुबह से ऑटो चला रहा हूं। खाने की किसे फिकर रुपये जो इकट्ठे करने है। मेरे पास रुपये थे मैने उसे दिए और कहा कि सीधे अस्पताल जाओ और अपने बेटे को खून चढ़वाओ...और वो जो उस समय रोया था मैं आज भी सिहर जाती हूं। न जाने कितनी दुआएं दे डालीं उसने मुझे...और मुझे भी रोना आ गया था। मैं बहुत बार अनहोनी से बची हूं शायद उन्हीं दुआओं को असर है। यह एक सच है जो कविता के रूप में रचा गया और मेरे पहले संग्रह में प्रकाशित भी हुआ....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितनों को उनकी मंजिल पहुँचाकर, अपनी मंजिल ढूढ़ रहा है।

ishwar khandeliya ने कहा…

क्या कहा जाये वीणा जी कम होती संवेदनाएं हम सभी झेल रहे हैं जब हमारे आज के समाज में ख़ून का भी व्यवसाय हो रहा है तो ऐसी स्थितियां तो समाज को झेलनी ही होगी
अत्यंत ही मार्मिक प्रस्तुति दिमाग को झकझोर देने के लिए काफी है यदि हममें संवेदनशीलता बाकी हो
उम्दा प्रस्तुति के लिए बधाई

daksha ने कहा…

auto wale kaa dard samjhane or use is tarah likhne, ki log bhi us samjh paye... iske liye apko badhai.

Sushil Bakliwal ने कहा…

बेहद मार्मिक, आपके संस्मरण सहित...

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पैसा जब जान से अधिक कीमती बन जाये
तो पैसेवाला जीवित होकर भी मर जाता है

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपने समाज की अच्छी तस्वीर पेश की है। नववर्ष की अशेष शुभकामनाएं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत मार्मिक चित्रण ....इंसानियत की सही तस्वीर पेश कि है ..आज है ही नहीं कहीं

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

वीणा जी!
आपका व्यक्तिगत अनुभव इस कविता में समाहित है... इसलिये सिर्फ उसऑटो चालक के संदर्भ में देख रहा हूँ... वर्ना यह व्यथा किसी भी श्रमजीवि की हो सकती है... सिर्फ बीमारी ही क्यूँ, यदि वह अपने बच्चे को अपने से बेहतर जीवन जीने के लिए शिक्षा भी देना चाहे तो नहीं कर सकता...वेदना भरी है,इस कविता में..
.
किंतु दिल्ली के लिये यह अपवाद ही है. वर्ना ऑटो वालों की अकड़, मनमाना पैसा माँगना, मीटर के बिना चलने की ज़िद करना, नहीं तो मना कर देना आम बात है..

Amit Chandra ने कहा…

वीणा जी पैसा और इंसानियत दोनो एक दूसरे के शत्रु है। बहुत कम देखने को मिलता है कि पैसा और इंसानियत एक छत के नीचे नजर आ जाए। सुन्दर रचना। आभार।

मनोज कुमार ने कहा…

उसे नहीं मिल पा रहा था खून
अपने बेटे के लिए
जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत
मार्मिक अभिव्यक्ति।

Unknown ने कहा…

...karuna daya udarta manviye gun hen har manav me hone chahiye hote bhi hen par aajkal asli aur banawti me fark karna bhi mushkil ho jata he hai isleye log shayd samvedanheen ho jaate hen...gandhiji ka bhajan yad aata hai-vaishnav jan to tene re kahie je peer parai jaane re..,par aisi madad jo tatkalik jarurat ke sath sath kisi ko dukh kasht garibi abhaav ki jindagi ke mool karan ko mool karan ko bhi samampt karne ka gyan de vahi vastvik aur poorn madad hai...ye sansar karmo ka vichitra khel hai ..yani shresth karmo ka sahi gyan sadakal ki isthyi madad hai. Ye sachha upkar hai. Good xperince thanx 4 shard wid us veena ji- Manoj 'khushnuma' from Noida.

अभिषेक मिश्र ने कहा…

झाड़खंड में ऐसी ही एक घटना से जुडी खबर भी हाल में ही पढ़ी थी. काफी संवेदनशील कविता है आपकी.

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

veena ji .......bahut hi hridayasparsi rachna..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

प्रिय वीणा जी
नमस्कार !
यह कविता एक ऑटो चालक की ही नहीं …
बहुत मार्मिक कविता है ।

मुझे मेरी एक रचना स्मरण हो आई -
जीते जी तो यहां पॅ होंगी कड़वी ही अनुभूतियां !
मरते ही चेंटेंगी लाश से लाख सहानुभूतियां !!


बहरहाल , अच्छा लिखा है आपने । और भी उत्कृष्ट लेखन के लिए शुभकामनाएं हैं !

~*~नव वर्ष २०११ के लिए हार्दिक मंगलकामनाएं !~*~

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Sadhana Vaid ने कहा…

एक नर्मम और क्रूर यथार्थ की बहुत जीवंत तस्वीर खींची है वीणाजी आपने अपनी रचना में ! आपका संस्मरण पढ़ कर मैं भी काँप गयी ! बहुत मार्मिक एवं संवेदनशील रचना ! बहुत ही सुन्दर !

बेनामी ने कहा…

वीणा जी,

बहुत ही ह्रदयस्पर्शी और मार्मिक पोस्ट है......संस्मरण रूपी पोस्ट बहुत शानदार लगी...........आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें|

सदा ने कहा…

बहुत ही गहन भावों के साथ ...मार्मिक शब्‍द रचना ।
आइए एक नजर यहां पर भी डालें ...
http://urvija.parikalpnaa.com/2010/12/blog-post_29.html

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'uske pas rupye nahi the
logon ke pas insaniyat'
roj-ba-roj gareeb ki jindagi ke sath ghatit hone wali ghatna ka jeewant chitran.

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

राजीव जी, प्रवीण जीष ईश्वर जी,दक्षा जी, सुशील जी, रश्मि जी, सलिल जी,एहसास जी, मनोज जी, अभिषेक जी, उपेन जी, राजेंद्र जी, साधना जी, इमरान जी, सदा जी, सुरेंद्र जी आप सभी का दिल से आभार.....उम्मीद है यद प्यार बना रहेगा....

संध्या शर्मा ने कहा…

Sach hai Veenaji insaniyat to jaise kahin kho gai hai......

Kailash Sharma ने कहा…

उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत

आज इंसानियत रही कहाँ है? बहुत मार्मिक प्रस्तुति.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

is se badi baat kya hogi jo khud apni manzil talaash raha hai vo dusron ko manzil tak pahuncha raha hai...aur apni manzil ke liye dusro ki kripa drishti par aashrit.

maarmik rachna.

Rohit Singh ने कहा…

क्या करें.....ऐसी घटनाओं से अक्सर दो चार होना पड़ता है। हताशा होती है, पर बैठने से काम नहीं चलेगा। कुछ न कुछ करते रहना होगा। जाहिर है जो कर सकते हैं वो करें हम। बेहतर होगा। पर देश औऱ प्रशासन में बैठे लोग जो इस दशा को काफी हद तक सुधार सकते हैं वो निक्कमे होकर बैठे हैं तो आम जन तो हताश निराश तो होगा ही। ये ही आज के हिंदुस्तान का सच है। दुनिया को कभी रोशनी देने वाले देश के लोग आज खुद ही अंधेरे में डूबे हुए हैं। जब तक इसका उत्थान नहीं होगा दुनिया का भी नहीं होगा।

Rohit Singh ने कहा…

आपकी टिप्पणी बाद में पढ़ी। एक सच कविता में सामने आया। खुद में सच पढ़कर आज सिहर गया जाने क्यूं। इसलिए शायद हमारे पूर्वजों ने संयम और धैर्य का पाठ पढ़या था हमें। पर उसे हम भूल चुके हैं। संयम औऱ धीरता अगर सब खो देंगे तो इसके हल के लिए कौन करेगा। विचारणीय प्रश्न ये है। मैं अपने हर लेख में, हर बात में यही कहता हूं, करने की कोशिश करता हूं। पर दुख होता है जब एक बड़े प्रयास में कम लोगो को जुड़ा पाता हूं।

Bharat Bhushan ने कहा…

ग़रीबी की मंज़िल कहाँ होती है यह आपकी कविता ने कहा है.

mark rai ने कहा…

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं....

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

As we move towards a brand NEW START in 2011.

Wishing you & your family a very Happy & Prosperous New Year.
May the year ahead be filled Good Health, Happiness and Peace !!!

Pradeep ने कहा…

वीणा जी प्रणाम !
नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये ....
आपकी पिछली कविता ने आशा और प्रेरणा दी......और इस रचना ने सीख......बहुत धन्यवाद....आप यु ही लिखती रहें यही कामना है.....

एस एम् मासूम ने कहा…

नववर्ष आपके लिए भी मंगलमय हो और जीवन में सुख सम्रद्धि ले कर आ

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

आप को सपरिवार नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं .

संजय भास्‍कर ने कहा…

आपको नव वर्ष की सादर शुभकामनाएं.

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

"...जिसे था कैंसर
उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत"

roti hui insaniyat ko aapne aaina dikha diya....:)
aapki lekhan ko salam!

vav varsh ki subh kamnayen!

samajh nhi pa raha kaise itne dino tak iss blog pe aa nhi paya!

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

Happy and prosperous New Year 2011 to you and all of Your family.

Arvind Mishra ने कहा…

यही तो है मानव जीवन की विडम्बना और विपर्यय !

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

नूतन वर्ष २०११ की हार्दिक शुभकामनाएं .

Creative Manch ने कहा…

मार्मिक और संवेदना से भरी सुन्दर रचना
समाज का यथार्थ चित्रण किया है
आभार

नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएँ.


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'सी.एम.ऑडियो क्विज़'
हर रविवार प्रातः 10 बजे
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Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ! असा लगा कि यह रचना कहीं सच्चाई से जुडी हुई है ...

आपको नए साल की शुभकामनायें !

Alpana Verma ने कहा…

ह्रदयस्पर्शी रचना !

आपको और आपके परिवार को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

Mukesh ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

namskar veena ji...
jud gaya hoon aapse...
aata rahunga ab...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इंसानियत मर गयी है ... बहुत ही संवेदनशील लिखा है ...
...

Amit K Sagar ने कहा…

दर्द की इक़ मुकम्मल तस्वीर, बेहद मर्म स्पर्शी रचना.
-
सपरिवार आपको नव वर्ष की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं.
नव वर्ष २०११ और एक प्रार्थना

ashish ने कहा…

इंसानियत को पैसे से तौलते है लोग. समाज की विद्रूपता पर पड़ा आवरण हटाया आपने . उम्दा रचना .

Satish Saxena ने कहा…

दिल को छू जाने वाली रचना ...सोंचने को मजबूर करती ! हार्दिक शुभकामनायें !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

उसके पास रुपये नहीं थे
लोगों के पास इंसानियत
..मार्मिक अभिव्यक्ति।

Dimple Maheshwari ने कहा…

जय श्री कृष्ण...आप बहुत अच्छा लिखतें हैं...वाकई.... आशा हैं आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....!!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

अच्छी और सच्ची अभिव्यक्ति.....

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

आदरणीया वीना जी,
आप को सपरिवार मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं.

सादर
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ओ! हवा की लहरों

Rajendra Tiwari ने कहा…

कुछ नया पोस्ट करिए...

mridula pradhan ने कहा…

kitna dard hai aapke lekhan men.

Kumar Vivek ने कहा…

very nice poem .. but sabse acchi apki last line thi.

बेनामी ने कहा…

http://dharmguru.blogspot.com/2011/01/blog-post.html
मेरी मानो समृद्धी दरिद्रता से कहीं बेहतर है

opsah ने कहा…

hriday ko chu dene wali kavita ke liye apka bahut bahut dhanyavad

opsah ने कहा…

bahut badhiya hriday ko chu dene wali avam yatharth ko charitrik karne wali kavita hai