शनिवार, 15 जनवरी 2011

कुछ ब्लॉगरों के तरीके........वीना

आज मैं कोई रचना नहीं पोस्ट कर रही हूं बल्कि  इस ब्लॉग जगत को लेकर कुछ और विचार आपसे बांटना चाहती हूं...। हालांकि मैंने काफी पहले ब्लॉग बनाया था और बनाकर कुछ खास पोस्ट नहीं किया....मगर पांच-छ: महीने पहले ही सक्रिय हुई हूं...यानि दोबारा ब्लॉग जगत से जुड़ी हूं...मुझे कुछ बहुत अच्छे दोस्त मिले, कुछ रिश्ते मिले....प्यार मिला, अपनापन मिला और परेशानी में जिस तरह सबने साथ दिया उसे मैं कभी न भूल पाऊंगी, न ही उसका एहसान चुका पाऊंगी....मगर मेरी कुछ लोगों से शिकायत है। नाम लेकर मैं न उन्हें शर्मिंदगी देना चाहती और न खुद ही उनके स्तर पर जाना चाहती ....यह उनका तरीका भी हो सकता है....मगर मैं क्या ऐसे कई लोगों से मेरी बात हुई है जिन्होने इस तरीकों को गलत ठहराया है। जब मैं दोबारा सक्रिय हुई तो तमाम लोगों ने रचनाओं पर टिप्पणी की....कुछ लोगों की टिप्पणी बार-बार आई और तब तक आती रहीं जब तक मैं उनके ब्लाग की फॉलोअर नहीं बन गई और जब मैने ब्लॉग फॉलो कर लिया तो रचनाएं देखनी ही बंद कर दी, इधर से रुख ही मोड़ लिया। मैने तो उन ब्लॉग पर जाकर कहा भी मगर ढाक के तीन पात.....उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। मैं चाहती तो कुछ उनके ब्लॉग पर कुछ टीका-टिप्पणी कर सकती थी या उस ब्लॉग से अलग भी हो सकती थी मगर मैं उस स्तर पर नहीं जाना चाहती। मेरी अपनी जगह है, पहचान है...जो रहनी ही चाहिए और हमने तो रचनाएं देखी थीं किसी व्यक्ति विशेष को नहीं। इसलिए ब्लॉग फॉलो किया था... इसमें रचनाओं का क्या दोष...अच्छे लेखन की तारीफ होनी ही चाहिए... किसी व्यक्ति विशेष से मतलब नहीं था लेकिन आज इतना जरूर कहूंगी कि अगर आपमें से किसी को भी किसी व्यक्ति की रचना पसंद आती है तो उस ब्लॉग को जरूर फॉलो करिए। इससे न केवल उत्साह बढ़ता है ..हो सकता है आप किसी के बहुत अच्छे मित्र बन जाएं ..कोई आपका मित्र बन जाए या अंजाने ही सही आपकी प्रेरणा उसमें नया उत्साह-नई उमंग भर दे...आप कहीं उसकी मरती आशाओं को जीवन दे दें.....और अपने फॉलोअर को आप भी न भूलें....अगर आपके ब्लॉग पर आकर कोई अपनी राय देता है तो आपका भी फर्ज बनता है कि आप भी अपनी राय उनकी रचनाओं पर जरूर दें...और पसंद आने पर फॉलो जरूर करें, फॉलोअर की बढ़ती संख्या एक अलग तरह का आत्म विश्वास देती है........ इससे आप रचना का सम्मान करेंगे और रचनाकार को इस सम्मान के अलावा क्या चाहिए.......कम से कम यह मत करिए कि तब तक जाकर उस ब्लॉग पर टिप्पणी करिए जब तक वह आपको फॉलो न  कर ले और जब फॉलो कर ले तो आप उस ब्लॉग को ही भूल जाएं । मेरा कहने का आशय यह है कि इतने मतलबी न बनें... राय देने से दूसरे का हौसला बढ़ता है और मन को भाता भी है....


पिछले सप्ताह वायरल की वजह से ज्यादा समय नहीं दे पाई और कल एक सप्ताह के लिए बाहर जा रही हूं वापस आकर सबके ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराऊंगी....तब तक नमस्कार...ईश्वर आप सबको खुश रखे...

62 टिप्पणियाँ:

shaan ने कहा…

ठीक कहा है वीना जी। इसलिए हम सिर्फ राय देते हैं खुद ब्लॉग बनाया ही नहीं। ये तरीका सच में तकलीफदेह है और किसी को बेवकूफ बनाने जैसा है। आपने ठीक मुद्दा उठाया है। मैं सहमत हूं।

यशवन्त माथुर ने कहा…

आदरणीया वीना जी,
इस लेख में व्यक्त आपकी एक एक बात से अक्षरशः सहमत हूँ.

सादर

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अधिक पढ़ने से कुछ परहेज न हो किसी को, टिप्पणी भी दें। लाभ ही होगा किसी न किसी का।

amrendra "aks" ने कहा…

Veena ji bilkul sahi kaha hai aapne

राजेंद्र तिवारी ने कहा…

very true.

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

वीना जी आपके कथन से पुर्णतः सहमत. जो भी बातें आप कहीं है वह गौर करने लायक है. ....हमें अपने साथी ब्लोगर का हौसला बढ़ाना चाहिए.....

Dr. Ashok palmist blog ने कहा…

वीना जी आप सही कह रही है । मतलबी नहीँ बनना चाहिए । सभी ब्लोगर आपस मेँ एक परिवार की तरह है और परिवार मेँ इस तरह का व्यवहार अच्छा नहीँ होता ।

puja ने कहा…

वीना दी एकदम थीक कहा है आपने। मैं सहमत हूं।

shalusri ने कहा…

आपका कथन सत्य है। बड़े-बड़े नाम ही ऐसा करते हैं जो नए ब्लॉगरों को बार-बार टिप्पणी करके अपना ब्लॉग फॉलो करने के लिए प्रेशर डालते हैं।
अच्छा वीना दी आपको बुखार हो गया। याद है आप कहती थी कि आपको माइग्रेन है सिर अक्सर दुखता है और एक्सीडेंट होते रहते हैं पर बुखार कभी नहीं हुआ चलिए अब आप यह कभी नही कहेंगी कि आपको बुखार कभी नहीं हुआ। इसी की कमी थी वर्ना आपको कितनी चोट लगती हैं। बाप रे।

बी एस पाबला ने कहा…

सही बात।
उत्साहवर्धन भी आवश्यक है

aastha ने कहा…

सबकी तरह मैं भी सहमत हूं। सही कहा है आपने। और नए ब्लागरों को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है

vijay ने कहा…

very true

puja ने कहा…

ekdam theek kahaa aapne....

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Aisa hai kya Veena jee!! hamne kabhi iss tarah se socha hi nahi...ye sahi hai ki followers ki sankhya badhti dekh khushi milti hai......lekin ye bhi sahi hai..!!

waise kuchh to sahi aap bhi ho:)

oh. viral tha aapko, ab to fit ho na...happy journey..

एस.एम.मासूम ने कहा…

एक अच्छी और इमानदार पोस्ट . वीणा जी मैं follower बन गया आपका. क्योंकि मैं यहाँ बार बार आना चाहूँगा..

sada ने कहा…

बहुत ही सही एवं सटीक बात कही है आपने इस आलेख में ...।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत सही कहा आपने...फोलोअर बनाने के लिए इतना स्वार्थी नहीं होना चाहिए..आभार

ehsas ने कहा…

आपकी बातों से मै पुर्णतः सहमत हुॅ। दुख तो तब होता है जब आपकी सृजनात्मकता पर दो चार टिप्पणी होती है और बकवास से पोस्ट पर ऑकड़ा सौ को पार कर जाता है।

Vijai Mathur ने कहा…

सबसे पहले आप लोगों की यात्रा के लिए मंगल कामनाएं प्रेषित करता हूँ.
पहले हेमांग फिर आप अस्वस्थ रहीं ,कृपया स्तुतियों का सहारा भी ले लिया करें,शीघ्र लाभ होता है.
आपकी वेदना सही है वैसा करने वाले को करना नहीं चाहिए था.आपको नाम बता देना चाहिए था जिससे लोग उसका बहिष्कार कर सकते क्योंकि यह कृत्य निंदनीय है.
फिर भी आपसे अनुरोध है कि,इस-उस तरह की गतिविधियों का ध्यान दिए बगैर अपनी रचनाएँ लगातार देती रहें.किसी की सराहना या विरोध से क्या फर्क पड़ता है?मैं खुद तो ऐसा ही करता हूँ.
आप सब के एवं आपके ब्लाग की सफलता की कामना करते हुए सब को मकर संक्रांति की मुबारकवाद देता हूँ.

इमरान अंसारी ने कहा…

वीणा जी,

आपकी बातों से पूर्णतया सहमत हूँ....मैंने खुद अपने ब्लॉग मुंशी प्रेमचनद की पहली पोस्ट में ये अपील की थी की 'कृपया रचनाओं को पढ़ें, न की रचनाकार पर आकर्षित हो' ....जहाँ तक संभव हो सकता है मैं अपने द्वारा फौलो किये हर ब्लॉग पर जाता हूँ......और अपनी निष्पक्ष राय देने की कोशिश करता हूँ.......

रश्मि प्रभा... ने कहा…

hmmmmm, hota hai yahi , per anusaran karen ya n karen , jinki rachnaaon me dam hai, use padhte zarur hain

girish pankaj ने कहा…

bilkul..supaatron kao protsahit kiyaa hi janaa chahiye.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

"कम से कम यह मत करिए कि तब तक जाकर उस ब्लॉग पर टिप्पणी करिए जब तक वह आपको फॉलो न कर ले और जब फॉलो कर ले तो आप उस ब्लॉग को ही भूल जाएं"

बिलकुल सही कहा आपने वीणा जी...अगर कोई ऐसा करता है तो गलत है...और अगर मैंने ऐसा किया है तो मैं भी इस भूल के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ...

नीरज

सुशील बाकलीवाल ने कहा…

जो आपकी शिकायत है वही मेरा भी भोगा हुआ अनुभव है, और वाकई ये मानसिक रुप से बहुत पीडादायक है ।

Rajiv ने कहा…

वीणा जी हम जैसे लोग इस दर्द को बखूबी समझ सकते है.मैं आपकी इस बात से पूर्ण सहमत हूँ कि अंजाने ही सही आपकी प्रेरणा उसमें नया उत्साह-नई उमंग भर दे...आप कहीं उसकी मरती आशाओं को जीवन दे दें.....और अपने फॉलोअर को आप भी न भूलें....अगर आपके ब्लॉग पर आकर कोई अपनी राय देता है तो आपका भी फर्ज बनता है कि आप भी अपनी राय उनकी रचनाओं पर जरूर दें...और पसंद आने पर फॉलो जरूर करें, फॉलोअर की बढ़ती संख्या एक अलग तरह का आत्म विश्वास देती है...." बिलकुल दिल कि बात कह ड़ी आपने..अपने विचार को ईमानदारी से प्रकट करने के लिए बहुत-बहुत बधाई.आपकी बातन ने हमारे मनोबल को एक सहारा दिया है.

Rajiv ने कहा…

वीणा जी आप जल्द-से-जल्द स्वस्थ होकर ब्लॉग पर आयें यही हमारी कामना है..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीया वीणा जी
सस्नेहाभिवादन !

आपका कहना सही है … लेकिन आप इसे इतना दिल पर मत लें । आपको जिसका जैसा व्यवहार ध्यान में आ गया , उसके साथ वैसा ही करें ।
… और आपकी रचनाएं न पढ़ने वाला श्रेष्ठ लेखन से ही वंचित रहेगा , यह तो तय है ही ।

नई पोस्ट की सूचना मेल से अवश्य भेजा करें मुझे हमेशा आपकी नई पोस्ट की सूचना मेल का इंतज़ार रहेगा ।

एकदम सतही लिखने वालों को भी जहां तक हो मैं कमेंट के लिए निराश नहीं करता । आप तो लिखती भी बहुत अच्छा हैं ।

… और,
# मेरा सबसे कहना है कि अच्छा-बुरा भी क्या होता है … हम यहां प्यार बांटने के लिए हैं , न कि किसी का मन दुखाने के लिए ।

>~*~मकरसंक्रांति की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !~*~

शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

… और हां , मेरी समस्या तो जगजाहिर है, कई ब्लॉग्स पर फॉलोअर बना हुआ होने के बावजूद मेरी तस्वीर वहां से गायब हो चुकी है , दुबारा बन भी नहीं पा रहा हूं आपके यहां भी फिर से फॉलोअर बनने की कोशिश करने पर यही लिखा मिल रहा है -

We're sorry, the site owner has blocked you from joining this site.
:) मैं जानता हूं , आप मुझे अवरुद्ध थोड़े ही करेंगी !
कोई मेरी इस समस्या का निदान कर पाए तो … इनाम तो नहीं अच्छी रचनाएं देते रहने का वादा रहा … :)
- राजेन्द्र स्वर्णकार

अल्पना वर्मा ने कहा…

हर लेखक अपने लिखे पर प्रतिक्रिया की आशा करता है ,उत्साहवर्धन भी आवश्यक है.
बहुत से अच्छा लिखने वालों ने अपने यहाँ शायद इसीलिये टिप्पणी के रस्ते बंद कर दिए हैं.
आप जल्द स्वस्थ हो जाएँ और नियमित लिखती रहें .

मनोज कुमार ने कहा…

आपसे असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं है। बहुत खड़ी-खड़ी और सच्ची बात आपने कही है कि “कुछ लोगों की टिप्पणी बार-बार आई और तब तक आती रहीं जब तक मैं उनके ब्लाग की फॉलोअर नहीं बन गई और जब मैने ब्लॉग फॉलो कर लिया तो रचनाएं देखनी ही बंद कर दी, इधर से रुख ही मोड़ लिया।” बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (दूसरा भाग)

वीना ने कहा…

शान जी, यशवंत जी,प्रवीण जी, अमरेंद्र जी, राजेंद्र जी,उपेंद्र जी, डा. अशोक जी, पूजा जी, शालू जी,पाबला जी, आस्था जी,विजय जी, पूजा, आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद

वीना ने कहा…

मुकेश जी, मासूमं जी, सदा जी,कैलाश जी, विजय जी, इमरान जी,एहसास जी,रश्मि जी,गिरीश जी, मुकेश जी, मासूम जी,नीरज जी, सुशील जी आप सबका बहुत-बहुत आभार....दिल से आभार

वीना ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
वीना ने कहा…

राजीव जी, राजेंद्र जी,अल्पना जी,मनोज जी आप सबका उत्साह बढ़ाने के लिए दिल से शुक्रिया....

आप सभी के द्वारा जो उत्साह बढ़ता है उसका कोई मोल नहीं है। हम जो लिखते हैं उसे तमाम लोग पढ़े फिर अपनी राय व्यक्त करें इससे बड़ा ईनाम क्या हो सकता है।
हम किसी को क्या दे सकते हैं सिर्फ यही कि मीठे दो शब्द....हो सकता है आपका उत्साह वर्धन किसी को और भी अच्छा रचनाकार बना दे....कोई सीख कर नहीं आता, न ही यह सीखने वाली विद्या है मगर उत्साह जरूर वह दवाई है जो किसी को उम्मीद दे सकती है....बार-बार लिखने पर कुछ तो अच्छा निकलेगा और दुनियादारी की फालतू बातों से तो अच्छा है कि कुछ सकारात्मक कार्य किया जाए।
हम सब एक-दूसरे को नहीं जानते लेकिन इतना जरूर है कि कहीं मिल जाएं तो बहुत अपनापन-सा लगेगा। मुझे अपने सभी मित्रों का पूरा सहयोग मिला। चाहे मेरी तबियत खराब हो, मेरे बेटे का ऑपरेशन रहा हो, मां की फिजियोथेरेपी, कुछ भी अगर मैने आपसे अपना दुख बांटा तो आप सबने कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया और मैने भी अपने अन्य मित्रों के साथ यही किया...मुझे तो यह एक परिवार लगता है...जहां इतने अच्छे लोग मिले वहीं कुछ उस तरह के लोग भी मिले। मैं नाम लेकर उन्हें शर्मिंदगी नहीं देना चाहती। यह मेरे संस्कार नहीं हैं ...उन्हें पता भी नहीं लगेगा शायद कभी भूले-भटके इधर आए तो जरूर पढ़ सकेंगे और निश्चित रूप से समझेंगे...बहिष्कार करना कोई रास्ता नहीं है मगर यह तरीका मुझे बहुत खराब लगा था इसलिए सोचा आपसे बांटूं। फिर कुछ लोगों से बात हुई और यही समस्या सामने आई...तो मै लिखने पर मजबूर हो गई।
कभी किसी के साथ समस्या हो सकती है कोई कुछ समय ब्लॉगिंग से दूर हो सकता है...ये भी हो सकता है कि समय पर टिप्पणी न कर पाए पर मुंह मोड़ना फिर रुख ही न करना तकलीफदेह है।
आप सबके साथ यही साथ बना रहेगा...यह मेरा वादा है...और मुझे खुशी भी होगी...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

अच्छी रचनाओं को पढ़ा जाना और प्रोत्साहन दिया जाना ज़रूरी है....... सहमत हूँ....
इससे ब्लॉग जगत में अच्छे लेखन को प्रोत्साहन मिलेगा ...... जो आवश्यक है.....

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

वीणा जी!
सबसे पहले एक स्पष्टीकरण अनिवार्य है... फॉलोवर का अर्थ क्या है, वह जो आपकी फॉलोवर लिस्ट में हो, या वह जो आपका नियमित पाठक हो.... क्या जिनके सौ सवा सौ फॉलोवर हैं, उन्हें उनके नाम भी याद हैं! शायद नहीं... मैं स्वयम को एक सच्चा फॉलोवर मानता हूँ क्योंकि आपका ब्लॉग मेरे ब्लॉगरोल में है.. और जो मेरे रोल में हैं,मैं उनका फॉलोवर हूँ.. उनको नियमित पढ़ता हूँ और कमेंट करता हूँ..
आप किसी रचना को इसलिये पढ़ते हैं कि वो आपको अच्छी लगती है और तभी आप विचार व्यक्त करते हैं... अगर ऐसा नहीं है तो बहुत अच्छी रचना कहना क्या रस्म अदाई या रचना का अपमान नहीं हुआ!
किसी बुरी रचना को पढकर उसके लेखक का हौसला बढ़ाना सिर्फ इसलिये कि वो मेरी रचना को अच्छा कहता है, क्या ब्लॉग जगत के लिये अहितकर नहीं है!!
भावावेश में नहीं, शांत होकर पुनर्विचार करें... जो अच्छा लिखता है, लोग उससे स्वयम बँध जाते हैं!

वीना ने कहा…

सलिल जी जो मैंने कहा शायद आपने पर ध्यान नहीं दिया...जो नियमित पाठक है सबसे बड़ा वही फॉलोअर है। मैं खुद जहां अच्छा लगता है वहां जाकर पढ़ती हूं....यह केवल और केवल उन लोगों के लिए लिखा है जिन्होने मेरी रचनाओं पर तब तक टिप्पणी की जब तक मैंने उनका ब्लॉग फॉलो नहीं कर लिय़ा और एक-दो को तो मैने उनके ब्लॉग पर जाकर कहा और ईमेल भी किया, याद दिलाया कि आपने आना बंद कर दिया और मेरी नई रचना जरूर देखें लेकिन वह नहीं आए...यह तरीका गलत है। यह तो किसी को मूर्ख बनाना हुआ और नए लोगों पर बार-बार टिप्पणी करके प्रेशर ही तो बनाना हुआ...टिप्पणी अच्छी या बुरी दोनो ही मार्ग दर्शन का कार्य करती हैं लेकिन एक बार उनकी फॉलोअर लिस्ट में आ जाने के बाद उस ब्लॉग को देखना ही नहीं, कहां तक उचित है। मुझे कहीं किसी की कमी लगती है भाषा के, वर्तनी के स्तर पर तो मैं जरूर कहती भी हूं...निष्पक्ष राय देती हूं मगर इस तरह का बर्ताव नहीं करती .....

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

निसंदेह ।
यह एक प्रसंशनीय प्रस्तुति है ।
धन्यवाद ।
satguru-satykikhoj.blogspot.com

Mansoor Ali ने कहा…

Maine apni samasya kuchh is tarah bayaan ki thi:-

जो लिखा था आज छपा नही, जो छपा किसी ने पढ़ा नहीं,
कईं 'चटके' आए ब्लॉग पे; पर, कमेन्ट कोई मिला नही.

-मंसूर अली हाश्मी
http://aatm-manthan.com

रचना दीक्षित ने कहा…

आपकी बात से सहमत हूँ. रचनाएँ पढनी भी चाहिए और प्रतिक्रिया भी देनी चाहिए

Kunwar Kusumesh ने कहा…

साफ़-सुथरी /स्पष्ट बात आपने कही.अच्छा लगा.

वन्दना ने कहा…

काफ़ी अच्छा लगा पढकर …………इसमे हम सभी शामिल है और हम सबके साथ ऐसा होता रहता है …………ये ब्लोग की दुनिया ऐसी ही है क्या करें मगर हम तो जो भी पोस्ट पढते है तो टिप्पणी जरूर देते हैं ये नही सोचते कि किसने लिखी है और किसने नही …………मै तो कितने ही नये नये ब्लोगर्स को चर्चा मंच पर भी लाई हूँ उनकी पोस्ट के जरिये………ये तो सबकी अपनी अपनी सोच है।

ishwar khandeliya ने कहा…

सच ही कहा आपने कि लोग मात्र यह चाहतें है कि हम उनकी रचनाएँ ही पढ़े और तारीफ करें दुर्भाग्य ही है कि आज लोग सिर्फ अपनी बात कहना चाहतें हैं सुनने की आदत कोसों दूर होती जा रही है
ऐसे लोगों के लिए सिर्फ प्रार्थना ही की जा सकती है और क्या किया जा सकता है
आपके उम्दा विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

साहित्य के क्षेत्र में कदम रखते ही कुछ उत्साही कलमकार तत्काल धन और यश की कामना करने लगते हैं। जब मनोकामना की पूर्ती नहीं होती है तो उनमें निराशा घर कर जाती है। इस संबंध मेरा मानना है कि साहित्य-लेखन एक साधना है। इसमें सिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रतिभा के साथ लगन और धैर्य की आवश्यकता होती है। किसी को रचना लिखने के पूर्व लेखक को सोचना चाहिए कि क्या लिखना है और क्यों लिखना है। प्रयोजन स्पष्ट होगा तो लक्ष्य तक पहुँचना आसान होता है। नए कलमकारों को लेखन परंपरा की जानकारी के लिए खूब अध्ययन करना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों से सीख लेनी चाहिए। प्रसिद्ध उपन्यासकार स्वर्गीय अमृतलाल नागर ने मुझे सुझाव दिया था- "किसी रचना के लिखने के बाद उसे तत्काल प्रकाशित मत कराओ। कुछ दिनों के लिए उसे फाइल में दबा कर रख दो।" मैंने उनसे पूछा- "इस सुझाव के पीछे आपका क्या मंतव्य है।" उन्होंने कहा- "जल्दबाजी में रचना में अनेक ऐसे अनेक तथ्य छूट जाते हैं जिनके समावेश से रचना में चार-चाँद लग सकना संभव होता है। यदि आप आज लिखी रचना को कुछ माह बाद पढ़ोगे तो अनेक खामियाँ अपने आप पकड़ में आ जाएंगी। परिमार्जन लेखन प्रक्रिया का अंग है। बड़े से बड़े साहित्यकार को अपनी रचनाओं में परिमार्जन करना पड़ना है।"
मनुष्य प्रशंसाप्रिय प्राणी है। प्रशंसा उसे उत्साहित करती है। वहीं थोथी प्रशंसा उसे गुमराह भी कर सकती है। ब्लागों की भीड़ में फालोवर जुटाने से कलमकार को बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। भीड़ सही मार्गदर्शन नहीं कर सकती है। भीड़ से प्रशंसा हासिल करना आत्म-सम्मोहित होना है। विषय-मर्मज्ञ के द्वारा आपकी कला के गुण-दोषों को उजागर करने वाली टिप्पणी आपके लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। इस तथ्य की पुष्टि में महाकवि वृंद का एक दोहा उल्लिखित है-
"सरस कविन के चित्त को, वेधत हैं द्वै कौन।
असमझदार सराहिबो, समझदार को मौन॥"

आपका पुरषार्थ व्यर्थ नहीं जाएगा। अतएव आप अपनी प्रतिभा को पहचानिए। धैर्य पूर्वक आप अपना काम करते रहिए। यश और सम्मान आपका स्वमेव अनुगमन करेगा। मेरी गजल का एक शेर से मैं अपनी बात को विराम देता हूँ- "अगर के बाटोगे आप खुशबू तो हाथ महकेंगे आपके भी।"
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

साहित्य के क्षेत्र में कदम रखते ही कुछ उत्साही कलमकार तत्काल धन और यश की कामना करने लगते हैं। जब मनोकामना की पूर्ती नहीं होती है तो उनमें निराशा घर कर जाती है। इस संबंध मेरा मानना है कि साहित्य-लेखन एक साधना है। इसमें सिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रतिभा के साथ लगन और धैर्य की आवश्यकता होती है। किसी को रचना लिखने के पूर्व लेखक को सोचना चाहिए कि क्या लिखना है और क्यों लिखना है। प्रयोजन स्पष्ट होगा तो लक्ष्य तक पहुँचना आसान होता है। नए कलमकारों को लेखन परंपरा की जानकारी के लिए खूब अध्ययन करना चाहिए। वरिष्ठ साहित्यकारों से सीख लेनी चाहिए। प्रसिद्ध उपन्यासकार स्वर्गीय अमृतलाल नागर ने मुझे सुझाव दिया था- "किसी रचना के लिखने के बाद उसे तत्काल प्रकाशित मत कराओ। कुछ दिनों के लिए उसे फाइल में दबा कर रख दो।" मैंने उनसे पूछा- "इस सुझाव के पीछे आपका क्या मंतव्य है।" उन्होंने कहा- "जल्दबाजी में रचना में अनेक ऐसे अनेक तथ्य छूट जाते हैं जिनके समावेश से रचना में चार-चाँद लग सकना संभव होता है। यदि आप आज लिखी रचना को कुछ माह बाद पढ़ोगे तो अनेक खामियाँ अपने आप पकड़ में आ जाएंगी। परिमार्जन लेखन प्रक्रिया का अंग है। बड़े से बड़े साहित्यकार को अपनी रचनाओं में परिमार्जन करना पड़ना है।"
मनुष्य प्रशंसाप्रिय प्राणी है। प्रशंसा उसे उत्साहित करती है। वहीं थोथी प्रशंसा उसे गुमराह भी कर सकती है। ब्लागों की भीड़ में फालोवर जुटाने से कलमकार को बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। भीड़ सही मार्गदर्शन नहीं कर सकती है। भीड़ से प्रशंसा हासिल करना आत्म-सम्मोहित होना है। विषय-मर्मज्ञ के द्वारा आपकी कला के गुण-दोषों को उजागर करने वाली टिप्पणी आपके लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। इस तथ्य की पुष्टि में महाकवि वृंद का एक दोहा उल्लिखित है-
"सरस कविन के चित्त को, वेधत हैं द्वै कौन।
असमझदार सराहिबो, समझदार को मौन॥"

आपका पुरषार्थ व्यर्थ नहीं जाएगा। अतएव आप अपनी प्रतिभा को पहचानिए। धैर्य पूर्वक आप अपना काम करते रहिए। यश और सम्मान आपका स्वमेव अनुगमन करेगा। मेरी गजल का एक शेर से मैं अपनी बात को विराम देता हूँ- "अगर के बाटोगे आप खुशबू तो हाथ महकेंगे आपके भी।"
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

संजय भास्कर ने कहा…

आदरणीया वीणा जी
आपका कथन सत्य है।
हमें अपने साथी ब्लोगर का हौसला बढ़ाना चाहिए.....
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

संजय भास्कर ने कहा…

आपकी बातों से मै पुर्णतः सहमत हु

sagebob ने कहा…

इमानदारी से अपने लिए लिखना दूसरों को जरुर भाता है.दूसरों की राय की जरुरत सभी को है. पर अपेक्षा की डिग्री थोड़ी कम होनी चाहिए .
आपने अच्छे विषय को छुआ है. मैं तो आपका अनुसरण करूँगा. और आपकी सभी पोस्ट पढने की कोशिश करूँगा .हार्दिक शुभ कामनाएं.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मुझे लगता है सिर्फ़ फॉलो करने का मतलब टिप्पणियों से नही होना चाहिए ... जो अच्छा लगे उसे पढ़ना और सराहने में कोई हर्ज नही है ..

Amit K Sagar ने कहा…

नासवा जी से एकदम सहमत हूँ और भी लोगों से; सिवाय इसके इतना और कहूँगा कि ब्लोगिंग मे भी गढ़-बाजी हो चली hai और राजनीति के शबाब लुभाने मे बहुत पहले से शक्रिय हैं. यह दरअसल एक विषय बन चला है जिसको कुछेक लाइनों में या बातों में स्पस्ट नहीं किया जा सकता! चर्चा होनी चाहिए मुकम्मल तौर पर. आपने इसको लेके लिखा-शुक्रिया. शेष नासवा जी की बात को लेके आगे बढ़ जाइए!
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सागर by AMIT K SAGAR

अभिषेक मिश्र ने कहा…

ब्लॉगिंग रिलेशनशिप विकसित करने के लिए इन बातों पर तरजीह देना जरुरी है. एक साल के लिए ब्लौगिंग से दुरी के दौरान मेरे ऐसे कुछ संपर्क कम जरूर हुए, मगर उनसे मित्रता अब भी कायम है; और वो भी मेरी परिस्थितियों से अवगत हैं.

अभिषेक मिश्र ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Rahul Singh ने कहा…

रचनाओं के बीच ऐसी अंतराल पोस्‍ट भी प्रासंगिक हो जाती है.

निर्मला कपिला ने कहा…

कुछ हद तक सहमत हूँ लेकिन जितने ब्लाग होते हैं उन सभ पर एक बार मे जाना कई बार सम्भव नही हो पाता जब जाने का समय मिलता है तब तक दूसरी पोस्ट आ चुकी होती है। आप कमेन्ट की परवाह किये बिना लिखती जायें लोग जरूर पढेंगे। सब के साथ पहले पहले ऐसा ही होता है। शुभकामनायें।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

आदरणीय वीनाजी ,
आज मैं भी बिलकुल इसी विषय पर लिखना चाह रहा था | अब तक मैं जिन कुछ स्वनामधन्य ब्लाग लेखकों के ब्लोग्स पर बराबर पहुंचकर उनकी पोस्ट को पढ़कर शालीन टिप्पड़ियाँ करता रहा हूँ एवं वास्तव में उनकी समर्पित रचनाधर्मिता को सराहता रहा हूँ ,उन्हीं लोगों के एक छोटे से समूह ने न जाने क्यों १ जनवरी२०११ से मेरे ब्लाग पर न आने की कसम सी खा ली है | जबकि
मैं अब भी उनके ब्लाग पर जाकर अच्छी रचनाओं को पढता हूँ और अपने कमेंट्स भी बराबर देता हूँ | जहाँ तक अच्छीऔर ख़राब पोस्ट की बात है ,तो कम से कम ब्लॉग पर आकर अच्छी को अच्छी कहने में और यदि कोई त्रुटि है तो उसे सुधारने की सलाह देने में क्या बुराई हो सकती है ? अरे भाई , ब्लॉग लेखन में तो कम से कम कोई इतना बड़ा जुर्म तो मैंने शायद नहीं किया है किआप इतना उपेक्षित करना शुरू कर दें | हम किसी ब्लॉग पर जाकर उसे पढ़ते हैं , अपनी शालीन टिप्पड़ी दर्ज करते हैं और वह भी इसलिए कि हम रचनाकारों का जुडाव बना रहे , एक दूसरे के भावों-विचारों से अवगत होते रहें | अब यह तो कोई बात नहीं हुई कि हम बार-बार आप को सम्मान देते रहें और आप इसे हमारी कमजोरी,मज़बूरी या जाने क्या-क्या समझने का भ्रम पाले बैठे रहें | भाई ऐसा है नहीं !
बहरहाल इससे थोड़ा दुःख जरूर होता है कि यहाँ भी गुटबाजी की राजनीति हावी है शायद ! कोई फर्क नहीं --हम तो कलम के पुजारी हैं , जो लिखना है लिखते जायेंगे | और हाँ ! मैं आज भी उनके ब्लोग्स पर जाकर पढूँगा और अपनी टिप्पड़ी
भी दूंगा | अब अगर वो मेरी टिप्पड़ियाँ भी हटाने लगेंगे तो देखा जायेगा |

वीना ने कहा…

राजीव जी, मंसूर जी,रचना जी, कुसुमेश जी, ईश्वर जी,डंडा लखनवी जी,निर्मला जी, राहुल जी, अभिषेक जी,संजय जी,अमित जी, नासवा जी, झंझट जी,वंदना जी आप सभी का विचारों से सहमत होने के लिए और हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद। पूर्ण विश्वास है आगे भी यह साथ और विश्वास बना रहेगा...

वीना ने कहा…

डा. लखनवी आपने बहुत अच्छी बातें लिखी हैं। साहित्य वास्तव में साधना ही है।
लगता है कुछ लोग वह नहीं समझ सके जो मैं कहना चाहती थी। सीधी सी बात यह थी मुझे उन लोगों से शिकायत है जो दूसरे के ब्लॉग पर तब तक टिप्पणी करते हैं जब तक वह व्यक्ति उनका फॉलोवर न बन जाए।
फॉलोवर की बढ़ती संख्या कोई मानदंड नहीं है। हमें अपनी रचना पर जितनी टिप्पणी मिलती है उतनी खुशी होती है और फॉलोवर बढ़ने से निश्चित रूप से खुशी मिलती है पर दूसरे के ब्लॉग पर तब तक जाना जब तक कोई फॉलोवर न बन जाए और बनने के बाद उसके ब्लॉग पर कभी जाना ही नहीं.....यह तरीका ग़लत है। मैं इस तरीके के खिलाफ हूं... मैं फिर भी जाकर उनकी रचनाएं पढ़ती हूं...क्योंकि जो अच्छा है वो अच्छा है। इसमें रचना का भला क्या दोष....
झंझट जी ने सही लिखा है कि कोई न पढ़े पर मुझे जो अच्छा लगता है मैं जरूर पढ़ूंगा...कोई टिप्पणी ही चाहे क्यूं न हटा दे....

madansharma ने कहा…

भावावेश में नहीं, शांत होकर पुनर्विचार करें... जो अच्छा लिखता है, लोग उससे स्वयम बँध जाते हैं! आपकी बात से सहमत हूँ. रचनाएँ पढनी भी चाहिए और प्रतिक्रिया भी देनी चाहिए मनुष्य प्रशंसाप्रिय प्राणी है। प्रशंसा उसे उत्साहित करती है। वहीं थोथी प्रशंसा उसे गुमराह भी कर सकती है।
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ.

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

आदरणीया वीना जी,
आपकी बात से सहमत हूँ. रचनाएँ पढनी भी चाहिए और प्रतिक्रिया भी देनी चाहिए...........

हरकांड ने कहा…

नमस्कार वीना जी,आपके द्वारा लेख "कुछ ब्लॉगरों के तरीके........वीना" पढ़ा बहुत ही सुन्दर शब्दों में आपने सच्चाई के साथ साथ अपनी भावनाओं को भी व्यक्त किया है, मैंने अभी तक सुना था कि सच कड़वा होता है लेकिन अब मै जान गया हूँ कि सही तरीके से बोला गया सच कभी कड़वा नहीं होता है...मै ब्लोगर्स में बिलकुल नया हूँ आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है, ह्रदय से मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार करें..

taimur ने कहा…

very correct veena ji
in fact people want you to follow their blogs read them and to appreciate but the dont want to do the same with u ....what i feel is ...write honestly ....dil se likho ...log apne aap pasand karenge ...
aapki likha mujhe bahut achha laga

taimur

taimur ने कहा…

veena ji sab logon k comments padhne ke baad ant mein main yahi kahoonga ki rachnaakaar swayam ke liye likhta hai apna star swayam banata hai logon ko khush karne k liye star girana nahi chahiye ...imaandari se likenge to log swayam pasand karenge


taimur