आज है द्वंद्व
युवा मानस में
सत्य का, संघर्ष का
कर्त्तव्य का
अनभिज्ञ चाहत का
द्वंद्व
जो पलता है
अस्थिरता में
अनुगामी है चिंतन का
आकांक्षाएं
उड़ान भरती हैं
अभिलाषाएं
वीथिका ढूंढती हैं
वीथिका
जो अग्रसर हैं
अनभिज्ञ लक्ष्य की ओर
मन
सब कुछ पाना चाहता है
अल्प अवधि में
पांव
पार करना चाहते हैं
सागर
एक छलांग में
हाथ
छूना चाहते हैं
आकाश
मात्र ....ऊपर उठने से
आंखें
देखना चाहती हैं सृष्टि को
एक नजर में
मन चाहता है
इस दुनिया को बंद करना
मुट्ठी में
पर....
असम्भव हैं
वो... विशाल पांव
जो लांघ सके समुंदर
वो... विस्तृत हाथ
जो छू सकें आकाश
वो... दिव्य चक्षु
जो देख सकें सृष्टि को
और.... वो मन
जो सब कुछ पाना चाहता है
एक झटके में
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
है तो .....
असीमित, अनभिज्ञ
अभिलाषा, कर्त्तव्य विमुखता
एक संघर्ष
एक द्वंद्व
जो पलता है
अस्थिरता में
युवा मानस में
सत्य का, संघर्ष का
कर्त्तव्य का
अनभिज्ञ चाहत का
द्वंद्व
जो पलता है
अस्थिरता में
अनुगामी है चिंतन का
आकांक्षाएं
उड़ान भरती हैं
अभिलाषाएं
वीथिका ढूंढती हैं
वीथिका
जो अग्रसर हैं
अनभिज्ञ लक्ष्य की ओर
मन
सब कुछ पाना चाहता है
अल्प अवधि में
पांव
पार करना चाहते हैं
सागर
एक छलांग में
हाथ
छूना चाहते हैं
आकाश
मात्र ....ऊपर उठने से
आंखें
देखना चाहती हैं सृष्टि को
एक नजर में
मन चाहता है
इस दुनिया को बंद करना
मुट्ठी में
पर....
असम्भव हैं
वो... विशाल पांव
जो लांघ सके समुंदर
वो... विस्तृत हाथ
जो छू सकें आकाश
वो... दिव्य चक्षु
जो देख सकें सृष्टि को
और.... वो मन
जो सब कुछ पाना चाहता है
एक झटके में
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
है तो .....
असीमित, अनभिज्ञ
अभिलाषा, कर्त्तव्य विमुखता
एक संघर्ष
एक द्वंद्व
जो पलता है
अस्थिरता में
96 टिप्पणियाँ:
अनभिज्ञ लक्ष्य की ओर
मन
सब कुछ पाना चाहता है
अल्प अवधि में
पांव
पार करना चाहते हैं
सागर
एक छलांग में
हाथ
छूना चाहते हैं
आकाश
मात्र ....ऊपर उठने से
यही तो विडंबना है आज की ...आज का युवा वर्ग बिना संघर्ष के सब कुछ बहुत जल्दी पाना चाहता है ...आपकी कविता बहुत सार्थक सन्देश देती है ..इस सार्थक कविता के लिए आपका आभार
अनभिज्ञ लक्ष्य की ओर
मन
सब कुछ पाना चाहता है
अल्प अवधि में
पांव
पार करना चाहते हैं
सागर
एक छलांग में
हाथ
छूना चाहते हैं
आकाश
मात्र ....ऊपर उठने से
बहुत अच्छा संदेश और प्रेरणा देती, सच बयां करती कविता
सटीक और सार्थक बात कही है ...आज का युवा बहुत जल्दी में है वो सब कुछ यथा शीघ्र पा लेना चाहता है ..
आंखें
देखना चाहती हैं सृष्टि को
एक नजर में
मन चाहता है
इस दुनिया को बंद करना
मुट्ठी में
पर....
असम्भव हैं
वो... विशाल पांव
जो लांघ सके समुंदर
वो... विस्तृत हाथ
जो छू सकें आकाश
वो... दिव्य चक्षु
जो देख सकें सृष्टि को
और.... वो मन
जो सब कुछ पाना चाहता है
एक झटके में
दिल को छूने वाली गम्भीर रचना
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
सच कहा है आपने केवल संतोष और विश्वास नहीं है...
द्वंद्वं ही तो सारी बातों की जड़ है खूब पकड़ा है इसे आपने.....
बहुत सटीक रचना....
मन
सब कुछ पाना चाहता है
अल्प अवधि में
सच ही है.मन कम समय में ही सबकुछ पाना चाहता है....
क्या तारीफ करूं
बहुत ही गहरी बात है, सच के साथ
"सब कुछ तो है हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..."
वीणा जी मानव लिप्सा का कोई अंत नहीं है.सागर की गहराई और आकाश की ऊंचाई की भी एक सीमा है,पर मनुष्य की आकांक्षा की कोई सीमा नहीं है, स्वयं और समूची श्रृष्टि के लिए मानव भस्मासुर की तरह हो गया है जिसका निरनंतर रक्त-बीजीय विस्तार हो रहा है.बेहतरीन रचना के लिए बधाई.
ek pyari aur sarthak rachna....
par sahmat nahi hoon:)
aaj ka yuva beshak jaldi me hai...lekin wo pa bhi raha hai..
aur tabhi hamara desh pahle ke tulna me jayda agrasar hai...:)
vikas ki aur...:)
compare kariyega...apne bachcho ko khud se...:)
वीनाजी,
एक बार फिर आपने अद्भुत कविता लिखी है। वाकई आज देश की युवा शक्ति झूठ और सच के बीच द्वंद्व में फंसी है। उसे कहीं-कोई सच्ची राह दिखाई नहीं दे रही है। आखिर युवा इस द्वंद्व से बाहर कैसे निकले???
और.... वो मन
जो सब कुछ पाना चाहता है
युवा ही क्यों ?
वीणा जी,
सुभानाल्लाह.....मेरा सलाम आपको इस पोस्ट के लिए......जीवन का कितना यतार्थ और कितना सकरात्मक पहलू है इस रचना में.....
ये पंक्तियाँ दिल को छू लेने वाली हैं -
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
आदरणीय वीनाजी ,
आज के मनुष्य की, असीमित इच्छाओं को अत्यल्प समय में पूरी कर लेने की लालच एवं जीवनमूल्यों की उपेक्षा
का बहुत ही सार्थक और सुन्दर चित्रण करती है आपकी रचना |
निश्चित रूप से आज हम सब कुछ जल्दी ही पा लेना चाहते हैं.आज का युवा संघर्ष तो करना ही नहीं चाहता और संतोषी हो कर जी भी नहीं सकता.
बहुत ही सार्थक सन्देश और सत्य को सामने लाती कविता.
सादर
छूना चाहते हैं
आकाश
मात्र ....ऊपर उठने से
आंखें
वाह...अद्भुत रचना है...बधाई स्वीकारें...
नीरज
युवा के द्धंद को साकार रूप मेँ प्रकृट करती अद्भुत कविता । युवा के मन की उथल-पुथल की शानदार प्रस्तुति । आभार वीना जी ।
"कुछ फूल पत्थर के भी हुआ करते हैँ............कविता "
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
http://charchamanch.uchcharan.com/
युवा के द्धंद को साकार करती एक सच्ची और गंभीर चिंतन को दर्शाती प्रभावशाली रचना..
बिलकुल यथार्थ चित्र खींचा है इस काव्य के माध्यम से.निष्कर्ष भी सही दिया है- संतोष एवं विशवास के द्वारा सुख-शांति तथा प्रगति की प्राप्ती स्वतः हो जाती है.ऐसी रचनाएँ जारी रखें.
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का...
बहुत ही सार्थक और सटीक प्रस्तुति..आज के युवा के पास सब कुछ है लेकिन संतोष नहीं..वह हरेक वस्तु चाहता है और वह भी शीघ्रता से, चाहे उसके लिए कितने ही अहसासों,विश्वासों,औचित्यों और भावनाओं को कुचल कार आगे बढ़ाना पड़े..बहुत सटीक प्रस्तुति
आज के युवा की मानसिकता की...आभार
वीणा जी, बहुत ही सार्थक सन्देश आज की युवा पीढ़ी को. बहुत ही अच्छी बात कहीं है आपने. सुंदर प्रस्तुति.
कविता और नृत्य करते हुये शब्द।
यथार्थ का सटीक और सार्थक वर्णन करती आपकी यह कविता कहीं गहरा अर्थ भी देती है . सुन्दर पोस्ट के लिए आभार! समय मिले तो http;//baramasa98.blogspot.com भी अवश्य देखें और तदनुसार मार्गदर्शन/अनुसरण अवश्य करें.
gahan bhavon ko abhivyakt karti aapki rachna bahut achchhi lagi .mere blog ''vikhyat'' par aapka hardik swagat hai .
क्या करे युवा, एक तो भूमंडलीकरण का प्रभाव है दूसरा सशक्त आदर्श का अभाव है। चाह कर भी इससे निकल पाने में युवा असमर्थ है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि प्रयास न किया जाए। एक प्रासंगिक कविता के लिए धन्यवाद.
एक सार्थक सन्देश देती उम्दा रचना।
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
बस यही नही चाहता अगर ये चाहने लगे इंसान तो जीवन सफ़ल हो जाये और जीना सार्थक ……………एक सशक्त रचना।
और.... वो मन
जो सब कुछ पाना चाहता है
एक झटके में
बहुत ही सुन्दर शब्दों का संगम है इस अभिव्यक्ति में ।
कुछ सच्चाइयाँ ऐसे ही उजागर हुआ करती हैं ..बढ़िया
यथार्थ का बिम्ब... आभार...
सार्थक बात कही है ...सच बयां करती कविता
सब कुछ तो है
हमारे पास
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति
बहुत ही गहरी बात ! इस कविता के लिए आपका आभार !!
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
bahut hi sunder.
सब कुछ का यही द्वन्द कुछ गलतियाँ भी करवा देता है..... सुंदर रचना
aasha ki kiran aane me der lagi,phir abhilasha itani jaldi kaise puri hogi?
आज युवा वर्ग की मानसिकता एकदम बदल सी गयी है। हर चीज को जल्द से जल्द प्राप्त करने के लिए बेचैन रहता है। वह संघर्ष नही करना चाहता है।
अच्छा पोस्ट।
केवल राम जी,शालू जी, संगीता जी, आस्था जी,शान जी, पूजा जी, राजीव जी,मुकेश जी, महेंद्र जी, सुशील जी आप सबका दिल से शुक्रिया....
इमरान जी, सुरेंद्र जी,यशवंत जी, नीरज जी, डा. अशोक जी,पूजा जी, राकेश जी,संध्या जी, विजय जी, कैलाश जी,उपेंद्र जी, सुबीर जी, प्रवीण जी,शिखा जी, धीरेंद्र जी, डा. दिव्या,आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद.....
वंदना जी, सदा जी, शारदा जी, हबीब जी, विवेक जी,संतोष जी, मृदुला जी, मोनिका जी, शाह साहब, प्रेम जी आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया.....विश्वास है आप सभी मित्र आगे भी सद्भाव बनाए रखेंगे...
सबको धन्यवाद
sateek sabdo me sarthak rachna k liye badhai sweekar karen
http://amrendra-shukla.blogspot.com
"Gandhi once wrote about Seven social sins: politics without principles, wealth without work, pleasure without conscience, knowledge without character, commerce without morality, science without humanity, and worship without meaning. Interestingly we have all the seven present before us – We feel them every day, deal with them every day but do not fight back to come out of them ."
From 'A Blue Dot of Thoughts' by Ms Atoorva Sinha. http://atoorva.blogspot.com
ये सच है सब पाना चाहते हैं पर प्रतीक्षा का संतोष नहीं होता ...
बहुत अर्थ पूर्ण लिखा है ....
.आपकी कविता बहुत सार्थक सन्देश देती है ..इस सार्थक कविता के लिए आपका आभार
.आपकी कविता बहुत सार्थक सन्देश देती है ..इस सार्थक कविता के लिए आपका आभार
सटीक और सार्थक रचना आपका आभार, मेरे ब्लॉग पर पधारकर हौंसला बढाने की लिए आपका आभार.
आदरणीय वीना जी
नमस्कार !
बहुत ही गहरी बात !
बहुत ही सार्थक सन्देश और सत्य को सामने लाती कविता.
कुछ दिनों से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
माफ़ी चाहता हूँ
वसन्त की आप को हार्दिक शुभकामनायें !
अब सभी ब्लागों का लेखा जोखा BLOG WORLD.COM पर आरम्भ हो
चुका है । यदि आपका ब्लाग अभी तक नही जुङा । तो कृपया ब्लाग एड्रेस
या URL और ब्लाग का नाम कमेट में पोस्ट करें ।
http://blogworld-rajeev.blogspot.com
SEARCHOFTRUTH-RAJEEV.blogspot.com
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बहुत सुंदर
http://unluckyblackstar.blogspot.com/
बहुत सुन्दर रचना..
वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए....
सुन्दर सटीक व सार्थक कविता वीणा जी ....!!! !! बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
सुन्दर सटीक व सार्थक कविता वीणा जी ....!!!
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आदरणीया वीणा जी बसंत पर हार्दिक शुभकामनायें |सुन्दर कविता के लिए बधाई |
आदरणीया वीणा जी बसंत पर हार्दिक शुभकामनायें |सुन्दर कविता के लिए बधाई |
कैसे कहें
कि जो असंतोषी है
और अविश्वासी भी
द्वंद्व उसके भीतर होगा
सत्य,संघर्ष और कर्तव्य का!
(निवेदनःअभिलाशाएं को अभिलाषाएं कर लिया जाए)
अमर जी, गौतम जी,नासवा जी, मदन जी, अरविंद जी, संजय जी, राजीव जी, ओम जी, भाकुनी जी, सरोज जी, तुषार जी, राधारमण जी आप सबका उत्साह वर्धन के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। राधारमण जी आपने जो कहा वह ठीक कर लिया है धन्यवाद। वो टाइप करते वक्त रह गया था...नीचे तो सही था न....? मतलब तो इससे है कि रचना में कहीं से कोई एक भी शब्द नहीं गलत होना चाहिए...दोबारा धन्यवाद...आप सबसे अनुरोध है किसी के नाम में कोई गलती हो तो जरूर बताइएगा....
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
युवाओं की सोच को समझते हुए बिलकुल उचित मार्ग सुझाया है आपने.
achhi lagi.
जीवन के कटु सत्य को बयान करती शानदार कविता।
---------
समाधि द्वारा सिद्ध ज्ञान।
प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों के विशेषज्ञ पशु-पक्षी।
सुन्दर कविता..अप्रतिम भाव..
पहली दफा आपके ब्लॉग पर आया...जय हो...वाणा के सुर वाकई में मन- मस्तिष्क में झंकार बो दिए...कुछ बिंदुओ पर तर्क- वितर्क चल रहा है..कब तक चलेगा...मालुम नहीं। आपकी लेखन और गोते लगाए और गहराई में हमें ले चले...हमारी यही कामाना है।
द्वन्द्व पर बहुत सशक्त रचना लिखी है आपने!
कितनी सुन्दर बात कही आपने....इसको समझने और याद रखने की आवश्यकता है...
प्रेरणाप्रद कल्याणकारी बहुत ही सुन्दर रचना...
आभार आपको इस सुन्दर कृति के लिए...
aaj ka yahi yatharth hai. bahut achchha.
bahut khoob likha hain ji
sach kaha aapane...
सुन्दर और सार्थक कविता....आपने हक़ीकत को कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है।
उत्तम कोटि के काव्य सृजन के लिए बधाई।
is kavita ki tarif ke liye sach me mere paas shabd nhi hai..... :)
आज के युवा वर्ग की अभिलाषाओं को खूबसूरती से प्रस्तुत करती सुन्दर रचना |
खुबसुरत रचना |
अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
उपर्युक्त पंक्तियों में कविता का सार दिल को छूने वाला है. आपको बधाई. मैंने भी आपका ब्लॉग फ़ॉलो कर लिया है.
बहुत ही अच्छी और सच्ची बात कही आपने , संतोष एवं विश्वास का अभाव... सही आदर्श और मार्गदर्शक के अभाव में दिग्भ्रमित युवा ऊर्जा बर्बाद हो रही है । वृहत रूप में देखेँ तो युवा वर्ग में सार्थक चिंतन एवं दूर दृष्टि का अभाव है , और अगर है तो ये सब इतना अल्प और इतनी दिशाओं में है कि वह स्वयं प्रगति में बाधक बन जाता है । अच्छी कविता !शुभकामनाएं !
आज है द्वंद्व
युवा मानस में
सत्य का, संघर्ष का
कर्त्तव्य का
अनभिज्ञ चाहत का
बहुत सुन्दर.
bhn ji shi khaa yuva ke bich ka jo dvndh he voh aapne shi chitrit kiya he shukriya, akhtar khan akela kota rajsthan
अच्छे सुर हैं...जो बहुत कुछ कहते हैं...
सुन्दर और सार्थक कविता
मैं बहुत दिनों के बाद नेट पर आया हूँ... आज आपके सारे छूटे हुए पोस्ट्स पढूंगा....
रिगार्ड्स
कविता में मन के भाव होते हैं और आपकी रचना आसानी से सब कुछ कह देती है !
कागज़ की कश्तिओं मे आसमान के सपने। भावमय अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।
अभिषेक जी, रजनीश जी, वीएस जी,अरुण जी, अमृत जी, मयंक जी,रंजना जी, योगेश जी, चिराग जी, वीरेंद्र जी, पंख जी आप सबका अपना स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखने के लिए धन्यवाद
मीनाक्षी जी, कुसुमेश जी, वंदना जी,अकेला जी, डा. श्याम, मिथिलेश जी, महफूज जी, संतोष जी, निर्मला जी आपका सबका यहां आने, अपने विचार देने और स्नेह बनाए रखने के लिए शुक्रिया...
बढ़िया अभिव्यक्ति है. कुछ नया लिखिए.
वीणा जी ...... आपकी लेखनी की ये पंक्तियाँ मुझे अत्यंत लुभावनी लगी....
" अभाव है तो बस
संतोष का... विश्वास का
संतोष.....
जो देता है
सुख-शांति
विश्वास..... देता है
निश्चित प्रगति "
आप ने मेरे ब्लॉग को पढ़ के टिपणी की ये मुझे अत्यंत अचछा लगा...
अगर आप भविष्य में भी उसे पढ़ कर उसपे टिपणी देंगी तो मुझे अचछा लगेगा ..... रितेश रस्तोगी....
http://riteshrastogi.blogspot.com/
आज के युवा वर्ग की मानसिकता ,पर सम्पूर्ण दृष्टिपात करती रचना . आभार इस इस सुन्दर रचना के लिए .
बहुत सटीक रचना...
बेहतरीन रचना के लिए बधाई !
बहुत सटीक रचना...
बेहतरीन रचना के लिए बधाई !
nice nice...
nice nice...
nice nice...
पहली बार आया आप के ब्लॉग पर..
युवा द्वंद का स्पष्ट एवं सार्थक चित्रण
बधाइयाँ..
अच्छी रचना है, प्रत्यक्ष अनुभूति के साथ।
आदरणीय वीनाजी,
नमस्कार
बेहद सुन्दर कविता लिखी है।
मौन नहीं गर्जन है ईश्वर की साधना .
शान्ति नहीं क्रान्ति है युग की आराधना
द्वन्द,भ्रम,अनभिज्ञता,अनिश्चतताओं..का मिश्रण है आज का युवा वर्ग, अत्यधिक सारगर्भित शब्दों का चयन किया है आपने,
बहुत सुन्दर रचना है. बहुत धन्यवाद..
द्वन्द,भ्रम,अनभिज्ञता,अनिश्चतताओं..का मिश्रण है आज का युवा वर्ग, अत्यधिक सारगर्भित शब्दों का चयन किया है आपने,
बहुत सुन्दर रचना है. बहुत धन्यवाद..
आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा अति उत्तम असा लगता है की आपके हर शब्द में कुछ है | जो मन के भीतर तक चला जाता है |
कभी आप को फुर्सत मिले तो मेरे दरवाजे पे आये और अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाए |
http://vangaydinesh.blogspot.com/
धन्यवाद
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