बुधवार, 13 जुलाई 2011

पुस्तकें.............वीना....

ज्ञान का भंडार हैं
ये पुस्तकें
बंद है
हमारा भविष्य इनमें
नन्हें हाथों की शक्ति
आने वाले कल की 
तस्वीर है इनमें
इन्हें खोले और
गहराई में उतरे बिना
हम नहीं कर सकते
अपने कल का निर्माण
कल के
सवालों के उत्तर
मिलेंगे
यहां-वहां बिखरी
सजी किताबों में
लेकिन हमारे पास
समय कहां है
हम तो उलझे हैं
शार्ट कट में
किताबों के  लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में 
अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से

109 टिप्पणियाँ:

एस.एम.मासूम ने कहा…

वीणा जी बहुत ही सुंदर अभ्व्यक्ति,
.
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में

vidhya ने कहा…

बहुत ही सुन्दर

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

आपने बहुत सही लिखा है.आज आधुनिक संचार माध्यमों ने किताबों को पढ़ने का समय चुरा लिया है. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. आज मेरे कम से कम १६ घंटे इन्टरनेट पर गुजर जाते हैं और सिर्फ चार घंटे ही पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ पाता हूँ.

Udan Tashtari ने कहा…

पढ़ना बहुत जरुरी है....ये आदत बनी रहना चाहिये...सुन्दर रचना...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

सही बात कही आपने पुस्तकों से अच्छा कोई दोस्त नहीं हो सकता.इंटरनेट के इस दौर में भी किताबों की अपनी महत्ता है इसे समझना होगा.

सादर

Vijai Mathur ने कहा…

आज लोग किताबों से नहीं ताल्लुक रखते इसी लिए तो डिग्री पा कर भी अबोध रह जाते हैं.यदि इस कविता में व्यक्त भावों को समझा जाए तो 'पुस्तकों'से आज भी और आने वाले 'कल'में भी बेहद फायदा उठाया जा सकता है.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

पढने से अच्छी आदत और कोई नहीं ...अच्छा लिखा आपने

anu ने कहा…

बहुत सही लिखा आपने ........हर किसी का गया वक़्त लौट के आता है ..अपने बच्चों के रूप में ....
पर आज सच में वो वक़्त भी खो गया....सब कुछ मशीनी हो गया

सुज्ञ ने कहा…

विस्मृत होती अच्छी आदतों की तरफ लक्ष दिलाया आपने।

अध्ययन बहुत जरूरी है।

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही सुंदर अभ्व्यक्ति,
.

Atul Shrivastava ने कहा…

सम सामयिक रचना।
सच कहा आपने किताबों को पढने सहेजने में अब यकीन नही रहा इस दौर में
शुभकामनाएं आपको


आपका भी स्‍वागत है मेरे ब्‍लाग में

महेश बारमाटे "माही" ने कहा…

बहुत सही लिखा आपने...
किताबों की जगह ले ली है इन्टरनेट ने...

आभार :)

lokendra singh rajput ने कहा…

किताबों कि दुनिया वाकई लाजवाब है... समाज में जो तमाम तरह कि बुराईयां बढ़ रही हैं उसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि आज के अधिकांश लोग किताबों से दूर और सिनेमा के पास हो गए हैं...

Suman ने कहा…

nice

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

बहुत ही सुन्दर

आशुतोष की कलम ने कहा…

लिखने से ज्यादा पढना जरुरी है..
एक अच्छा पाठक या श्रोता ही अच्छा लेखक या वक्ता बन सकता है..
इसमें किताबे बहुमूल्य योगदान देती है...इन्टरनेट को पुस्तकालयों के बराबर ज्ञानार्जन करने में बरसों लग जाये..
पुस्तकों की प्रासंगिकता ज्ञान के क्षेत्र में सर्वदा रहेगी

संजय भास्कर ने कहा…

ज्ञान का भंडार हैं
ये पुस्तकें
बंद है
हमारा भविष्य इनमें
नन्हें हाथों की शक्तिआने वाले कल की
बहुत सही लिखा आपने..
पुस्तकों से अच्छा कोई दोस्त नहीं हो सकता....!

रविकर ने कहा…

सचमुच
पुस्तक पढने की आदत
से दूर हो रहे हैं हम ||

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही सार्थक अभिवयक्ति...

JC ने कहा…

वीणा जी, पुस्तकें पढने का आनंद मैंने अपने ४ वर्षीय नाती के साथ अधिक उठाया अपने बचपन की तुलना में... वो मेरे पास एक के बाद एक पुस्तक ला कहता था, "रीड इट"! और तन्मयता के साथ सुनता भी था!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए... ab to sab vyavaharik ho gaye hain

bhoj ने कहा…

Very right.

vijay ने कहा…

क्या बात है - लाजवाब
अब पढ़ने की आदत कहां रही
बहुत सही लिखा है आपने...

shaan ने कहा…

यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से

bahut khoob....

यादें ने कहा…

लेख सच्चाई,भलाई और अच्छाई से भरपूर ,
कुछ तो रही होंगी ,मजबूरियां अपनी
जी रह गया में पढाई से बहुत दूर...???
शुभकामनायें!
खुश रहें!

दिवाकर मणि ने कहा…

रचना के माध्यम से आपने एक ऐसे विषय पर प्रकाश डाला है, जिससे भागमभाग वाली दिनचर्या में शिक्षित जन अनदेखा करते जा रहे हैं.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बस पढ़ना कभी न छूटे।

aastha ने कहा…

किताबों के लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में
अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए

आज के हालात पर बेहतरीन कटाक्ष...
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

radha ने कहा…

सच कहा है आपने जब पढ़ने की आदत ही नहीं बची तो वो रिश्ते कहां से पनपेंगे
बहुत सशक्त रचना...

puja ने कहा…

very nice...

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

वीणा जी बहुत ही सुंदर अभ्व्यक्ति,आपने बहुत सही लिखा है .
किताबों की जगह ले ली है इन्टरनेट ने...

shalusri ने कहा…

हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से

किताबों से बड़ा और अच्छा दोस्त कौन है भला
और आज इसी आदत में कमी आ रही है
बहुत अच्छा लिखा है दी...

हिंदुस्तान कि आवाज़ ने कहा…

आज हम भी आ गए आपके ब्लॉग पर. सही कहा आपने इंटरनेट के कारन आज पुस्तक पढ़ने का समय बिलकुल नहीं मिलता है.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

बड़ी पुराणी कहावत है कि पुस्तकों के बिना जीवन खिडकियों के बिना मकान की तरह होता है... यह अलग बात है कि इन खिड़कियों की जगह आजकल "Windows" ने ले ली है.. यही भाव गुलज़ार साहब ने भी अपनी कविता में व्यक्त किये हैं..

ZEAL ने कहा…

There is no life without books !....One cannot deny it's significance.

सतीश सक्सेना ने कहा…

पुस्तकें ज्ञान का अक्षय श्रोत हैं ...
शुभकामनायें आपको !

devendra gautam ने कहा…

इस नज़्म के जरिये आपने बड़े सरल और भावपूर्ण शब्दों में अपनी बात रखी है. इंटरनेट के इस युग में निश्चित रूप से मनुष्य की पुस्तकों में दिलचस्पी घटी है. लेकिन पुस्तकों का महत्त्व कम नहीं हुआ है. अभी भी फुर्सत के वक़्त बिस्तर पर लेटकर पढने के लिए किताबों की ही जरूरत पड़ती है. प्रकाशन व्यवसाय में किसी तरह की मंदी नहीं आई है. यह अलग बात है कि जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से पाठकीयता में जो इजाफा होना चाहिए था वह नहीं हो पा रहा है. ऑनलाइन रहने के जरिये भी लोगों में पढने की आदत बढ़ी ही है. यह तो तकनीक है जो विकसित होती जाती है. किसी ज़माने में ताडपत्र पर लिखा जाता था अब ब्लॉग और पर लिखा जा रहा है. वेबसाईट पर लिखा जा रहा है. न लिखने वाले थक रहे हैं न पढनेवाले. कुछ सोचने को विवश करने वाली इस बेहतरीन नज़्म के लिए बधाई स्वीकार करें.

Roshi ने कहा…

perne se accha kuch nahi ..........rat mein sote waqt kitab jaroor chahiye sleeping pil ka kam karti ha kitab hamare liye

Dilbag Virk ने कहा…

bilkul sahi kha aapne

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

aaj net ne sab jagah yahi haal kar diya hai...kitabe padhna to door aapsi rishto me bhi dooriya paida kar di hain is anterjal ki duniya ne.

sateek lekhan.

मनोज कुमार ने कहा…

कहते हैं १० पंक्ति लिखने के पहले १००० पंक्तियां पढ़नी चाहिए।

मनोज कुमार ने कहा…

कहते हैं १० पंक्ति लिखने के पहले १००० पंक्तियां पढ़नी चाहिए।

Maheshwari kaneri ने कहा…

वीणा जी आपने बहुत सही लिखा है.आधुनिक संचार के साधनों ने किताबों को भूला ही दिया है... सुंदर अभ्व्यक्ति,

ehsas ने कहा…

बिल्कुल सही कहा है आपने। अब किताबों की जगह इंटरनेट ने ले लिया है। बस बटन दबाईए और सबकुछ हाजिर।

राजीव थेपड़ा ने कहा…

kavita kaa bhaav acchhaa hai,,,,,

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

बहुत ही प्रभावशाली रचना है वीणा जी---इसे पढ़कर किताबें करती हैं बातें कविता याद आ गयी----वैसे वर्तमान समय के लिये यह एक उपयोगी और सामयिक रचना है---क्योंकि आज देश के बच्चों को फ़िर से किताबों के साथ जोड़ने के लिये नेशनल बुक ट्रस्ट के साथ ही कई एन जी ओ भी प्रयासरत हैं। इन्हीं किताबों के महत्व को लेकर लिखा गया मेरा एक लेख जनसन्देश टाइम्स मे प्रकाशित होने की संभावना है। बेहतरीन कविता के लिये शुभकामनायें।

Arvind Mishra ने कहा…

अंतर्जाल के युग में भी सहचरी हैं पुस्तकें

Rakesh Kumar ने कहा…

पुस्तकें ज्ञान का स्थाई भंडार हैं,जो इंटरनेट की समस्या से ग्रसित नहीं.पुस्तकों के अध्ययन में दिया गया समय निरर्थक नहीं जाता.पुस्तकों की अहमियत समझना जरूरी है.

आपकी सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

आप शायद मेरे ब्लॉग पर नहीं आ पाईं हैं.
सैदेव सादर आमंत्रित हैं.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा है ... नेट ने जाने कितने भावनात्मक रिश्ते खत्म कर दिए अहिं .... आज कोई पत्र नहीं लोखता ... किताबें नहीं पढता ... धीरे धीरे मिलना भी बंद हो जायगा ... नए को अपनाने में कितना कुछ खोना पड़ता है ... बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति है ..

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच कहा है ... नेट ने जाने कितने भावनात्मक रिश्ते खत्म कर दिए अहिं .... आज कोई पत्र नहीं लोखता ... किताबें नहीं पढता ... धीरे धीरे मिलना भी बंद हो जायगा ... नए को अपनाने में कितना कुछ खोना पड़ता है ... बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति है ..

अर्चना गंगवार ने कहा…

किताबों के लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में
अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता

aapki kai rachnayo ke madhyam se aapke nazeriye ko para .....bahut hi khoobsorat hai aapka duniya ko dekhne ka aur usse bhi sunder saral seedhe shabdo mein unki abhivyakti.......

waqt mile tu hamare bog per bhi aaye......shayad kuch bha jaye....

archview.blogspot.com

रंजना ने कहा…

सत्य कहा आपने...पढने की आदत से दिनोदिन हम दूर होते जा रहे हैं...

दीपक बाबा ने कहा…

हम्म ...... पढ़ने की तो कभी आदत ही नहीं बन पायी

सुंदर कविता...

पढ़ कर बता रहे हैं :)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

चिंता न करें
लौट रही है आदत
पढ़ने की..
पुस्तकें न सही
'ब्लॉग' लोग पढ़ने लगे हैं.
आधुनिकता के व्यामोह में फँसी
पुस्तकों को उपेक्षा से देखने वाली
'अरुचि' भी
अब अपनी
चमकती स्क्रीन पर
ताज़ा-ताज़ा उपजते विचारों को
रुचिपूर्वक
आँख और दिमाग में
ले जाने लगी है.
चिंता न करें
लौट रही है आदत पढ़ने की..
ब्लॉग लिखने वाले भी
अब अपने मित्रों से
निरंतर परस्पर
वैचारिक-संघर्ष की गुणवत्ता निमित्त
पुस्तकों के करीब गुप-चुप जाने लगे हैं.
मैं भी इस समय पुस्तकालय में बैठा
अपनी अभिव्यक्ति को पुष्ट करने को तरह-तरह की किताबें निहारे जा रहा हूँ.
मैं इसे आज़ पढ़ना नहीं कहता..
इसे कहता हूँ - 'अभिव्यक्ति चिकित्सा'
या 'व्यक्तित्व को जिमाना... खाना खिलाना'.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

प्रेम और रिश्ते
स्थान-विशेष के मोहताज़ नहीं.
वे किताबघर की बजाय
अब घर बैठे
आभासी दुनिया में भी बनाए जा सकते हैं.
विचारानुराग, श्रोतानुराग, पठनानुराग आदि-आदि न जाने अब कितनी विविधताएं आ चुकी हैं... प्रेम-व्यापार के लिये,
संबंधों में आज़ जरूरी नहीं कि समीप रहा जाये या समीप लाया जाये.
संबंध .... तो एक क्षण-विशेष का भी
काफी अर्थ रखता है.
संबंध को 'आने-जाने' या 'मिलने-बिछड़ने' से क्यों परहेज?
क्या प्रेम केवल एक बार मिलने वालों के बीच नहीं हो सकता?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

'भ्रमर स्वभाव' प्रेम-व्यापार में कलंकित क्यों है?
वह प्रत्येक पुष्प से मिलता है..
केवल एक बार या दो बार या तीन बार...
लेकिन उसकी यह वृत्ति
साधु-वृत्ति क्यों नहीं कही जाती?
न कोई मोह
न कोई विशेष राग.
सबसे पहली भेंट में ही विवेकपूर्ण अनुराग.
पराग है तो पास आये
नहीं है तो दूसरे के पास गये.
ठीक उसी तरह आपके पास
जब तक विचार हैं तो पास हैं.
नहीं हैं तो दूसरे ब्लोगर के दरवाजे गये.
काहे की शिकायत? काहे का शिकवा??

ishwar khandeliya ने कहा…

क्या बात कही है आपने सचमुच ही पुस्तकों के माध्यम से बनने वाले रिश्ते खत्म ही होते जा रहें है पुस्तकें पुस्तकालयों की शोभा ही बनती नज़र आ रही हैं किन्तु फिर भी पढने वाले तो पढेंगे ही उम्मीद करनी चाहिए कि दिन बहुरेंगे
उम्दा लेखन के लिए साधुवाद

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

par pustaken bhi to durlabh hoti ja rahi hain........:)
khubsurat abhivyakti..

Kailash C Sharma ने कहा…

पुस्तकों से अच्छा कोई साथी नहीं होता. पुस्तकों का स्थान इन्टरनेट या एनी इलेक्ट्रोनिक मीडिया कभी नहीं ले सकता. यह सही है कि आज पुस्तकों के पढने वाले कम होते जा रहे हैं, लेकिन हमें बच्चों में पुस्तकों से लगाव शुरू से पैदा करना चाहिए. मेरा धेवता जो ३ साल का है, सोने के समय कहानी की सभी किताबें लेकर आजायेगा, और जब तक उसे सभी पढ़ कर नहीं सुनादो वह कभी नहीं सोएगा. मैं जब भी थक जाता हूँ तो कोई पुस्तक उठा लेता हूँ, और कुछ समय बाद अपने को पूरी तरह तारो ताजा महसूस करता हूँ.

बहुत सार्थक और समसामयिक प्रस्तुति..आभार.

सूर्य गोयल ने कहा…

सवालों के उत्तर
मिलेंगे
यहां-वहां बिखरी
सजी किताबों में
लेकिन हमारे पास
समय कहां है

अपने दिल की बात को बहुत ही सुन्दर शब्द दिए है आपने. सार्थक कविता के लिए साधुवाद.

इमरान अंसारी ने कहा…

बहुत खुबसूरत ख्यालात हैं........बर्नाड शा के शब्दों में...."मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूँगा क्योंकि जहाँ ये होंगी वह स्वर्ग अपने आप बन जाएगा |"

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

जो किताबें पढी नहीं जातीं उन्हें जला देना चाहिए...
अँधेरे में कुछ तो उजाला होगा.
जो प्रहरी रक्षा न कर सके उसे सुला देना चाहिए.
कम-से-कम मोहताज उनींदे लोगों की पराश्रिता तो कम होगी... खुद पर विश्वास लौटेगा.
जो नेता निर्णय ना ले सके उसका कुल्ला कर देना चाहिए.
कब तक उसे पीने योग्य बनाने की कोशिश होती रहेगी.

sanjeev tiwari ने कहा…

bahut khub sarahniya prayas

संध्या शर्मा ने कहा…

आने वाले कल की
तस्वीर है इनमें
इन्हें खोले और
गहराई में उतरे बिना
हम नहीं कर सकते
अपने कल का निर्माण
बिलकुल सही कहा है आपने... किताबों का अपना महत्व, है इसे युवा पीढ़ी को समझना होगा. वर्तमान परिस्थितियों का वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करती रचना...

सुबीर रावत ने कहा…

पुस्तकों की अपनी महता है. इसे नकारा नहीं जा सकता और न पुस्तक का कुछ विकल्प है.
एक सार्थक व सुन्दर पोस्ट के लिए आभार.

Rajiv ने कहा…

किताबें ही देती हैं पहचान.संजोये रखती है सदियों तक ज्ञान.

रेखा ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .............आभार

surendrshuklabhramar5 ने कहा…

वीणा जी सुन्दर अभिव्यक्ति और आवाहन पढना बहुत ही जरुरी है यह हमारे मन मष्तिष्क और सोच का दायरा बढ़ाता है धन्यवाद आप का
लेकिन पढाई अब इन्टरनेट पर भी हो रही है बहुत कुछ है यहाँ से फुर्सत नहीं और वो जमाना दूर हो गया पुस्तकालय का कुछ ये भी सच है सामंजस्य रखना है -
भ्रमर ५

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

Bahur sahi kaha... aur internet me to tippani kee hod me kai baar kuch log bina pade hee fataafat tippanni kar dete hai... aapki rachna kaa vishay vastu bahut sateek

udaya veer singh ने कहा…

यह सोच कर मन विदीर्ण हो उठता है की ,मेरे प्यारे देश में प्रकाशकों से लेकर ,पाठकों तक की संख्या दयनीय है , ऐसे में ,पुस्तकों की महता पर रचना खासा ध्यान आकर्षित करती है ........./ सराहनीय प्रयास शुक्रिया जी /

अजय कुमार ने कहा…

किताबों से दूरी बढ़ना ,चिंताजनक है

mridula pradhan ने कहा…

किताबों के लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में
kitna sahi kahi hain aap........

कविता रावत ने कहा…

अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए...
.बहुत ही सार्थक अभिवयक्ति..
बेहतरीन कविता के लिये शुभकामनायें

Dr. shyam gupta ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है ...हाँ..

"बंद है
हमारा भविष्य इनमें.....के स्थान पर ..
" सुरक्षित है हमारा भविष्य इनमें"... हो तो क्या अधिक अच्छा नहीं रहेगा....

---प्रतुल जी का कथन भी एक दम सटीक है...
"चिंता न करें
लौट रही है आदत
पढ़ने की.."
"अपनी अभिव्यक्ति को पुष्ट करने को तरह-तरह की किताबें निहारे जा रहा हूँ."
पुष्टि के लिए पुस्तकों की आवश्यकता सदैव ही रहेगी ..

Khare A ने कहा…

samaye ke साथ बदलना jaruri है
बस समझ लीजिये ए हमारी मज़बूरी है
पहले तो किताबों में रखकर देने कि सोचते थे
अब तो ईमेल है भैये, चाहे जब सरका दो

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

सही कहा कि हम हेते जा रहे हैं पढने की आदत से दूर । किताबों के माध्यम से होता विचारों का भावनाओं का चिठ्ठियों का फूलों का आदान प्रदान कितनी खूबसूरती से बयाँ किया है और मूल मुददा ज्ञान के भंडार होने का भी सबसे ऊपर । बहुत अच्छी लगी ये कविता ।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

puri sacchai se hakikat ki, shabdon se banayi hui taswir hai aapki ye kavita

रजनीश तिवारी ने कहा…

पुस्तकालय को तो हमने म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया है ...सुंदर कविता

rajendra awasthi ने कहा…

अब कोई नही मिलता किताबों के बहाने,
साहित्य के दर्द को आपने शब्दों में उकेरा है,
आज तो सब कहते ये ब्लॉग मेरा वो ब्लॉग तेरा है,
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने पुरातन पुस्तकें कर दी,
जहाँ आप जैसे लेखक हो वंही साहित्य का सवेरा है..

बहुत सुन्दर..

SAJAN.AAWARA ने कहा…

ज्ञान का भंडार हैं
ये पुस्तकें
बंद है
हमारा भविष्य इनमें
नन्हें हाथों की शक्ति
आने वाले कल की
तस्वीर है इनमें
इन्हें खोले और
गहराई में उतरे बिना
हम नहीं कर सकते
अपने कल का निर्माण

bilkul sahi likha hai...
jai hind jai bharat

Babli ने कहा…

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

सदा ने कहा…

बेहतरीन शब्‍द रचना ।

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

किताबों से बेहतर साथी भला कौन हो सकता.ज्ञान-वर्द्धन का स्त्रोत होने के साथ ही किसी युग में रिश्तों में माधुर्य घोलने का साधन भी हुआ करती थी.सूखे हुये फूलों को सहेजने का दायित्व भी निभाती थी.भावपूर्ण रचना में सुंदर दृश्य समाहित हैं

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

पुस्तकें ही हमारी सच्ची दोस्त हैं !

वीना ने कहा…

मासूम जी, विद्या जी, रमेश जी,समीर जी, यशवंत जी,विजय जी, रंजना जी, अनु जी,सुज्ञ जी, मिथिलेश जी, अतुल जी, लोकेंद्र जी, महेश जी आप सबका दिल से आभार...

वीना ने कहा…

सुमन जी, संजय जी, आशुतोष जी, संजय चौरसिया जी,रवि जी, सुषमा जी, जे सी जी,रश्मि जी, भोज जी,जिजय जी, शान जी, दिवाकर जी, अशोक जी,दिवाकर जी, प्रवीण जी, आस्था जी आप सबका भी दिल से आभार...

वीना ने कहा…

राधा जी, पूजा जी, डा. अनवर, शालू जी,सलिल जी,हिंदुस्तान की आवाज. डा. दिव्या,सतीश जी, देवेंद्र जी, रौशी जी,दिलबाद जी, अनामिका की सदाएं,सनोज जी, महेश्वरी जी, एहसास जी, राजीव जी, हेमंत जी आप सबका धन्यवाद...

वीना ने कहा…

अरविंद जी, राकेश जी, दिगम्बर जी, अतुल जी,अर्चना जी, रंजना जी, दीपक जी,प्रतुल जी, ईश्वर जी, कैलाश जी,मुकेश जी,सूर्य जी, इमरान जी, संजीव जी, संध्या जी,सुबीर जी, राजीव जी, रेखा जी आप सबका भी बहुत-बहुत धन्यवाद...

वीना ने कहा…

सुरेंद्र जी, डा. नूतन, उदय वीर जी, मृदुला जी, अजय जी, कविता जी, डा. श्याम,खरे जी, आशा जी, डा. आशुतोश,रजनीश जी, राजेंद्र जी, साजन जी,बबली जी, सदा जी, अरुण जी और संतोष जी आप सभी का तहे दिल से आभार...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

दुखती रग पर हाथ रखती है आप की सुन्दर भावपूर्ण रचना ...
हम दिनोदिन पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं ...

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से


बहुत सही लिखा है आपने....
सुन्दर एवं मर्मस्पर्शी रचना !

Rachana ने कहा…

चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से
bahut sunder kavita
rachana

उपेन्द्र ' उपेन ' ने कहा…

वीना जी, सही कहा आपने। सच इस नेट की दुनिया ने लोँगो का किताबोँ से मोह भंग कर दिया है।

निवेदिता ने कहा…

बहुत ही सार्थक अभिवयक्ति.......

Dorothy ने कहा…

मेरे ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद.
प्रासंगिक और सटीक अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.

kumar ने कहा…

bahut achha likha aapne...pahli bar padkar achha laga

अल्पना वर्मा ने कहा…

प्रफुल्ल जी की टिप्पणी से प्रभावित..'अभिव्यक्ति -जिमाना!'
मैंने खुद इतनी किताबें पढ़ने के लिए कभी नहीं खरीदीं जितनी ब्लॉग जगत से जुड़ने के बाद इन्हें पढ़ने की रूचि जागी और इच्छा भी.

Bhushan ने कहा…

पुस्तकों कोई विकल्प अभी तक जानकारी में नहीं आया. नेट पर काफी कार्य किया है परंतु जो मित्रता पुस्तक से हो सकती है वह नेट से नहीं हो सकती. आपकी कविता इस महत्वपूर्ण सत्य से परिपूर्ण है.

सागर ने कहा…

bhaut sunder likha hai aapne...

Apanatva ने कहा…

sunder abhivykti......
hum se kitabo ka moh choota nahee hai panne paltne ka alag hee mazaa hai jee.

कुमार राधारमण ने कहा…

हर नई तकनीक के साथ अनेक प्रकार की आशंकाएं पैदा होती हैं जो समय के साथ स्वयं निर्मूल होती जाती हैं। पुराने का मोह छोड़कर ही नए का स्वीकार संभव है। दुनिया बदल रही है। हमें भी थोड़ा लचीलापन दिखाना चाहिए।

Dimple Maheshwari ने कहा…

bahut khub......kitaabon ka kya mulya hain...ye bahut km log samjte hain..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

सच है, हमे समय नहीं है और हम ‘तैयार माल’ इंटरनेट से उठाते है। कापी पेस्ट करो और हो गया काम :)

Babli ने कहा…

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

कल ,शनिवार (३०-७-११)को आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है ,नई -पुराणी हलचल पर ...कृपया अवश्य पधारें...!!

सुनीता शानू ने कहा…

आज फ़िर खेली है हमने लिंक्स के साथ छुपमछुपाई चर्चा में आज नई पुरानी हलचल
एक पुरानी कविता

Amrita Tanmay ने कहा…

बहुत ही प्रेरणादायक है रचना

amrendra "amar" ने कहा…

वीणा जी बहुत ही सुंदर अभ्व्यक्ति,

Babli ने कहा…

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/