समय ने आज
फिर दिखाया दर्पण मुझे
कितना बदल गया है
चेहरा मेरा
वो भाव
वो मासूमियत
वो अल्हड़पन
वो बचपन
कहीं छूट गया पीछे
मैं अभी भी भाग रही थी
उन्हीं संबंधों के पीछे
जिनके सिरे
बंधे हुए थे बचपन से
अकेलेपन के आंगन में
कितना रीता-सा हो गया है
जीवन
परछांई बनकर चलने वाले
रिश्ते
कहीं गुम हो गए
समय के अंधकार में
वक्त ने कर दिया उन्हें हमसे दूर
या हमारी जरूरतों ने
कर लिया किनारा उनसे
मस्तिष्क के पुस्तकालय में
तरतीब से सजी हैं यादें
लेकिन बिखरी पड़ी हैं वो
तस्वीरें
जो बसी थीं आंखों
मैं नहीं देखना चाहती दर्पण
कैसे ढूंढूंगी
अपने इर्द-गिर्द की
तस्वीरें
मैं अकेली रह गई
अपने फोटो फ्रेम में
बचा है तो मेरा रीतापन
कहीं आवाज देता मौन
भीगी हुई यादें
सिसकती रूह
13 टिप्पणियां:
यादों को समेटे सुंदर प्रस्तुति
मनको छूने वाली भावपूर्ण रचना !
रिश्तों के टूटने बिछुडने के गम असहनीय होता है. सुंदर कविता, बेहतरीन प्रस्तुति.
रीतापन पीड़ा से भरा होता है..
अपनी बिखरी यादों को समेट कर अपने दिल के फ्रेम में.. अब फिक्स कर लें ...दिल को बहलाने के लिए सामान मिल जायेगा ......
शुभकामनायें!
यादों को उद्वेलित करती सुन्दर प्रस्तुति ...
Samay ke sath sabkuch badal jata hai, kya rishte aur kya chehere. aur akelepan ka ahsas baahut awsad bhar deta hai.
बहुत ही प्रभावी एवं भावमय प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।
बिखरी हुई यादों को समेटे सुंदर भाव ...
उम्र के साथ मन के बदलते एहसास को जीती बहुत अच्छी कविता, शुभकामनाएँ.
यादों को संजोती कोमल भावपूर्ण रचना...
:-)
कभी हम खुद को खुद से दूर कर देते हैं।
bhaut hi marmsparshi evam bhavpurna rachna. sunder prastuti.
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