आज एक
दुष्कर्म पीड़ित की मौत नहीं हुई
मौत हुई है
एक सभ्यता की
एक संस्कृति की
नारी की अस्मिता की
हर मां मरी है बेवक्त
हर बहन का आंचल हुआ है तार-तार
दफन हुई हैं भावनाएं
वासना के कौफीन में
सारी चिरैया उड़ चुकी हैं
मां के आंगन से
तिनके चुगने भी नहीं उतरेंगी
धरा पर
कहीं फिर से ना फंस जाए
शिकारी के जाल में
इंसानों की बस्ती
यह वक्त नहीं विचार का
यह समय नहीं इंतजार का
क्रांति के लिए
समय मुकर्रर नहीं होता
समय आता है तो
हो जाती है क्रांति मुकरर्र
आज भी हम चुप रहे तो
मां भी सी लेगी अपनी कोख
बेबसी से
फिर नहीं जन्म देगी
किसी गुड़िया को
नहीं महकने देगी
मन के उपवन को
किसी कली से
जहां हर तरफ उगे हों कैक्टस
घिरी हों नन्हीं कलियां
बबूलों के अरण्य से
वहां कैसे चहचहाएंगी बेटियां
आज भी अगर नहीं जागे हम
जड़े रहें होंठों पर
खामोशी और भय के ताले
तो व्यर्थ जाएगी उसकी कुर्बानी
कभी नहीं महफूज हो सकेंगी
हमारी बेटियां
हमारी आधी दुनिया
आओ, उठाएं
गगन पर रखा इंद्र धनुष
और लिख दें
क्रांति की नई इबारत
चिरनिद्रा में सोने वाली
जाग रही है
करोड़ों भारतवासी की आंखों में
वो अनामिका समा गई है
आक्रोश बनकर
दिलों में
क्रांति बनकर
उतर आई है सड़कों पर
कहने
बस, अब और नहीं
दुष्कर्म पीड़ित की मौत नहीं हुई
मौत हुई है
एक सभ्यता की
एक संस्कृति की
नारी की अस्मिता की
हर मां मरी है बेवक्त
हर बहन का आंचल हुआ है तार-तार
दफन हुई हैं भावनाएं
वासना के कौफीन में
सारी चिरैया उड़ चुकी हैं
मां के आंगन से
तिनके चुगने भी नहीं उतरेंगी
धरा पर
कहीं फिर से ना फंस जाए
शिकारी के जाल में
आज अगर क्रांति नहीं आई
तो मुर्दा हो जाएगीइंसानों की बस्ती
यह वक्त नहीं विचार का
यह समय नहीं इंतजार का
क्रांति के लिए
समय मुकर्रर नहीं होता
समय आता है तो
हो जाती है क्रांति मुकरर्र
आज भी हम चुप रहे तो
मां भी सी लेगी अपनी कोख
बेबसी से
फिर नहीं जन्म देगी
किसी गुड़िया को
नहीं महकने देगी
मन के उपवन को
किसी कली से
जहां हर तरफ उगे हों कैक्टस
घिरी हों नन्हीं कलियां
बबूलों के अरण्य से
वहां कैसे चहचहाएंगी बेटियां
आज भी अगर नहीं जागे हम
जड़े रहें होंठों पर
खामोशी और भय के ताले
तो व्यर्थ जाएगी उसकी कुर्बानी
कभी नहीं महफूज हो सकेंगी
हमारी बेटियां
हमारी आधी दुनिया
आओ, उठाएं
गगन पर रखा इंद्र धनुष
और लिख दें
क्रांति की नई इबारत
चिरनिद्रा में सोने वाली
जाग रही है
करोड़ों भारतवासी की आंखों में
वो अनामिका समा गई है
आक्रोश बनकर
दिलों में
क्रांति बनकर
उतर आई है सड़कों पर
कहने
बस, अब और नहीं
15 टिप्पणियां:
उसका बलिदान व्यर्थ न जाय अब हर एक को यही सोचना और करना है ....
दामिनी के बलिदान को अश्रुपूरित नमन!
दामिनी के बलिदान को क्रांति बनाना होगा...
गहन भाव... आभार
बस, अब और नहीं,
बलिदान व्यर्थ न जायगा,एक दिन रंग दिखाएगा,,,
recent post : नववर्ष की बधाई
हम साथ हो गए एक एक करके ........... अनामिका को नाम मिला - अग्नि
अश्रुपूरित नमन..
बलिदान व्यर्थ ना जाये अब हमें यही सुनिश्चित करना है. यही श्रधांजली होगी हम सब की तरफ से.
उसके साहस को प्रणाम..
naari vimarsh ki jagrati ke is manch par hum mahilayo ko ek jut hona hi hoga .....
ab nahi to kabhi nahi jaago.. utho ur nayi chetna se annyaya ka saamna karo!!
दामिनी के बलिदान को अश्रुपूरित नमन!
गहन भाव. आभार
वह क्रान्ति साबित हुई है ...
कुछ भाव ऐसे ही मेरे भी थे,
क्या बोलूं, क्या लिखूं,
कलम चुपचाप रो रही है,
और धडकनें इंकार कर रही है,
धड़कने को,
हमारी हैवानियत ने ले ली एक जान,
और देखो,
हम फिर भी तैयार हो रहे हैं,
एक राजनीति तैयार करने को,
बजाय अन्दर बैठे हैवान को मरने को,
दामिनी तुम चली गयी,
अच्छा किया,
नहीं देख पाती तुम यह राजनीति,
लेकिन हम खड़े हैं, एकत्रित
हाथों में थामे मोमबत्तियां और मशाल,
एक नयी क्रांति की,
एक नए समाज की,
शुद्ध, स्वच्छ और परिष्कृत,
दामिनी,
तुम यूँ न भुला दी जाओगी,
करेगा इतिहास तुम्हे याद हमेशा,
एक क्रांति के रूप में,
हाँ दामिनी!!
-नीरज
सही कहा...
आज अगर क्रांति नहीं आई
तो मुर्दा हो जाएगी
इंसानों की बस्ती
क्रान्ति न सही क्रान्ति-बीज तो बनी दामिनी. शुभकामनाएँ.
वो अनामिका समा गई है
आक्रोश बनकर
दिलों में
क्रांति बनकर
उतर आई है सड़कों पर
कहने
बस, अब और नहीं----yahi to hona chahiyey
gehan bhaw ki rachna
अश्रुपूरित नमन..गहन भाव. आभार..
बहुत सुंदर रचना।
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धन्यवाद!
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