बादलों का एक भी टुकड़ा
नहीं बचा आंखों में
सावन-भादों में बनाए बांधों के द्वार
खोल दिये हैं मैने
अंतर में बसी भागीरथी
विलुप्त हो गई है सरस्वती-सी
पंछियों ने भी ढूंढ लिया है नया बसेरा
शाखों से पत्ते रिस रहे हैं रेत की तरह
सूखे पत्तों से नहीं लिख पाऊंगी
तुम्हारा नाम
तुम्हारी नमी खो चुकी है
समय की भट्ठी में
तुम अब
सुलग रहे हो मेरे दिल में
मेरी ही सांसें बनकर
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