सोमवार, 21 जून 2010

मीर तकी मीर साहब की गजल आपकी खिदमत में पेश है

मीर तकी मीर साहब की गजल

हस्ती अपनी हुबाब की सी है ।
ये नुमाइश सराब की सी है ।।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,
हर एक पंखुड़ी गुलाब की सी है ।

चश्मे-दिल खोल इस भी आलम पर,
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है ।

बार-बार उस के दर पे जाता हूँ,
हालत अब इज्तेराब की सी है ।

मैं जो बोला कहा के ये आवाज़,
उसी ख़ाना ख़राब की सी है ।

मीरउन नीमबाज़ आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है ।

हुबाब-बुलबुले, सराब-भ्रम, इज्तेराब- चिंता. नीमबाज- अधखुली

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मे-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरते-युसुफ़ है ये वक़्ते-अज़ीज़
मीर इसको रायगाँ खोता है क्या

कठिन श्ब्दों के अर्थ
राहे-दूरे-इश्क़----- इश्क़ के लम्बे रास्ते
सब्ज़-----हरी, सरज़मीं-----धरती
तुख़्मे-ख़्वाहिश -----इच्छाओं के बीज
वक़्ते-अज़ीज़------बहूमूल्य समय
रायगाँ------फ़िज़ूल--बेकार---व्यर्थ

साभार.....हिंदयुग्म

इमरोज-अमृता.......जीवन के कुछ पहलू, कुछ रंग

प्रस्तुत है.... प्यार के जाने-माने स्तम्भ इमरोज़जी से रश्मि प्रभा की मुलाकात के कुछ अंश। साभार-हिंदयुग्म

रोज की भागती ज़िन्दगी में आप क्या सोचते हैं? क्या महसूस करते हैं?

इमरोज़ - सुकून उसमें है जो आपके पास है
और जो मिला हुआ है
वो ज़िन्दगी का सुकून बन जाता है
पर जो भाग रहे हैं
वे बहुत कुछ चाहते हैं
बहुत कुछ
चाहत की दौड़ कभी ख़त्म नहीं होती
ये ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है
खाना सेहत बनाता है
पर ज़रूरत से ज्यादा खाना
ज़हर भी बन जाता है

आपकी चित्रकला का मुख्य केंद्र अमृता प्रीतम के अलावा और क्या रहा ?

इमरोज़ - मैं रंगों से खेलता हूँ
और रंग मुझसे
रंगों से खेलते खेलते
मैं भी रंग हो जाता हूँ
कुछ बनने ना बनने से
बेफिक्र बेपरवाह
कभी कभी खेलते खेलते
कुछ अच्छा भी बन जाता है
वो ही अच्छा मेरी पेंटिंग बन जाती है
मैं अपने लिए अपने आपको
पेंट करता हूँ

लोगों को सोचकर
मैंने कभी कुछ नहीं बनाया
लोगों को सोचकर कभी भी पेंटिंग नहीं हो पाती

एक प्रेमी से अलग आपकी क्या सोच रही?

इमरोज़ - मेरी सोच....
किताबें पढ़ने से लिखना पढना आ जाता है
और ज़िन्दगी पढ़ने से जीना
प्यार होने से प्यार का पता लगता है

सिंगलिंग्रों ने पढ़ाई तो कोई नहीं की पर ज़िन्दगी से पढ़ लिया लगता है. सिंगलिंग्रों की लड़की जवान होकर जिसके साथ जी चाहें चल-फिर सकती हैं, दोस्ती कर सकती हैं और जब वो अपना मर्द चुन लेती हैं. एक दावत करती हैं, अपना मर्द चुनने की ख़ुशी में. अपने सारे दोस्तों को बुलाती हैं और सबसे कहती हैं कि आज अपनी दोस्ती पूरी हो गई और उसका मनचाहा सबसे हाथ मिलाता है, फिर सब जश्न मानते हैं.

कुछ दिनों से ये दावत और ये जीने की दलेरी ये साफगोई मुझे बार बार याद आ रही है.
मेरे एक दोस्त को उम्र के आख़री पहर में मोहब्बत हो गई. एक सयानी उम्र की खूबसूरत औरत से, जो खूबसूरत कवि भी है, दोस्त आप भी मशहूर शायर है...मोहब्बत के बाद दोस्त की शायरी में एक खूबसूरती बढ़ने लगी है पर उसके घर की खूबसूरती कम होनी शुरू हो रही है !

जब किसी का घर से बाहर ध्यान लग जाता है, तो उसके घर का ध्यान टूट जाता है. वो पत्नी के पास बैठा भी, पत्नी के पास नहीं होता घर में होकर भी घर में नहीं होता अब घर भी घर नहीं लगता, पत्नी भी पत्नी नहीं लगती ! रिश्ता अपने आप छूट गया है, पर संस्कार नहीं छूंट रहे वो माना हुआ सयाना है , कॉलेज में फिलोसफी पढ़ाता रहा है - कई साल !

आस-पास के लोगों की मुश्किलें आसान कर देनेवाले को आज अपनी मुश्किल का हल मिलना मुश्किल हो गया है... ज़िन्दगी दूर खड़ी हैरान हो रही है !

मोहब्बत करनेवालों को जाने की राह नहीं नज़र आ रही ! राह तो सीधी है, पर संस्कारों के अँधेरे में नज़र नहीं आ रही! जब से पत्नी को मर्द की मोहब्बत का पता लगा है, वह हैरान तो है, मगर उदास नहीं !

पूछा सिर्फ हाजिर से जा सकता है, गैर हाजिर पति से क्या पूछना ? वह चुपचाप हालात को देख रही है और अपने अकेले हो जाने को मानकर अपने आपके साथ जीना सीख रही है !

मोहब्बत यह इलज़ाम कबूल नहीं करती कि वो घर तोडती है ! मोहब्बत ही घर बनाती है, ख्यालों से भी खूबसूरत घर... सच तो ये है कि मोहब्बत बगैर घर बनता ही नहीं.

पत्नी अब एक औरत है अपने आप की आप- जिम्मेदार और बदमुख्तियार चारों तरफ देखती है, घर में बड़ा कुछ बिखरा हुआ नज़र आता है !कल के रिश्ते की बिखरी हुई मौजूदगी और एक अजीब ख़ामोशी भी ....वह सब बिखरा हुआ बहा देती है !

और चीजों को संवारती है, सजाती है और सिंग्लिरी लड़की की तरह एक दावत देने की तैयारी करती है !

मर्द को विदा करने के लिए और विदा लेने के लिए जा रहे मर्द की मर्जी का खाना बनाती है, मेज़ फूलों से सजाती है, सामने बैठकर खाना खिलाती है.... वो ऑंखें होते हुए भी ऑंखें नहीं मिलाता !

जाते वक़्त औरत ने पैरों को हाथ लगाने की बजाय मर्द से पहली बार हाथ मिलाया और कहा- पीछे मुड़कर न देखना, आपकी ज़िन्दगी आपके सामने है और 'आज' में है, अपने आप का ख्याल रखना, मेरे फिकर अब मेरे हैं !

जो कभी नहीं हुआ वह आज हो रहा है. पर आज ने रोज़ आना है ज़िन्दगी को आदर के साथ जीने के लिए भी , आदर के साथ विदा लेने के लिए भी ....

अब बहुत कुछ बदल गया है , अब आपकी दिनचर्या क्या होती है ?

इमरोज़ - उसकी धूप में
और अपनी छाँव में बैठा
मैं अपनी फकीरी करता रहता हूँ ...
पता नहीं ये फकीरी मुझे ज़िन्दगी ने दी है
कि ज़िन्दगी देनेवाले ने...

अमृता जी के लिए क्या कहना चाहेंगे ?

इमरोज़ - सपना सपना होकर
औरत हुई
और अपने आपको
अपनी मर्जी का सोचा ...
फिक्र फिक्र होकर
कवि हुई
वारिस शाह को जगाया
और कहा- देख अपना पंजाब लहुलुहान ...
मोहब्बत मोहब्बत होकर
एक राबिया हुई
किसी से भी नफरत करने से
इनकार किया
और अपने वजूद से बताया
कि मोहब्बत किसी से भी नफरत नहीं करती

ज़िन्दगी ज़िन्दगी होकर
वो मनचाही हुई
मनचाहा लिखा भी
और मनचाहा जिया भी....
मैं अमृता पर
कितना भी बोल लूँ
अमृता अनलिखी रह जाती है ....

वो जब भी मिलती है
एक अनलिखी नज़्म नज़र आती है

मैं उस अनलिखी नज़्म को
कई बार लिख चुका हूँ
वो फिर भी अनलिखी ही रह जाती है

हो सकता है
ये अनलिखी नज़्म
लिखने के लिए हो ही ना,

सिर्फ जीने के लिए ही है ....

जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है?

इमरोज़ - हर जगह आदर
पहली तालीम होनी चाहिए
जो इस वक़्त कहीं नहीं
ना सोच में ना घर में ना ज़िन्दगी में
माँ बाप बच्चों के लिए आदर जानते ही नहीं
आदर करनेवाले माँ बाप हुकम कभी नहीं करते
स्कूलों में टीचर बच्चों के साथ
थप्पड़ों से गुस्से से
बच्चों का निरादर करते रहते हैं
आदर ना टीचरों में है ना किसी स्कूल के कोर्स में
आदर ज़िन्दगी का
एक खूबसूरत रंग भी है
हर मेल मिलाप हर रिश्ते का
लाजमी रंग और ज़रूरी अंग भी है
यहाँ तक कि
एक-दूसरे से विदा
होने के लिए भी आदर ज़रूरी है
और एक दूजे को विदा करने के लिए भी ज़रूरी ....
किसी को भी फूल देते वक़्त
कुछ खुशबू अपने हाथों को भी लगी रह जाती है ....
आदर रिश्तों की खुशबू है

आप तो आम लोगों से बिल्कुल अलग हैं, शांत,स्थिर ..... फिर भी जानना चाहूँगी क्या ज़िन्दगी में क्षणांश के लिए भी कोई शिकायत आपके मन को नहीं हुई?

इमरोज़ - एक छोटी सी शिकायत
जो बता सकते हैं
वो लोगों को क्यूँ नहीं बताते
कि पाप सोच करती है
जिस्म नहीं
गंगा जिस्म साफ़ करती है
सोच नहीं

शिकायत के लहजे में
कोई मुझसे पूछता है
कि मैं अपनी पेंटिंग पर
अपना नाम क्यूँ नहीं लिखता ?

मैंने कहा
मेरा नाम मेरी पेंटिंग का
हिस्सा नहीं बनता इसलिए......

वैसे किसी भी पेंटर का नाम
उसकी पेंटिंग का हिस्सा
कभी नहीं बना
जब कभी भी
मैंने शब्द तो बोले
पर अर्थ नहीं जिए

तब अपने आप से शिकायत होती रही है....

दूसरों से शिकायत करना
गुस्सा ही है
अपने से शिकायत अपनत्व

इमरोज़ - अमृता मेरे ख़्वाबों में नहीं आई

सीधी ज़िन्दगी में आ गई
वो बात और है
कि वो ख्वाब जैसी ज़िन्दगी है
उससे मिलकर मैं ज़िन्दगी को भी मिलता रहा
और साथ अपने आपको भी मिलता रहा
साथ मिलकर चलते चलते
अपने आप ज़िन्दगी राह भी होती रही
और मंजिल भी
एक दिन चलते चलते उसने पूछा
तेरा क्या ख्याल है
ज़िन्दगी सच है कि सपना
मैंने उसकी बोलती आँखों को देखकर कहा
ज़िन्दगी सपने जैसा सच भी है
पर तेरे साथ .....

रविवार, 20 जून 2010

न किसी की आंख का नूर हूं


यह अनमोल खजाना मुझे हिंदयुग्म के आवाज महोत्सव 2010 से मिला है। वैसे तो इसमें से दो नज्म रफी साहब ने गाई हैं और एक गजल बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी....मेंहदी हसन जी के साथ अन्य फनकारों ने भी गाई हैं। बहादुर शाह जफर के अलावा और भी शायरों की गजलें और नज्म हैं जो मैं आप तक जरूर पहुंचाऊंगी। हिंदयुग्म को धन्वाद......

बहादुर शाह जफर का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को हुआ था। वह अपने पिता अकबर शाह द्वितीय की मौत के बाद 28 सितंबर 1838 को दिल्ली के बादशाह बने। उनकी मां ललबाई हिंदू परिवार से थीं.

बहादुर शाह ज़फ़र भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्युहुई.

जफर न सिर्फ एक अच्छे शायर थे बलि्क मिजाज से भी बादशाह कम, एक शायर ज्यादा थे. मुगल सल्तनत के आखिरी ताजदार बहादुरशाह जफर अपनी एक गजल में फरमाते हैं-

या मुझे अफ़सरे-शाहाना बनाया होता
या मेरा ताज गदायाना बनाया होता
अपना दीवाना बनाया मुझे होता तूने
क्यों ख़िरदमंद बनाया न बनाया होता

यानी मुझे बहुत बड़ा हाकिम बनाया होता या फिर मुझे सूफ़ी बनाया होता, अपना दीवाना बनाया होता लेकिन बुद्धिजीवी न बनाया होता.


न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

पये फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चढाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुख की पुकार हूँ

(2)

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो अरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बदनसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में


(3)

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ए-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसे अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

उन की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
के तबीयत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी

अक्स-ए-रुख़-ए-यार ने किस से है तुझे चमकाया
ताब तुझ में माह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है "ज़फ़र" से हर बार
ख़ू तेरी हूर-ए-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

(4)

खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बग़ैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बग़ैर

मैं क्यूँकर कहूँ तुम आओ कि दिल की कशिश से वो
आयेँगे दौड़े आप मेरे घर कहे बग़ैर

क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बग़ैर

बेदर्द तू सुने ना सुने लेक दर्द-ए-दिल
रहता नहीं है आशिक़-ए-मुज़तर कहे बग़ैर

तकदीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ "ज़फ़र" है मुक़द्दर कहे बग़ैर

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

जीवन कलाकार का

चमक लो. थिरक लो
जितना चाहे आज
पूछूंगी कल
जब नहीं रहेगी यह चमक
नहीं थिरक सकेंगे
ये पांव
न बचेगा साज
न होगी आवाज
न बचेगी स्याही
कलम में
कुछ पन्नें होंगे खाली
जिसको इच्छा होगी
भरने की
अपनी ये हालत बताने की
पर नही बता सकोगे कल
पड़े रहोगे किसी कोने में
'आउट आफ डेट' हुए
फटे-पुराने कपड़ों की
गठरी की तरह
खांस-खांसकर
जीना मुहाल कर दोगे
घर वालों का
न होगा कोई रखवाला
कढ़िल-कढ़िलकर
दम तोड़ दोगे
टूट गाएगी वीणा
सिसकेंगे घुंघरू
हो सकता है मरने पर
तुम्हारा ये अछूता शरीर
रख दिया जाए
अंतिम दर्शन के लिए
फूल-माला पहना दें ये नेता
यह कहकर श्रद्धांजलि दें
यह है
कला जगत की अपूर्णीय क्षति
कुछ सालों बाद
राजनीतिक जरूरत आन पड़ने पर
हो सकता है
'पदमश्री' भी मिल जाए
लेकिन तब तक
तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा
अभावों में जी रहे होंगे परिजन
कोसेंगे तुम्हें
तुम्हारे कलाकार होने पर
क्योंकि
न जोड़ सके तुम एक दमड़ी
उनके लिए
न कर सके दायित्व पूरा
मुखिया होने का
क्या रखा है ऐसी कला में
या कलाकार के जीने-मरने में
इसीलिए कहती हूं
छोड़ दो ये जीवन
कमाओ दो जून की रोटी
स्वयं जैसा
भला नहीं है ये संसार
क्योंकि बाबू
यही है जग का नियम
यहां की रीति है करना
प्रणाम उगते सूऱज को
कोई सुधि नहीं लेता
ढलते सूरज की
डूबते सूरज का
पता लगता है तब
जब हो जाता है अंधकार
बजती हैं मंदिर की घंटियां
होती है अजान

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान

बच्चे राष्ट्र की शान
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट
चीथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें ....
मुस्काती हैं
बिलखते हुए
चलने का अभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों
चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये... मासूम नजरें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
लेकिन... आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके मुस्कराते चेहरे पर
जो खाई से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
होंठ
भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती हैं
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अन्त
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान

गुरुवार, 5 नवंबर 2009

क्योंकि मैं एक पवित्र नगरी..... बांके बिहारी लाल की जय

क्योंकि मै एक पवित्र नगरी मथुरा धाम से आया हूं। एक बार अपनी जिह्वा को पवित्र करके बोलिए बांके बिहारी लाल की जय। ये जयकारा था सारेगामापा लिटिल चैम्प हेमंत ब्रजवासी का। भइया हम और बाकी प्रतिभागी क्या किसी अपवित्र नगरी से हैं? हेमंत बबुआ क्या हमारे भारत के सारे राज्य और उनके सारे शहर अपवित्र हैं, केवल एक ही पवित्र नगरी बची है मथुरा। मथुरा को क्या वरदान मिला था कि कलियुग में एकमात्र नगरी मथुरा ही बचेगी जो पवित्र होगी। काशी वो नगरी है कहा जाता है जहां मात्र जन्म लेने पर सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। विश्वनाथबाबा के दशर्न से कठोर से कठोर पाप भी धुल जाते हैं। इंदौर वह नगरी है जिसके आस-पास महाकाल- ओंकारेश्वर जैसे पवित्र धाम हैं। कोलकाता, काली मां की पवित्र धरती । हमारे भारत में कौन सा ऐसा शहर है जहां किसी देवी-देवता का पवित्र धाम न हो, किसी भी धर्म का कोई न कोई धार्मिक स्थान जरूर होगा। ऐसे में किसी खास जगह का नाम लेना क्या क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना नहीं है? क्या हेमंत बाबू और उनके पिताश्री हमें बताएंगे कि जिह्वा को पवित्र कैसे किया जाता है ताकि हम अपनी इस अपवित्र जिह्वा को पवित्र कर सकें. लगे हाथ पापों से मुक्ति का मार्ग भी बताएं। बहुत से पापियों करा उद्धार हो जाएगा। ऐसे देखा जाए तो अपनी तो कोई नगरी नहीं क्योंकि मेरा जन्म हाथरस में हुआ, मोदीनगर, मेरठ, अमरोहा, रामपुर, मुरादाबाद, लखनऊ, बाराबंकी, इलाहाबद में रही, पली-बढ़ी। शादी के बाद दिल्ली, जम्मू, भोपाल, पानीपत, इंदौर, रही। इंदौर वह नगरी है जहां भगवान गणेश की बहुत मान्यता है। वहां कोई भी कार्य बिना खजराना गणेश मंदिर जाए बिना शुरू नहीं होता। अब आप ही बताएं मैं किस नगरी की हूं ताकि आपकी जिह्वा को मैं भी पवित्र करवाकर बुलवाऊं शाह विलायत शाह की जय, शाहमीना शाह दरगाह की जय, देश को काका, निर्भय, वीरेंद्र तरुण, बोहरा जी जैसे ख्याति प्राप्त कवि देने वाली एक मात्र रस वाली नगरी हाथरस की जय, देवा शरीफ बाबा की जय, खजराना वाले गणपति की जय या गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम कराने वाली नगरी इलाहाबाद की जय। शायद मेरा ज्ञान कुछ कम है। बस एक ही बात महत्वपूर्ण है कि हम हिंदुस्तान में रहते हैं। कोना कोई भी हो, है तो हिंदुस्तान ही न?

मुझे याद है जब पापा का तबादला अमरोहा हुआ तो स्कूल भी बदला। नई क्लास में मेरा परिचय कराया गया। पीरियड खत्म होने के बाद एक लड़की मेरे पास आई और बोली हलो, प्लीज टू मीट यू, माई सेल्फ इज आलसो कायस्थ, चलो क्लास में एक से दो हुए। तुम श्रीवास्तव और मैं सक्सेना। मेरी समझ में नहीं आया कि हम दोनो कायस्थ लड़कियां मिलकर कौन-सा तीर मार लेंगी। मैने घर जाकर पापा को बताया तो मेरे पापा ने कहा कि कह दिया होता मैं तो हिंदुस्तानी हूं और यही पहचान है मेरी। शायद वही सीख है कि मैं कभी जाति-क्षेत्रवाद में नहीं पड़ी। मैं हिंदुस्तान में रहती हूं और हिंदुस्तानी हूं। इंसानियत मेरा धर्म है, दोस्ती और प्यार मेरा ईमान।

आज तक हम क्यों क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, धर्मवाद, ऊंच-नीच इन सब विचारों से उबर नहीं पाए हैं? इन शब्दों पर क्यों हम अटक जाते हैं? क्यों हम आपस में बैर पाले हैं? क्यों अपने इर्द-गिर्द नफरतों का जाल बुनकर बैठे हैं?आपस के बैर में ईश्वर, खुदा, रब, गाड, अल्लाह, को अलग करके देखते हैं, उसकी सीख, प्यार, उसकी बनाई दुनिया को भूल गए। हमारे लिए हमारे खुद के बनाए नियम एहमियत रखने लगे, उस परमपिता परमेश्वर का अस्तित्व कुछ नहीं। प्यार करने के तरीके क्या अलग होते हैं? क्या हिंदुओं में अलग तरह से प्यार होता है और सिख, ईसाई, मुसलमानों में अलग तरह से, जैसे प्यार-प्यार होता है वैसे ही इबादत-इबादत होती है और प्यार तो खुद एक पूजा है। इंसानियत तो सबसे बड़ा धर्म है। हमारे रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन मंजिल तो एक है। फिर किसलिए किसी खास शहर, धर्म, भाषा का प्रचार? इसलिए मेरी गुजारिश है कि आने वाले कार्यक्रमों में क्षेत्रवाद को बढ़ावा न दिया जाए। हमने हिंदुस्तान में जन्म लिया है, हमें गर्व से कहना चाहिए कि हम हिंदुस्तानी हैं।