मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मैं खो गई थी कही

मैं खो गई थी कही
लेकिन कहां?
शायद तुममे?
तुम्हारी यादों में
तुम्हारे विचारों में
नहीं ..
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे या हमारे?
तुम्हारा जीवन
मेरा जीवन है
तो मैं खोई कहां?
तुममे खोकर ही तो
पाया है तुम्हे
मिली हूं खुद से
मैं पल-पल खोती हूं
फिर पाती हूं
स्वयं को
तुम्हारे अंदर
जीती हूं
तुम्हारे जीवन में
तुम्हारे साथ





लम्बे समय बाद पुन: आपके साथ हूं। यकीन मानिए या तो समय पंखों पर सवार था या जीवन चल रहा था कछुए की गति। यूं कहूं या तो समय आगे निकल गया या जीवन पीछे रह गया। दोनो ही सूरत में आप सबसे दूर रही। अब चाहे समय को पंख लगें या वो खुद सवारी करे और जीवन चाहे खुद ही क्यों न कछुआ बन जाए लेकिन दोस्तों कछुआ कभी नहीं हारता। सभी दोस्तों को आने वाले त्यौहारों-उत्सवों के लिए ढेर सारी, खूब सारी बधाइय़ां।

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

रविवार, 11 नवंबर 2007

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


नीचे वाला फोटो मैने लिया है। स्थान-आंकारेश्वर (इंदौर से 80 किमी खंडवा रोड पर), संगम घाट, 14 अक्टूबर 07


शनिवार, 10 नवंबर 2007

फूल


व्यक्तित्व बच्चों का

बच्चा भी
नहीं है आजाद
उससे ज्यादा है वजन
उसकी पुस्तकों का
खिलौने सा
हल्का नहीं है उसका जीवन
भार है उसके नन्हें कंधों पर
नपे-तुले टाइम टेबल का
तथाकथित
संपूर्ण शिक्षा का
जिसकी पूर्णता
रिक्त कर देती है
उसके बचपन को
नपे-तुले टाइम टेबल में
90 प्रतिशत नंबर लाने की होड़
खड़ा कर देती है उसे
छोटी सी उम्र में
प्रतियोगिता के क्षेत्र में
खोखला कर देती है
उसका जीवन
स्वाभाविक जीवन जीने से पहले ही
कांट-छांट कर
तराशा जाता है
एक मनचाहा आकार
जिसमें उसे
फिट होना ही है
चाहे फिट होते-होते
वह बिखर ही जाए
उसके नन्हें हाथों में खिलौने की जगह
होते हैं कंप्यूटर
आंखों में चमक की जगह
चढ़ा होता है चश्मा
तितलियां पकड़ने की जगह
वे जाते हैं
थोपी हुई हॊबी क्लासेज में
थ्योरी बनकर रह जाता है
इनका जीवन
नहीं कर पाते हैं प्रैक्टिकल
बालसुलभ क्रियाएं
ढल जाती हैं
सधे जीवन में
उम्र से ज्यादा अवस्था का ज्ञान
खोखला कर देता है
उनका व्यक्तित्व।

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान

बच्चे राष्ट्र की मुस्कान
पर कहां तक...कहां तक
सार्थक हैं ये शब्द
मुस्कानें
जो मुस्काने से पहले
ओढ़ लेती हैं कफन
अभावों का
भूखे पेट, चिथड़ों में लिपटी
ये मुस्कानें...
मुस्काती हैं
पर बिलखते हुए
चलने का आभास है इन्हें
नंगे पैर
गरम सड़कों, चुभते पत्थरों पर
रंगों को भी पहचानती हैं
ये...मासूम आंखें
कतरनों और चीथड़ों से
आंखों में तैरते हैं सपने
पर...आंसुओं के
लकीरें उभर आती हैं
इनके
मुस्कराते चेहरे पर
जो खांईं से भी
होती जाती है
गहरी...और गहरी
ओंठ भिंच जाते हैं
आंखें
सिकुड़ जाती है
शरीर की थिरकन
अकड़न बनकर
बर्बरता से
कर देती है अंत
उस बचपन का
जो है
इस राष्ट्र की
हमारे
प्यारे भारत की मुस्कान.