बुधवार, 9 सितंबर 2015

दोस्तों नमस्कार,
आज बहुत खुशी हो रही है आपसे मिलकर क्योंकि डेढ़ वर्ष बाद मेरा ब्लॉग खुला. ना जाने कितनी बार किस किसने यह प्रयास किया मगर मनीष जी के प्रयास से यह सम्भव हुआ. उनको बहुत-बहुत धन्यवाद....
आप लोगों से दूर रही ना ङी आपके ब्लॉग पढ़ पाई और ना ही अपनी रचनाएं आप तक पहुंचा पाई. अब यह सिलसिला नहीं टूटेगा. मुझे यकीन है आप सबका साथ अवश्य मिलेगा.....आपकी पुरानी दोस्त
वीना श्रीवास्तव


सोमवार, 23 मार्च 2015

http://neocounter.neoworx-blog-tools.net/

इसको कैसे हटाएं....प्लीज सहायता करिए. पोस्ट हो रहा है लेकिन ब्लॉग दिखता है फिर यही नियोकाऊंटर आ जाता है

जो भी समाधान हो वो कृपया
veena.rajshiv@gmail.com

पर दीजिए ताकि मैं अपना ब्लॉग देख सकूं....
मित्रों नमस्कार,
नए संवत् की सबको बहुत-बहुत शुभ कामनाएं...
काफी लम्बे समय बाद आपके साथ हूं. मेरा ब्लॉग ही नहीं खुलता. तुरंत 
http://neocounter.neoworx-blog-tools.net/
ये आ जाता है. बड़ी मुश्किल से पोस्ट कर पा रही हूं. इससे पहले भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुई. काफी समय से दूर हूं इसलिए ब्लॉग में हुए बदलावों के बारे में नहीं जानती. इसलिए अगर कुछ ऐसा है तो कृपया मुझे जरूर सूचित करें. मैं अब जरूर नियमित रहूंगी.

रविवार, 1 सितंबर 2013

मत बनाओ गगन का चांद


मैं
चाहती हूं
धरा पर रहना
तुम्हारे साथ
जीवन भर
अंतिम समय तक
मुझे मत बनाओ
गगन का चांद
रहने दो
अपनी बाहों में
देवी समझकर
मत अर्पण करो
पुष्प
मेरे कदमों पर
लगा दो

एक कली
मेरे बालों में
खिल जाने दो मुझे
फूल बनकर


वीना श्रीवास्तव

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

तमन्ना के रेगिस्तान...

तमन्ना के रेगिस्तान में उड़ते हैं रेत के बादल
गुबारों के बवंडर में मैं अब फंसना नहीं चाहत

ग़में इश्क ने सोखा है मेरे जज्बात का चश्मा
हसरतों के झरने में मैं अब बहना नहीं चाह
ती

सोमवार, 22 जुलाई 2013

पॉलिथीन विरोधी अभियान....

कल पॉलिथीन विरोधी अभियान के तहत चांदनी चैक स्थित हरि राम और लक्ष्मी गणेश अपार्टमेंट में गई और वहां सारे घरों से पॉलिथीन एकत्र किये. फिर शपथ ली कि आगे से पॉलिथीन का प्रयोग नहीं करेंगे... (




मंगलवार, 16 जुलाई 2013

बादलों का एक भी टुकड़ा...

बादलों का एक भी टुकड़ा
नहीं बचा आंखों में
सावन-भादों में बनाए बांधों के द्वार
खोल दिये हैं मैने
अंतर में बसी भागीरथी
विलुप्त हो गई है सरस्वती-सी
पंछियों ने भी ढूंढ लिया है नया बसेरा
शाखों से पत्ते रिस रहे हैं रेत की तरह
सूखे पत्तों से नहीं लिख पाऊंगी
तुम्हारा नाम
तुम्हारी नमी खो चुकी है
समय की भट्ठी में
तुम अब
सुलग रहे हो मेरे दिल में
मेरी ही सांसें बनकर