बिना सोचे समझे
चलती रही
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
मैने कहीं सुनी थीं
ये चार पक्तियां
वह पथ क्या-पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
यदि धाराएं प्रतिकूल न हों
मैं लेती रही
पग-पग पर
अपनी धैर्य परीक्षा
खुद ही बिछाती रही
शूल अपनी राहों में
देती रही चुनौती
अपनी कुशलता को
कुशलता और धैर्य के बीच
भूल गई स्वयं को
पिसती रही
दो पाटों के मध्य
नहीं समझ सकी
रोज नहीं होती परीक्षा
स्वयं को
साबित करने के लिए
आवश्यक नहीं
रोज परीक्षा से गुजरना
लेकिन जो जाना
वही है
जीवन का सार
धैर्य के साथ
कुशलतापूर्वक
खराब समय
निकालना ही है
हमारी जीत
हमारा ईनाम
समय है
सबसे बड़ी परीक्षा
जिससे गुजरना है
हम सबको
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
रविवार, 5 सितंबर 2010
उल्टी दिशा....
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45 टिप्पणियां:
आपको अध्यापक दीवस की बधाईया
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
मालीगांव
साया
एक बहुत ही सुन्दर कविता के लिए बहुत बहुत बधाई !
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (6/9/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com
शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
दिशा उल्टी हो या सीधी सही होनी चहिये, बिलकुल सही बात कही है
yah kavitaa aapki gahan anubhootiyon kaa pratiphal hai aisaa lagtaa hai....aise hi likhte rahiye....shubhechchhaa
बिना सोचे समझे
चलती रही
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
बहुत ही बेहतरीन रचना...... बहुत खूब!
सुन्दर रचना एवम् सशक्त अभिव्यक्ति ! बधाई एवम् आभार !
सुंदर रचना के माध्यम से प्रेरक सन्देश - बधाई
वीना जी,
मैं आप से सहमत हूँ कि दिशा उलटी हो या सीधी सही होनी चाहिए.
किन्तु सही दिशा का भान होने पर भी हम में से कितने लोग प्रचलित धारणा या कहें तो धारा/दिशा के विपरीत चलने का सहस रखते हैं?
आप मुझ से वरिष्ठ और अनुभवी हैं आप के ब्लॉग पर उपलब्ध समस्त रचनाएँ मुझे रुचिकर लगीं.
स-सम्मान
यशवंत माथुर
www.jomeramankahe.blogspot.com
bahoot hi sunder kavita veena ji
bahut sahi kaha aapne.
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
-यही महत्वपूर्ण है.
चर्चा मंच पर शामिल किए जाने और हौसला बढ़ाने के लिए वंदना जी आपको धन्यवाद।
सुरेंद्र जी, संतोष जी और जय शंकर जी आप सभी का अपनी अनमोल राय देने का शुक्रिया
सुरेंद्र जी, संतोष जी और जय शंकर जी आप सभी का अपनी अनमोल राय देने का शुक्रिया
नानू जी जब दिल में कुछ भावनाएं मचलती है तभी उन्हें शब्दों के वस्त्र पहनाए जाते हैं...
शाहनवाज जी, साधना जी, राकेश जी, उपेंद्र जी, पवन जी,उड़न तश्तरी जी आप सभी ब्लॉग पर आए व हौसला बढ़ाया,उसके लिए धन्यवाद
आपने ठीक कहा यशवंत जी कि सही दिशा का भान होने पर भी कितने लोग विपरीत दिशा में चल पाते हैं? पहला सवाल हिम्मत दिखाने का है अगर आज विरोध दर्ज करने की शक्ति है तो कल कदम भी उठ जाएगा। धाराएं मोड़ना आसान नहीं है...
आपके ब्लॉग पर आई निश्चित रूप से एक बहुत अच्छा ब्लॉग...बहुत अच्छा लिखती हैं। बधाई
वीणा,मैं सोचता हूँ कि इस गहन आध्यात्मिक अर्थों वाली कविता को और बेहतर रूप में और भी सारगर्भित रूप में व्यक्त किया जा सकता था...अगर आपने थोडा और ठहरकर थोडा इस पर चिंतन किया होता तो यह बड़ी प्यारी कविता हुई होती सच....खैर इस कविता के बहाने इक सच से साक्षात्कार कराने का शुक्रिया...!
एक बेहतरीन व सोचनीय रचना.
--
भूतनाथ जी जब मन में कुछ ख्याल आते हैं तो ठहरा नहीं जाता...उसे शब्द दिये जाते हैं...यूं तो जिंदगी रोज ही कुछ न कुछ सिखाती है और आपकी सोच बदलती है...कविता सोचकर नहीं लिखी जाती..कभी लिखना भी चाहो तो सोचकर कुछ भी नहीं लिखा जा सकता, कम से कम मेरे साथ तो यही होता है। केवल सुधारा जा सकता है...व्याकरण के स्तर पर। जहां तक सच से साक्षात्कार कराने की बात है तो जानते सभी हैं पर मानने में कोताही बरतते हैं और अपनी ही दिशा को सही ठहराने में सारी ऊर्जा लगा देते हैं। आपने अपनी बहुमूल्य राय दी उसके लिए शुक्रिया। उम्मीद है आगे भी अपनी राय अवश्य देंगे....धन्यवाद। वर्तनी का ध्यान रखना चाहिए। कुछ गलतियां भूल से हो जाती हैं, जल्दीबाजी में भी होती हैं जैसे मुझसे हुई थी तो मैने वो टिप्पणी हटा दी। टिप्पणी जो हटी हैं वो किसी मित्र की नहीं बल्कि मेरी अपनी ही थी।
८ सितम्बर २०१० १
ज़िन्दगी एक चनौती एक इम्तिहान ही है..कोई पास कोई फेल
sundar rachna!
ati sundar..........shubhakamnaye
वीणा के सुर!
हाँ
ये वीणा के सुर
मैंने देखे हैं
लिपि बद्ध
सजे हुए हैं जो
शब्दों के साज पर
और
कह रहे हैं
आओ कुछ गुनगुना लें
हम!
वीना जी
आप ने भूतनाथ जी को जो प्रत्युत्तर दिया है कि कविता कुछ सोचकर नहीं लिखी जाती ये बात मेरे ऊपर भी लागु होती है.हाँ एक डर जरूर रहता है कि कहीं अर्थहीन न हो जाए.कविता हमारे मनोभावों की सरस अभिव्यक्ति है.शायद यही सोच कर मैंने अपने ब्लॉग का नाम 'जो मेरा मन कहे' रखा है.
यशवंत जी आपने जो कविता के रूप में टिप्पणी की है बहुत ही सुंदर है...मुझे वाकई बहुत अच्छा लगा...उत्साह दोगुना हो गया...
yahaan aakar achcha laga.... ulti disha key kya kehney.....
सुन्दर कविता..ब्लॉग पर मेरा हौसला बढाने का धन्यवाद ..
kya-karu.blogspot.com
डिम्पल जी, पारुल जी, एना जी,वीके जी और साकेत जी आप सब ब्लॉग पर आए और टिप्पणी करके जो उत्साह बढ़ाया उसके लिए आप सबका शुक्रिया...उम्मीद है आगे भी स्नेह बनाए रखेंगे...
यशवंत जी आपके ब्लॉग का नाम बहुत अच्छा है और जहां तक कविता या किसी भी प्रकार की रचना की बात हो...मेरा मानना है कि सोचकर लिखना शायद ही कोई कर सकता हो, वैसे यह गुण भी किसी न किसी में होगा पर मुझमें नहीं है .. अच्छा लगा जानकर कि आपके साथ भी यही होता है क्योंकि भाव तो वह स्त्रोत हैं जो स्वत: ही फूटते हैं...
धन्यवाद।
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए....jeevan ko gahanta se samajhne ke baad hi yah anubhuti ho sakti hai...bahut sundar...
http://sharmakailashc.blogspot.com/
I came out of my trans ,of my depression .These lines are very encouraging ,fills life with vigour and vitality .
behad prerak prasang si ,jivan me ullaas si ,bharti rahin oz, mere jivan avsheshon me ,main ,haan, main ,to ,kabkaa mar chukaa thaa .tum aaye kavitaa bankar ,sanjivnee soonghaakar chale gye .
behad ki khoobsoorat prastuti .kalam tod di .jhakjhod diyaa mere astitv ko ,aakhir main bhi to aisaa hi thaa .
veerubhai
4C ,Anuradha,NOFRA ,Navy Nagar ,Colaba ,Mumbai 400 -005
09350986685 /0916 7361 634
बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति .
इस नारे के साथ कि...... चलो हिन्दी अपनाएँ
आप सभी को हिन्दी दिवस पर शुभकामनाएँ
आपको बधाई और आभार
आपकी रचना पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई। बधाई।
-डॉ० डंडा लखनवी
... बहुत सुन्दर !!!
वाह बहुत सुन्दर भाव हैं इस कविता के ...यह अब तक कैसे नहीं पढ़ी ????? शुक्रिया यहाँ तक लाने का ..:):)
इस पृष्ठ की सारी कविताएँ पढ़ ली हैं ... ब्लोग्स पर कभी कभी वर्तनी की अशुद्धि गलत टाइपिंग के कारण भी हो जाती है ...पर फिर भी सुधारना ज़रूरी है ...
आपकी सारी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं ...
जीवन का दूसरा नाम संघर्ष है। सचिन तेन्दुलकर के "रनों का पहाड़" एक दिन में नहीं बना। उसके पीछे उसकी कड़ी मेहनत, धैर्य और आधा जीवन खपा है। जो कड़ी मेहनत और धैर्य के साथ समय का सदुपयोग करते हैं, वे सफल होते हैं। शेष अपनी असफलता पर बहाने तलाशते रहते हैं। व्यक्ति के जीवन में उसकी मनचाही सौगातें प्राप्त करने के अवसर आते हैं। बीज-रूपी संकल्प को फल फल बनने तक व्यक्ति को प्रतीक्षा करनी होती है। मनचाही मुरादें प्राप्त करने कोई और सार्ट-कट तरीका नहीं है। ऐसा मेरा अनुभव है।
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं
कैलाश जी, वीरू भाई जी,वीरेंद्र जी,डंडा लखनवी जी, उदय जी और संगीता जी आप सबका ब्लॉग पर स्वागत और अपनी बहुमूल्य राय देने के लिए शुक्रिया
वीना जी,
मैं आप से सहमत हूँ कि दिशा उलटी हो या सीधी सही होनी चाहिए.
Very nice kavita........
bahut sunder abhivyki.......
beena mai pooree tour par sahmat hoo aapse jub kuch likhane ka man hota hai badalee ghumad aatee hai jo
kavita ke roop me baras ke hee chain letee hai........
Aabhar.
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