रविवार, 19 सितंबर 2010

अधिकार कैसा...?

जब भी तुम्हारे नाम
कुछ करना चाहा
तय नहीं कर पाई
क्या करूं
दिल में
सांसों में
धड़कनों में
जीवन में भी
तुम हो
मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?

56 टिप्‍पणियां:

Ramu ने कहा…

वाह क्या बात है...

जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

क्या बात है ...समर्पण इसी को तो कहते है|
ब्रह्माण्ड

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

माना कि हम दोनों एक दूसरे को बखूबी समझते हैं फिर भी शायद मैं तुम्हारी अपेक्षाओं को ठीक से समझ नहीं सकी हूँ मगर मेरा जो भी कुछ है तुम उसमे बराबर के सहभागी हो सिर्फ मेरा ही एकाधिकार नहीं है.
आप की इस कविता का शायद यही भावार्थ है.
समर्पण की भावना दोनों तरफ से ऐसी ही होनी चाहिए.

Asha Lata Saxena ने कहा…

सुंदर भाव लिए रचना |बधाई
आशा

Babban K Singh ने कहा…

lajwaab!

संजय भास्‍कर ने कहा…

जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा

......वाह क्या बात है
veena masi ji, vakai bahut khubsurat panktiyan hai.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

समर्पण कि पराकाष्ठा ..सुन्दर रचना .

Shah Nawaz ने कहा…

बेहद खूबसूरत!

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

रामू जी,राणा प्रताप जी,राजभाषा हिंदी,यशवंत जी,आशा जी, बब्बन जी, संजय जी, संगीता जी और साह नवाज जी...आप सबका बहुत-बहुत घन्यवाद

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

यशवंत जी..सच है समर्पण भावना दोनों तरफ से होनी चाहिए...लेकिन यहां बात इतनी-सी है कि एक नारी यह कह रही है कि वह अपने प्रेमी, अपने जीवन साथी को बहुत कुछ देना चाहती है लेकिन जब अपनी सांसें, अपना जीवन सब कुछ उसे दे चुकी है..अब उसके जीवन और सांसों पर उसका अधिकार कहां..जब अधिकार नहीं तो अब क्या दे सकती है जो भी है उस पर उसके जीवन साथी का ही अधिकार है...बस यही प्यार है...

बेनामी ने कहा…

sahi baat hai...
jo apna nahi to adhikaar kaisa...
----------------------------------
मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
जरूर आएँ...

बेनामी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Kailash Sharma ने कहा…

मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?
.....बहुत सुन्दर .....प्रेम और समर्पण की इस पराकाष्ठा तक पहुंचना वास्तव में एक महान उपलब्धि है ......

ओशो रजनीश ने कहा…

मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?
.....बहुत सुन्दर ....

इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

बेनामी ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत रचना...भावपूर्ण और दिल को छूती

shalusri ने कहा…

इसी को तो कहते हैं समर्पण...खूबसूरत रचना...अच्छी प्रस्तुति

बेनामी ने कहा…

जो अपना नहीं
उस पर अधिकार कैसा?

beautiful lines...its true love

vijay ने कहा…

manohaari bhaav, sunder rachna

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

शेखर सुमन जी, कैलाश जी,डा.रूपचंद जी, ओशो रजनीश जी, पूजा जी, शालू जी, शान जी, विजय जी आप सबको अपना समय निकालकर यहां आने और हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

शेखर सुमन जी, कैलाश जी,डा.रूपचंद जी, ओशो रजनीश जी, पूजा जी, शालू जी, शान जी, विजय जी आप सबको अपना समय निकालकर यहां आने और हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद

दीपक बाबा ने कहा…

यह बे-मतलब का अधिकार ही तो समझ नहीं आता.

अच्छी कविता है.

अजय कुमार झा ने कहा…

ओह इतना समर्पण ..इतनी शिद्दत....अब क्या कहें इससे ज्यादा ...कम में आपने सब कुछ ही तो कह डाला है

Unknown ने कहा…

sunder hai

mridula pradhan ने कहा…

saaf sundar.achchi lagi.

monali ने कहा…

Aur jisko sab kuchh samarpit kia ho agar wo bhi apnaa na rahe tab.... shayad dukh ki parakaashtha hoti ho tab... sundar kavita...

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

राग में त्याग की
पराकाष्ठा सराहनीय है।
सद्भावी डंडा लखनवी-डॉ०
--------------------------

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

बिलकुल सही फरमाया.

:):)

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

दीपक जी यह बे-मतलब का अधिकार ही तो शायद आप न समझ पाएं

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

अजय जी, पूर्वीय जी, मृदुला जी,मोनाली जी, डा.डंडा लखनवी जी,अनामिका जी बहुत -बहुत धन्यवाद...सच में बहुत अच्छा लगता है जब अपनी रचना की सराहना होती है..लगता है मेहनत सफल...

Rahul Rathore ने कहा…

बढ़िया लिखा है ....

अजय कुमार ने कहा…

गहरे प्रेम की उत्तम अभिव्यक्ति ।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

दो बदल इक प्राण हैं..कर्तव्य क्या! अधिकार क्या!
...सुंदर भाव हैं कविता के।

Dr.Ajit ने कहा…

अधिकार कैसा? सम्वेदना भी खुब और शिल्प भी दमदार। प्रभावित हुआ हूँ
....


डा.अजीत
www.shesh-fir.blogspot.com
www.monkvobes.blogspot.com
www.paramanovigyan.blogspot.com

कुमार संतोष ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
कुमार संतोष ने कहा…

वीणा जी बहुत ही सुन्दर रचना !

ANAL KUMAR ने कहा…

'अधिकार कैसा' पढ़ी तो फिर आपकी बाकी कविताओं को पढ़ने के लिये उत्सुक हुआ | मुझे अफ़सोस हुआ कि आपकी कविताओं से पहले परिचित क्यों नहीं हो सका ? आपकी कविताओं में गहन आत्मालोचन है, जो कविताओं को अधिक मर्मस्पर्शी बनाता है | निजी भावनात्मक प्रसंगों को आपने जिस ऐन्द्रियता, ऐन्द्रिय संवेदना और तत्जनित आवेग से संयोजित किया है - उससे आपकी कविताएँ प्रभावी बन सकीं हैं |
'तुम और मैं' संग्रह कहाँ से उपलब्ध हो सकता है ?

रचना दीक्षित ने कहा…

मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?
वाह क्या बात है "मेरा मुझ में कुछ न रहा "

Manish aka Manu Majaal ने कहा…

महोब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देख जीतें है, जिस काफ़िर पे दम निकले ... !

ग़ालिब के इस कलाम को आपने अपने अलग अंदाज़ में मकम्मल कर दिया.. बहुत खूब.. लिखते रहिये ..

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

निर्मला कपिला ने कहा…

जीवन में भी
तुम हो
मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?
वीना जी, चंद शब्दों मे ज़िन्दगी का फलसफा? कमाल है दिल को छू गयी आपकी रचना। शुभकामनायें।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

श्याम जुनेजा ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ..लेकिन, भावार्थ के साथ सहमति नहीं बैठ रही ..इसी इकतरफा समर्पण नें तो आदमी लोगों के दिमाग खराब कर रखे हैं ..क्या अपने आस पास होने वाली स्त्रियों की दुर्दशा नहीं दिखाई दे रही ?
हम सबको आत्म-केंद्रित चिंतन से मुक्त होना पडेगा..मेरी बातें आमले की सी खट्टी लगेंगी लेकिन..
"अरे उठो तनों अकडो अमर बेली तरह मत लिपटो जड़ पकड़ो--धूमिल"

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gahre bhawon ko arth diya hai....
apni rachna 'ulti disha' vatvriksh ke liye bhejen
rasprabha@gmail.com per

रूप ने कहा…

बहुत सुन्दर, खूबसूरत कविता है आपकी, पर क्या वाकई, खुद पर अधिकार नहीं...................

सदा ने कहा…

जीवन में भी
तुम हो
मेरा कुछ भी नहीं
जो अपना नहीं
उस पर
अधिकार कैसा?

बहुत ही भावमय प्रस्‍तुति ।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब रचना...वाह...

नीरज

Amit K Sagar ने कहा…

बहुत सही कहा. बढ़िया रचना.

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

अजय जी, राहुल जी,बेचैन आत्मा,डा. अजीत, संतोष जी,अनल जी,रचना जी,मजाल जी, राजभाषा हिंदी, निर्मला जी, मनोज जी, श्याम जी, रश्मि जी रूप जी,नीरज जी, सदा जी और अमित जी आप सभी का टिप्पणी कर प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

अनल जी
आप ब्लॉग पर आए और प्रोत्साहित भी किया, बहुत-बहुत धन्यवाद। 'तुम और मैं' की सारी प्रतियां काफी पहले ही खत्म हो चुकी हैं। उसका संशोधित संस्करण आना है लेकिन मैं अपने अगले संग्रह में व्यस्त रही इसलिए वो अभी दोबारा नही छपा है...आने वाले संग्रह के बाद एक लम्बी कविताओं का संग्रह आएगा फिर पहले वाले संग्रह पर काम करूंगी...जैसे ही दूसरा संग्रह आएगा मैं आपको जरूर बताऊंगी....उम्मीद है आप अपना सहयोग, स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखेंगे....सादर

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

श्याम जी आपका कहना ठीक है मगर मैं दूसरों के दोष की सजा अपने प्यार को कैसे दे सकती हूं। मैं हर उस महिला के साथ हूं और मेरे सामने इस तरह की कोई भी बात आती है तो मैं समझाती भी हूं और महिला विशेष का पूरा साथ देती हूं...और यह केवल कहने की बात नहीं है करने की भी है। मैं किसी महिला की दुर्दशा कैसे देख सकती हूं लेकिन जो लिखा है उसे दिल से महसूस किया है और यह एकतरफा भी नहीं है...दूसरे पुरुषों के किये की सजा मैं उसे कैसे दे सकती हूं जिसका दोष ही न हो...मुझे लगता है अब आप मेरी भावनाओं से सहमत होंगे...

जय शंकर ने कहा…

kya baat hai. bahut sundar.

daanish ने कहा…

समर्पण भाव से पूर्ण
बहुत अच्छी प्रस्तुति ...
अभिवादन .

खुश ने कहा…

ये भक्ति की आधुनिक अभिव्यक्ति है...

Unknown ने कहा…

खुश जी ने बहुत महीन बात कही है। वीना जी अपनी अभिव्यक्ति को शब्द देते रहिए....

बेनामी ने कहा…

जज़्बात पर आपकी टिप्पणी का तहेदिल से शुक्रिया..........छोटी , किन्तु सुन्दर रचना है आपकी|

कभी फुर्सत में हमारे ब्लॉग पर भी आयिए-
http://jazbaattheemotions.blogspot.com/
http://mirzagalibatribute.blogspot.com/
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एक गुज़ारिश है ...... अगर आपको कोई ब्लॉग पसंद आया हो तो कृपया उसे फॉलो करके उत्साह बढ़ाये|

अनुपमा पाठक ने कहा…

nice expression!
regards,