कभी नहीं सोते
नदी के किनारे
कभी रोते हैं
कभी मुस्कराते हैं
अट्ठहास करते हैं
कभी सब कुछ
लील जाते हैं
कभी शांत रहकर
आसपास बिखरे
सौंदर्य को निहारते हैं
जीवन देने वाला नीर
चट्टानों से टकराकर
गिरते-पड़ते
चोट खाकर भी
नहीं होता लहू-लुहान
ताकि हमें दे सके
जीवन
और हम
अपने जीवन का मैल
बेशर्मी से
मिला रहें हैं
उसी सरिता में
जिससे पलता है
हमारा जीवन
नदियों का फैला
वक्ष स्थल
चाहे उसमें
दूध हो या न हो
उसके स्तन
चाहे सूख गये हों
हमें विश्वास है
दूध का
एक कतरा भी
हमें पवित्र कर देगा
हमारे पाप धो देगा
बहते जल में
सब कुछ
हो जाता है पवित्र
पापों को धोना है
उसके जीवन का उद्देश्य
पाप करना
हमारा
जन्म सिद्ध अधिकार
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
नदी के किनारे
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
जीवन के चार आधार स्तम्भ
काम, क्रोध,लोभ, मोह
जीवन के चार
आधार स्तम्भ
सभी का जीवन
चलता है
इन्हीं के सहारे
जीवन की प्रत्येक
गति, नियति
होती है नियंत्रित
इसी से
पाप-पुण्य के कारण हैं
यही विकार
कर्मों की सजा और फल
मिलते हैं
इन्ही चार में से
किसी एक के कारण
कितने ही युद्ध हुए
निर्दोषों का खून बहा
अस्मत खिलौना
बन गयी
जीवन भर
इन्ही चार के हाथों
खेलते रहे हम
ये नचाती रहीं हमें
कठपुतली बनाकर
आंखों पर
चढ़ी रही पट्टी
कभी काम- क्रोध की
कभी लोभ-मोह की
कभी नहीं
निकल सके बाहर
इनके चंगुल से
इसीलिए
अंतिम यात्रा में भी
मिलता है
इन्हीं चार का सहारा
औरों को सम्भवत:
अपने सशक्त होने का
कराती है आभास
जीवन के प्रारम्भ से
अंत तक
जूझता है व्यक्ति
इन्हीं चार से
नहीं उबर पाता
शायद......
मैं भी न उबर पाऊं
तीन पर तो
विजय पाना है आसान
कैसे त्याग सकूंगी
तुम्हारा मोह
जिसके साथ
जीवन गुजारा
प्यार के चमन में
कभी चहके
पंछी बनकर
कभी खिले
फूल बनकर
पुनर्जन्म हो .. ..
तो यही प्रार्थना है
कोई भी योनि मिले
साथ और प्यार
तुम्हारा मिले
इसलिए नहीं चाहती
मेरी अंतिम यात्रा को मिले
चार कंधों का सहारा
मेरे लिए काफी है
तुम्हारी
बाहों का सहारा
सोमवार, 12 जुलाई 2010
सोने का पंख
रविवार, 11 जुलाई 2010
तुम नहीं तो.....
तुम नहीं
तो ये
बहार, पानी
झरनें, पेड़-पौधे
बेमानी हैं
ये उड़ती तितलियां, घटाएं
चली जाती हैं
मन को
चंचल किये बिना
ये फूल, ये खुशबू
नहीं महकाती जीवन
इंद्रधनुष भी
नहीं भरता रंग
जीवन में
तुम नहीं
तो बेकार है जीवन
तुम्हारे सुरों के बिना
हर गीत है अधूरा
अधूरी सरगम
नहीं करती
कोई गीत पूरा
मेरे लिए
जीवन, गीत
रचना का पर्याय
तुम
मेरा दूसरा ब्लॉग शिकजी को भी अवश्य देखें और उत्साह बढ़ाए
आस का पंछी.....
आस का पंछी
अभी उड़ा नहीं है
छत की मुंडेर पर है
मैं कितनी निराश थी
जब वो
उड़ गया था
छत से
लौटा नहीं था रात भर
उलझनें उलझ रही थीं
मकड़ जाल में
आस को
डस लिया था
अंधकार ने
रात भर झेलती रही
प्रसव पीड़ा
विश्वास का
हो गया था गर्भपात
न बीत रही थी
निशा
न लौट रही थी
आस
भोर की प्रतीक्षा में
बहता रहा रक्त
लेकिन...
प्रभात बेला
ले आई थी
प्रकाश की किरणें
आस के पंछी को
वापस
मेरी छत पर
मैने उसे
बंदी बना लिया
मन में
समा गया वो
विश्वास बनकर
जो अब नहीं डूबता
सूरज के साथ
नहीं बदलता
मौसम की तरह
मैंने भी अब
आजाद कर दिया
आस के पंछी को
स्वच्छंद उड़ान के लिए
विश्वास है
कहीं भी
कितना भी उड़े
वापस आएगा
कभी नहीं जाएगा
मुंड़ेर छोड़कर
शनिवार, 10 जुलाई 2010
मैं कोई इतिहास नहीं रच सकी......
सभी मित्रों को हौसलाअफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया
मैं कोई इतिहास
नहीं रच सकी
यूं कहूं
बना नहीं सकी
दोनों में फर्क है
रचना समझते, बूझते
होशो-हवास में
की जाती है
बनता-बिगड़ता
अपने आप है
कब, किस समय
हम क्या कर गुजरें
और इतिहास बन जाए
वर्तमान की नियति है
इतिहास बनना
वर्तमान से गुजर कर ही
पन्नों पर
चमकती है स्याही
मगर मैं
न कुछ रच सकी
न कुछ बन सका
मैं भी बनूंगी इतिहास
लेकिन
नहीं चमक सकूंगी
स्याही बनकर
पन्नों पर
कोई नहीं दोहराएगा
इस जीवन की कहानी
कुछ निशानियां
छोड़ूंगी जरूर
जो करेंगी याद
अपनी निशानियों के
होने तक
मंगलवार, 22 जून 2010
तुमने कहा था......
कल आपके लिए मीर तकी मीर साहब की गजल प्रस्तुत थी आज मेरी एक कविता है.....
तुमने कहा था
तुमने कहा था
कभी आत्म विश्वास
मत खोना
मैं हूं तुम्हारे साथ
मैं चलती रही
अंगारों पर
तूफान में घिरी
नाव का तरह
खाती रही हिचकोले
टकराती रही
चट्टानों से
लड़ती रही
लहरों के थपेड़ों से
लड़ते-लड़ते
हो गया चूर
आत्म विश्वास
तुमने कहा था
कभी मत हारना
मैं चोट खाती गई
खेलती गई
जुआरी की तरह
उम्मीद में
कुछ मिलने की
मैं हार गई
जीवन का जुआ
लेकिन
नहीं बनी युधिष्ठिर
तुमने कहा था
कभी मत थकना
मैं चलती गई
रात-दिन, सर्दी-गर्मी
सब कुछ सहती गई
पांव के छाले फूटकर
बन गए घाव
लेकिन उन्हें
नहीं बनने दिया नासूर
तुमने कहा था
कभी झूठ मत बोलना
मैं घिरती गई
षडयन्त्रों के जाल में
खाती रही मार
वक्त की
संघर्ष करती रही
हरिश्चंद्र बनने के लिए
तुमने कहा था
किसी का
बुरा मत करना
मैने चुपचाप सहे
गैरों के ताने
अपनों से मिला अपमान
जख्मों पर मरहम लगाए
करती रही प्रयास
अच्छा करने का
तुमने कहा था
इंसान बनना
इस झूठी दुनिया में
जहां पाप फलता है
सच जलता है
भावनाएं हाथ मलती हैं
इंसान खलता है
मैने खुद को
नहीं बनने दिया हैवान
निराश भी नहीं हूं
लडख़ड़ाई थी एक बार
नहीं गिरूंगी बार-बार
तुम साथ हो तो
फिर पनपेगा
आत्म विश्वास
जीत हमारी होगी
लड़ूंगी जीवन से
सच के लिए
अंतिम सांसों तक
और बनूंगी इंसान
क्योंकि.....
तुमने कहा था