आस का पंछी
अभी उड़ा नहीं है
छत की मुंडेर पर है
मैं कितनी निराश थी
जब वो
उड़ गया था
छत से
लौटा नहीं था रात भर
उलझनें उलझ रही थीं
मकड़ जाल में
आस को
डस लिया था
अंधकार ने
रात भर झेलती रही
प्रसव पीड़ा
विश्वास का
हो गया था गर्भपात
न बीत रही थी
निशा
न लौट रही थी
आस
भोर की प्रतीक्षा में
बहता रहा रक्त
लेकिन...
प्रभात बेला
ले आई थी
प्रकाश की किरणें
आस के पंछी को
वापस
मेरी छत पर
मैने उसे
बंदी बना लिया
मन में
समा गया वो
विश्वास बनकर
जो अब नहीं डूबता
सूरज के साथ
नहीं बदलता
मौसम की तरह
मैंने भी अब
आजाद कर दिया
आस के पंछी को
स्वच्छंद उड़ान के लिए
विश्वास है
कहीं भी
कितना भी उड़े
वापस आएगा
कभी नहीं जाएगा
मुंड़ेर छोड़कर
4 टिप्पणियां:
कितना भी उड़े
वापस आएगा
कभी नहीं जाएगा
मुंड़ेर छोड़कर
सटीक !!
nirash na ho.........din laut kar aayenge.... bahut sundar kavita
संगीता जी बहुत-बहुत धन्यवाद
एना जी उत्साह बढ़ाने के लिए धन्यवाद
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