सोमवार, 12 जुलाई 2010

सोने का पंख

कौन पक्ष है
कौन विपक्ष
चट्टे-बट्टे हैं
एक ही थैली के
सबको चाटना है
आज
हमारी बारी है
कल तुम्हारी बारी
आएगी अवश्य
सब्र से काम लो
देश को चटना है
हमारे ही हाथों
चिंता क्यों करते हो ?
आज नहीं तो कल
इस सोने की चिड़िया का
एक पंख
तुम्हें भी मिलेगा
सब्र का फल
मीठा होता है
हो सकता है
तुम्हें सारे पंख ही मिल जाएं
तुम पूरा 'पर' ही नोच लो
दर्द, टीस कहां है
इस 'सोने की चिड़िया' में
'जान' होती
तो क्या
'पर' नुचवाती
बेजान हो गई है
ये 'सोने की चिड़िया'
कायर हो गए हैं
इसके रखवाले
अब तो
हमारा ही राज है
हम चाहे पक्ष के हों
या विपक्षी
हैं तो नेता
पंख तो हमें ही मिलना है
तब क्यों
परेशान हो तुम ?
क्या रखा है
जन समस्याओॆ में ?
हमारी भी अपनी समस्या है
कैसे मिले सोने का पंख
कौन सुलझाएगा
आखिर
हमें ही तो निपटना है इससे
ये जंग हमारी है
हमें खुद ही लड़ना है
हम लड़ेंगे
अपनी
अंतिम सांस तक
जान दे देंगे
सब कुछ
दांव पर लगा देंगे
एक
बस एक
'सोने के पंख' के लिए

5 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

आखिर
हमें ही तो निपटना है इससे
ये जंग हमारी है
हमें खुद ही लड़ना है
हम लड़ेंगे
अपनी
अंतिम सांस तक
जान दे देंगे
सब कुछ
दांव पर लगा देंगे
एक
बस एक
'सोने के पंख' के लिए

बढिया !!

M VERMA ने कहा…

एक पंख
तुम्हें भी मिलेगा
सब्र का फल
मीठा होता है
हो सकता है
बहुत तीखा और सार्थक स्वर
बहुत सुन्दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 13 जुलाई को आपकी रचना ...( तुम नहीं तो ).. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

वाणी गीत ने कहा…

हमें ही तो निपटना है इससे
ये जंग हमारी है
हमें खुद ही लड़ना है

यही सच है ...!

संजय भास्‍कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।