शनिवार, 10 जुलाई 2010

मैं कोई इतिहास नहीं रच सकी......

सभी मित्रों को हौसलाअफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया

मैं कोई इतिहास

नहीं रच सकी
यूं कहूं

बना नहीं सकी
दोनों में फर्क है
रचना समझते, बूझते
होशो-हवास में
की जाती है
बनता-बिगड़ता

अपने आप है
कब, किस समय
हम क्या कर गुजरें
और इतिहास बन जाए
वर्तमान की नियति है
इतिहास बनना
वर्तमान से गुजर कर ही
पन्नों पर

चमकती है स्याही
मगर मैं

न कुछ रच सकी
न कुछ बन सका
मैं भी बनूंगी इतिहास
लेकिन

नहीं चमक सकूंगी
स्याही बनकर

पन्नों पर
कोई नहीं दोहराएगा
इस जीवन की कहानी
कुछ निशानियां

छोड़ूंगी जरूर
जो करेंगी याद
अपनी निशानियों के

होने तक

9 टिप्पणियाँ:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

चिंता न करें... इतिहास केवल इतिहासकार रचते हैं बाक़ी लोग तो बस अपना करम करते हैं.

M VERMA ने कहा…

छोड़ूंगी जरूर
जो करेंगी याद
अपनी निशानियों के
होने तक
और फिर इतिहास रचने से अच्छा है कि निशानियाँ छोड़ी जाये ... इतिहास स्वयं ही रच जायेगा.
सुन्दर संकल्प से रचना का अंत किया है

वीना ने कहा…

हां वर्मा जी कभी इतिहास खुद रचा जाता है..कभी छोड़ी हुई निशानियां ही उस बुलंदी तक ले जाती हैं

वीना ने कहा…

काजल जी चिंता की नहीं जाती हो ही जाती है....

पवन धीमान ने कहा…

अच्छी भावपूर्ण रचना.

Virendra Singh Chauhan ने कहा…

Naaummedi se shru kiya..aur ant men jo ummeed jataai hai.Isse badi achhi rachna ban padi hai. Jo baat aapne kahna chaahi hai , vo amuman sabhi ke saath hoti hai.

Mujhe ummeed hai auron ko bhi zaroor pasand aayegi.
Achhi rachna ke liye
Appka Dhnaybaad........

अजय कुमार ने कहा…

निशानी तो है ,ये आपका ब्लाग

वीना ने कहा…

धन्यवाद वीरेंद्र जी अगर रचना पसंद आए और प्रशंसा हो तो उत्साह बढ़ता है।

vishal ने कहा…

छोटा मुँह बड़ी बात कह रहा हूँ, उसके लिए पहले क्षमा करें'
'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'।