सोमवार, 23 मार्च 2015

मित्रों नमस्कार,
नए संवत् की सबको बहुत-बहुत शुभ कामनाएं...
काफी लम्बे समय बाद आपके साथ हूं. मेरा ब्लॉग ही नहीं खुलता. तुरंत 
http://neocounter.neoworx-blog-tools.net/
ये आ जाता है. बड़ी मुश्किल से पोस्ट कर पा रही हूं. इससे पहले भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुई. काफी समय से दूर हूं इसलिए ब्लॉग में हुए बदलावों के बारे में नहीं जानती. इसलिए अगर कुछ ऐसा है तो कृपया मुझे जरूर सूचित करें. मैं अब जरूर नियमित रहूंगी.

रविवार, 1 सितंबर 2013

मत बनाओ गगन का चांद


मैं
चाहती हूं
धरा पर रहना
तुम्हारे साथ
जीवन भर
अंतिम समय तक
मुझे मत बनाओ
गगन का चांद
रहने दो
अपनी बाहों में
देवी समझकर
मत अर्पण करो
पुष्प
मेरे कदमों पर
लगा दो

एक कली
मेरे बालों में
खिल जाने दो मुझे
फूल बनकर


वीना श्रीवास्तव

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

तमन्ना के रेगिस्तान...

तमन्ना के रेगिस्तान में उड़ते हैं रेत के बादल
गुबारों के बवंडर में मैं अब फंसना नहीं चाहत

ग़में इश्क ने सोखा है मेरे जज्बात का चश्मा
हसरतों के झरने में मैं अब बहना नहीं चाह
ती

सोमवार, 22 जुलाई 2013

पॉलिथीन विरोधी अभियान....

कल पॉलिथीन विरोधी अभियान के तहत चांदनी चैक स्थित हरि राम और लक्ष्मी गणेश अपार्टमेंट में गई और वहां सारे घरों से पॉलिथीन एकत्र किये. फिर शपथ ली कि आगे से पॉलिथीन का प्रयोग नहीं करेंगे... (




मंगलवार, 16 जुलाई 2013

बादलों का एक भी टुकड़ा...

बादलों का एक भी टुकड़ा
नहीं बचा आंखों में
सावन-भादों में बनाए बांधों के द्वार
खोल दिये हैं मैने
अंतर में बसी भागीरथी
विलुप्त हो गई है सरस्वती-सी
पंछियों ने भी ढूंढ लिया है नया बसेरा
शाखों से पत्ते रिस रहे हैं रेत की तरह
सूखे पत्तों से नहीं लिख पाऊंगी
तुम्हारा नाम
तुम्हारी नमी खो चुकी है
समय की भट्ठी में
तुम अब
सुलग रहे हो मेरे दिल में
मेरी ही सांसें बनकर  

मंगलवार, 28 मई 2013

इसी का नाम जिंदगी है....

इसी का नाम जिंदगी है ये हमेशा एक-सी नहीं रहती
दिन खो जाता है शाम में, रात तक सुबह नहीं पलती

जहां के आगे मिलेंगे और भी जहां, खोजो तो सही
कदम साथ बढ़े साथियों के तो दूरी नहीं खलती

अक्सर थम जाते हैं काफिले कुछ दूर बढ़ने के बाद
रुके हुए कदमों के साथ कभी जिंदगी नहीं चलती

अफसाने बदल जाते हैं हकीकत में समय के साथ
साथ हो तेरी रहनुमाई तो लम्बी डगर नहीं खलती


अफसुर्दा दिलों में कैसे खुशियों की शहनाई बजे
वाबस्तगी से महरूम दामन में जीस्त नहीं पलती

मेरे चांद में मेरे अरमानों की पूरी दुनिया आबाद है

खाली आस्मां के नीचे खाली-सी जिंदगी नहीं पलती

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

बहादुर अनामिका को सलाम

आज एक
दुष्कर्म पीड़ित की मौत नहीं हुई
मौत हुई है
एक सभ्यता की
एक संस्कृति की
नारी की अस्मिता की
हर मां मरी है बेवक्त
हर बहन का आंचल हुआ है तार-तार
दफन हुई हैं भावनाएं
वासना के कौफीन में
सारी चिरैया उड़ चुकी हैं
मां के आंगन से
तिनके चुगने भी नहीं उतरेंगी
धरा पर
कहीं फिर से ना फंस जाए
शिकारी के जाल में
आज अगर क्रांति नहीं आई
तो मुर्दा हो जाएगी
इंसानों की बस्ती
यह वक्त नहीं विचार का
यह समय नहीं इंतजार का
क्रांति के लिए
समय मुकर्रर नहीं होता
समय आता है तो
हो जाती है क्रांति मुकरर्र
आज भी हम चुप रहे तो
मां भी सी लेगी अपनी कोख
बेबसी से
फिर नहीं जन्म देगी
किसी गुड़िया को
नहीं महकने देगी
मन के उपवन को
किसी कली से
जहां हर तरफ उगे हों कैक्टस
घिरी हों नन्हीं कलियां
बबूलों के अरण्य से
वहां कैसे चहचहाएंगी बेटियां
आज भी अगर नहीं जागे हम
जड़े रहें होंठों पर
खामोशी और भय के ताले
तो व्यर्थ जाएगी उसकी कुर्बानी
कभी नहीं महफूज हो सकेंगी
हमारी बेटियां
हमारी आधी दुनिया
आओ, उठाएं
गगन पर रखा इंद्र धनुष
और लिख दें
क्रांति की नई इबारत
चिरनिद्रा में सोने वाली
जाग रही है
करोड़ों भारतवासी की आंखों में
वो अनामिका समा गई है
आक्रोश बनकर
दिलों में
क्रांति बनकर
उतर आई है सड़कों पर
कहने
बस, अब और नहीं