समय ने आज
फिर दिखाया दर्पण मुझे
कितना बदल गया है
चेहरा मेरा
वो भाव
वो मासूमियत
वो अल्हड़पन
वो बचपन
कहीं छूट गया पीछे
मैं अभी भी भाग रही थी
उन्हीं संबंधों के पीछे
जिनके सिरे
बंधे हुए थे बचपन से
अकेलेपन के आंगन में
कितना रीता-सा हो गया है
जीवन
परछांई बनकर चलने वाले
रिश्ते
कहीं गुम हो गए
समय के अंधकार में
वक्त ने कर दिया उन्हें हमसे दूर
या हमारी जरूरतों ने
कर लिया किनारा उनसे
मस्तिष्क के पुस्तकालय में
तरतीब से सजी हैं यादें
लेकिन बिखरी पड़ी हैं वो
तस्वीरें
जो बसी थीं आंखों
मैं नहीं देखना चाहती दर्पण
कैसे ढूंढूंगी
अपने इर्द-गिर्द की
तस्वीरें
मैं अकेली रह गई
अपने फोटो फ्रेम में
बचा है तो मेरा रीतापन
कहीं आवाज देता मौन
भीगी हुई यादें
सिसकती रूह










