गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010
मेरे बेटे का अभी ........वीना
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
दिल का दीवानापन............वीना
दिल का दीवानापन
मत पूछ ऐ सनम
ये हो चुका है तेरा
तेरा है मेरा मन
राह-ए-वफा पे अब से
पहले न चले थे
पीछे न कभी आएंगे
बढ़ते हुए कदम
यूं अब जो मिले हैं तो
हम मिलते ही रहेंगे
टूटे न कभी तेरे-मेरे
प्यार की सरगम
फुर्सत के ये लम्हे हैं
मिले न मिलें कभी
दो-चार घड़ी और हैं
क्यूं दूर रहें हम
अब जिंदगी की राह में
अकेले नहीं हो तुम
वीना तो तेरी हो चुकी है
ऐ मेरे हमदम
सोमवार, 27 सितंबर 2010
परीक्षा....मेरी-तुम्हारी
जिस राह भी गई
हर राह में
खड़े थे तुम
घनी छांव में भी
तुम मिले
धूप की
तपती बारिश में भी
तुम थे वहां
बरखा की
जलती फुहारों के बीच भी
गुनगुना रहे थे तुम
थककर चूर हुई
और सोई
तो ख्वाब-सा
बुन रहे थे तुम
पथरीले रस्ते पर
लहू-लुहान हुई
तब भी साथ थे तुम
जिन राहों पर
जीकर मरती रही
वहां भी
साथ थे तुम
आज हूं
उस रास्ते पर
जो ले जाता है
जिंदगी को
अंतिम सच्चाई तक
आज है परीक्षा
मेरी और तुम्हारी
मैं मिल जाऊंगी
अंतिम सच्चाई से
तुम्हारे साथ
या... तुम्हारे बिना
पूरा करूंगी
अंतिम सफर
बुधवार, 22 सितंबर 2010
ताकि बची रहे चाहत जीने की....
रविवार, 19 सितंबर 2010
अधिकार कैसा...?
सोमवार, 13 सितंबर 2010
मत बनाओ गगन का चांद
रविवार, 5 सितंबर 2010
उल्टी दिशा....
बिना सोचे समझे
चलती रही
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
मैने कहीं सुनी थीं
ये चार पक्तियां
वह पथ क्या-पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
यदि धाराएं प्रतिकूल न हों
मैं लेती रही
पग-पग पर
अपनी धैर्य परीक्षा
खुद ही बिछाती रही
शूल अपनी राहों में
देती रही चुनौती
अपनी कुशलता को
कुशलता और धैर्य के बीच
भूल गई स्वयं को
पिसती रही
दो पाटों के मध्य
नहीं समझ सकी
रोज नहीं होती परीक्षा
स्वयं को
साबित करने के लिए
आवश्यक नहीं
रोज परीक्षा से गुजरना
लेकिन जो जाना
वही है
जीवन का सार
धैर्य के साथ
कुशलतापूर्वक
खराब समय
निकालना ही है
हमारी जीत
हमारा ईनाम
समय है
सबसे बड़ी परीक्षा
जिससे गुजरना है
हम सबको
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
