रविवार, 19 सितंबर 2010
अधिकार कैसा...?
सोमवार, 13 सितंबर 2010
मत बनाओ गगन का चांद
रविवार, 5 सितंबर 2010
उल्टी दिशा....
बिना सोचे समझे
चलती रही
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
मैने कहीं सुनी थीं
ये चार पक्तियां
वह पथ क्या-पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
यदि धाराएं प्रतिकूल न हों
मैं लेती रही
पग-पग पर
अपनी धैर्य परीक्षा
खुद ही बिछाती रही
शूल अपनी राहों में
देती रही चुनौती
अपनी कुशलता को
कुशलता और धैर्य के बीच
भूल गई स्वयं को
पिसती रही
दो पाटों के मध्य
नहीं समझ सकी
रोज नहीं होती परीक्षा
स्वयं को
साबित करने के लिए
आवश्यक नहीं
रोज परीक्षा से गुजरना
लेकिन जो जाना
वही है
जीवन का सार
धैर्य के साथ
कुशलतापूर्वक
खराब समय
निकालना ही है
हमारी जीत
हमारा ईनाम
समय है
सबसे बड़ी परीक्षा
जिससे गुजरना है
हम सबको
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
शनिवार, 4 सितंबर 2010
लूटिया डूबो रहे हैं आज के हिंदी के अध्यापक....
उल्टी दिशा में
जीवन भर
करती रही पार
अग्नि परीक्षा
प्रत्येक परीक्षा में
अव्वल आने की चाहत
ले गई मुझे
सम्भवत:
अंतिम पड़ाव पर
मैने कहीं सुनी थीं
ये चार पक्तियां
वह पथ क्या-पथिक कुशलता क्या
जिस पथ में बिखरे शूल न हों
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या
यदि धाराएं प्रतिकूल न हों
मैं लेती रही
पग-पग पर
अपनी धैर्य परीक्षा
खुद ही बिछाती रही
शूल अपनी राहों में
देती रही चुनौती
अपनी कुशलता को
कुशलता और धैर्य के बीच
भूल गई स्वयं को
पिसती रही
दो पाटों के मध्य
नहीं समझ सकी
रोज नहीं होती परीक्षा
स्वयं को
साबित करने के लिए
आवश्यक नहीं
रोज परीक्षा से गुजरना
लेकिन जो जाना
वही है
जीवन का सार
धैर्य के साथ
कुशलतापूर्वक
खराब समय
निकालना ही है
हमारी जीत
हमारा ईनाम
समय है
सबसे बड़ी परीक्षा
जिससे गुजरना है
हम सबको
हमेशा उल्टी दिशा
नहीं होती सही
दिशा चाहे
उल्टी हो या सीधी
सही होनी चाहिए
सोमवार, 16 अगस्त 2010
हिंदुस्तानी का मन
यह नाविक की
कश्ती नहीं
जिस पर बैठकर
तुम जाना चाहते हो
उस पार
यह चित है मेरा
आसान नहीं
तुम्हारा प्रवेश
भावनाओं के
कोमल पल्लवों से आच्छादित
प्रेम के सुमन
खिलते हैं यहां
किसी पर्यटक को
आज्ञा नहीं
प्रवेश की
वो आए
पुष्पों से खेले
घूमे और चला जाए
यह मन है
हिंदुस्तानी का
इस प्रेम उपवन के पुष्प
खिलते हैं
केवल और केवल
हिंदुस्तानियों के लिए
हिंदुस्तान के लिए
प्राण न्यौछावर करने वाले
शहीदों के लिए
जिस दिन
इस प्रेम उपवन के
सारे पुष्प
चढ़ जाएंगे
शहीदों के चरणों में
उनकी मजारों पर
उस दिन
इन पुष्पों का
छोटा-सा जीवन
हो जाएगा सफल
महक उठेगी धरा
इनकी सुगंध से
बुधवार, 11 अगस्त 2010
दया नहीं स्वाभिमान दो............
चांद को मत देखो
सितारों को
तोडऩे की बात
मत करो
किसी से
कुछ करने का साहस है
तो दूर करो
समाज में फैली
कुरीतियों को
पोछो आंसू
समाज की ठोकरों में
पलने वाले जीवन के
सहारा बनो
लडख़ड़ाते पैरों का
नफरत की आग को
बुझा दो
प्यार के नीर से
बरसा दो प्रेम के मेघ
खिलने दो फूल
फैलने दो हरियाली
पूरे करो
बच्चों की आंखों में
पलते सपनों को
दया नहीं
स्वाभिमान दो
जीवन को
शुक्रवार, 6 अगस्त 2010
क्यों...........?
क्यों ?
लगते हैं
पत्ते पेड़ों पर
क्यों ?
झरने बहते हैं
क्यों ?
रोज निकलता है
सूरज
क्यों ?
होती है रात
क्यों ?
बरसते हैं बादल
पेड़ देते हैं छाया
क्यों ?
राहें पहुंचाती हैं
मंजिल तक
क्यों ?
मोड़ देते हैं
जीवन चुनने के
बेहतर अवसर
क्यों ?
प्रकृति कराती है विश्वास
अनादि शक्ति का
जब इंसान
रौंदता है
विश्वास को
अच्छाई का सिला
देता है धूर्तता से
करता है छल
कपटता से
जीवन बिता देता है
झूठ को
सच बनाते
आंखों में
सुरमें की जगह
डाल लेता है बाल
सूअर के
आत्मा पर
चढ़ा लेता है चर्बी
कपट की
गिद्ध की तरह
तलाशता है
नया शिकार
कहां है वो
अनादि शक्ति
क्या ?
उसने भी पहन लिया
हार का हार
या हो रही है तैयार
सहने को अंत
एक और सभ्यता का